स्याह-सफ़ेद के धुंधलके में

हमारा यह फेस्टिवल ओम पुरी की स्मृति को समर्पित है. पेश है हिमांशु पंड्या का लिखा यह लेख. हिमांशु उदयपुर फिल्म सोसाइटी के सदस्य हैं.

 

ओम पुरी चले गए. मेरे लिए ओम पुरी को याद करना अपने जयपुर के पुराने घर के ब्लैक एंड वाइट टीवी को याद करने सरीखा है. कई घरों में एक टीवी, कुछ समय का प्रसारण, एक चैनल और साप्ताहिक फिल्म. लेकिन कैसा जादुई आकर्षण था उसमें. अन्य सरकारी उपक्रमों की तरह टीवी की भी एक विश्वसनीयता और गरिमा थी. उसी दौर में समान्तर सिनेमा के सारे नाम हमारे लिए घरेलू नाम बने थे. सच तो यह है कि हम मुख्यधारा और समान्तर का कोई भेद भी नहीं जानते थे क्योंकि घर में सिनेमा देखने जाने का कोई रिवाज नहीं था और टीवी पर जो आये वह देखा जाता था. तो हमारे लिए जैसे अमिताभ बच्चन वैसे ओम पुरी.

ओमaakrosh8 - 1 पुरी की पूरी देह अभिनय करती थी. थियेटर ने उन्हें यह अनुशासन सिखाया था. आक्रोश का वह दृश्य याद कीजिये जिसमें वकील बने नसीरुद्दीन शाह लहान्या भीखू को समझा रहे हैं कि वह अपनी बात रखे तो सही. पूरे दृश्य में कैमरा नसीरुद्दीन शाह की तरफ ही है, हम ओम पुरी की पीठ और चेहरे का एक कोना ही देख पाते हैं. उनकी साँसें चल रही हैं लेकिन धौंकनी की तरह नहीं. एक सूत इधर या उधर इस पूरे दृश्य को तेजहीन या मेलोड्रामा का शिकार बना सकता था.दूसरा, यह एक कलाकार का आत्मविश्वास भी दिखाता है. एक कलाकार जो ‘कौन किसका रोल खा गया’ की चिंता  से कई फीट ऊपर था. कहना न होगा कि यह भी थियेटर की ही देन है.थियेटर सिंगल फ्रेम में नहीं चलता है इसलिए आपके सहकलाकार का अच्छा अभिनय आपके अभिनय को भी परवान चढ़ाता है. सामूहिकता बोध के बिना कोई व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं पायी जा सकती. यही कारण है कि यह दोनों अभिनेता एक दूसरे की फिल्मों में छोटी छोटी भूमिकाओं में नज़र आ जाते थे. यहाँ यह याद करना भी दिलचस्प होगा कि ओम पुरी ने गांधी में एक छोटी सी भूमिका की थी लेकिन जब ऑस्कर के नामांकन के समय परदे पर फिल्म की क्लिप चलाई गयी तब वह अविस्मरणीय दृश्य ही दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया था.

‘भारत एक खोज’ में ओम पुरी द्वारा निभाए गए चरित्रों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा – रावण, दुर्योधन, अंगुलिमाल, अलाउद्दीन खिलजी, कृष्णदेव राय, औरंगजेब और अशोक. पाँच तो स्पष्ट रूप से हमारे इतिहास के खल पात्र हैं. खलता का ऐतिहासिक बोझ ढोते हुए ये पात्र हमारी उस इतिहास दृष्टि को परिलक्षित करते हैं जिसमें हम अपने अतीत के अपराधों के लिए कुछ व्यक्तियों को चिह्नित कर शेष परिवेश को मुक्ति देते हैं. यही कारण है कि नेहरू की दृष्टि को फिल्मांकित करते समय श्याम बेनेगल ने सभी प्रमुख खल पात्रों के लिए ओम पुरी को चुना. इसी तरह ओम पुरी ने अशोक को महानता के बोझ से भी मुक्त किया.

Bharat-Ek-Khoj 3यदि आपने ‘भारत एक खोज’ देखा हो तभी आप इस वाक्य का अर्थ समझ सकते हैं. यदि न देखा हो तब भी यह दो किश्तें जरूर ढूंढकर देखें. यहाँ यह रेखांकित करना भी अच्छा रहेगा कि एक अमरीकी पत्रिका को दिए साक्षात्कार में उन्होंने ‘माई सन द फैनेटिक’ के परवेज़ और ‘ईस्ट इस ईस्ट’ के जॉर्ज खान को एक सरीखा बताया. om_puri 12साक्षात्कारकर्ता के लिए यह हैरान कर देने वाला था क्योंकि परवेज़ जहाँ एक आज़ादख्याल चरित्र था वहीं जॉर्ज खान पुरातनपंथ में डूबा,चिडचिडा, झगडालू चरित्र था. उसकी हैरानी को और बढाते हुए ओम पुरी ने जॉर्ज के चरित्र को पूरी सकारात्मकता से रेखांकित करते हुए पूछा कि क्या वह हमेशा ऐसा ही रहा होगा ? सत्तर का दशक इंग्लैंड में एशियाई लोगों के लिए नस्ली भेदभाव और हमलों का दशक था. इंसान अपनी सुरक्षा के लिए किसी न किसी गोलबंदी की ओर जाता है और जब उदारवादी तबके से उसे निराशा मिलती है तब स्वभावतः ‘उसकी’ बिरादरी उसका बाहें खोलकर स्वागत करती है.

 

यह बहुत गहरी बात है. हिंदी फ़िल्में जब किसी वर्ग या समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव या अन्याय के विरुद्ध खडी होना चाहती हैं तब वे उसका एक प्रातिनिधिक अच्छा चरित्र गढ़कर आपकी सहानुभूति को गाढ़ा करने का प्रयास करती हैं. ‘इसके साथ ऐसा क्यों ?’ हमारे मन में सवाल आता है पर सवाल ये है कि इसके ही क्यों किसी के साथ भी ऐसा क्यों ? यदि बात को फिल्म के उदाहरण से कहना हो तो ‘माय नेम इज खान’ के मुकाबले ‘रईस’ बड़ी फिल्म है क्योंकि वह अपने नायक के विचलन दिखाकर आपको असुविधा में डालती है और राजनीतिक रूप से कहना हो तो ‘अच्छा मुसलमान बनाम बुरा मुसलमान’ का द्वैत मूलतः कट्टरपंथी राजनीति के लिए खाद पानी का काम करता है.

बहरहाल, ऊपर के किस्से में आप देखें कि ओम पुरी स्क्रिप्ट से बाहर जाकर अपने चरित्र के ‘वैसा’ होने की जड़ें तलाश रहे थे. मुझे लगता है कि वे प्रत्येक चरित्र के बारे में पहले ये जानने की कोशिश करते थे कि इस स्क्रिप्ट में दिखाई गयी परिधि से बाहर वह पात्र और क्या क्या करता होगा ? वह खाली समय में क्या करता होगा ? उसे कैसी फ़िल्में देखना या गाने सुनना अच्छा लगता होगा. ‘मंडी’ का फोटोग्राफर और ‘आघात’ का ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट दो सर्वथा भिन्न सौन्दर्यबोध वाले चरित्र हैं तो यह उनकी सम्पूर्ण देहयष्टि में दिखता है. ओम पुरी ये तक जानते थे कि उनके किस चरित्र को कितना मुस्कुराना है. ‘आघात’ का नायक जहाँ अपनी सभी प्रतिक्रियाओं में बंधा हुआ है ( सिवा सैद्धांतिक बहसों के, और यह पादटिप्पणी भी आपके विशेष आकर्षण की मांग रखती है ! ) उसकी अभिव्यक्ति में बाधा उसका अनुशासन तो नहीं, वरना कलाकार ओम पुरी तो भावनाओं के प्रकटीकरण में कमतर नहीं थे, दूसरी ओर ‘मंडी’ का फोटोग्राफर भौंडा होने की हद तक वाचाल और टेड़ा मेढ़ा है. ओम पुरी जानते थे कि कहाँ अभिनय करना है और कहाँ ( क्या ) नहीं करना है, पहली विशेषता कईयों में होती है, दूसरी अच्छे अभिनेता की पहचान होती है.

‘अर्धसत्य’ उनके अभिनय का शिखर था. विजय तेंदुलकर, वसंत देव और दिपु चित्रे की कलम ने उस चरित्र को गढ़ा था. अनंत वेलणकर के रूप में हमें एक ऐसा चरित्र मिला जिसमें नायक कहाँ ख़त्म होता था और खलनायक कहाँ शुरू होता था या खलनायक कहाँ लुप्त होता था और नायक कहाँ लौट आता था, पहचानना मुश्किल था, कहीं कहीं तो वह दोनों एक साथ था. सस्पेंड हो जाने के बाद, जब हम उस चरित्र के अँधेरे-उजालों से परिचित हो चुके हैं, जब वह एक फ़ोन बूथ से अपने सहकर्मी को फोन करते हैं तब उनकी बेबसी, खीझ, निराशा, आत्महंता आक्रोश सब घुला मिला नज़र आता है. उनका सहकर्मी ( शफ़ी इनामदार ) मामला सुलझाने के लिए साफ़ इनकार कर देता है पर पैसे-वैसे की मदद का प्रस्ताव रखता है. फीके चेहरे के साथ इस ‘मदद’ के लिए वे ‘थैंक यू सर’ कहते हैं. एक हल्का सा कम्पन. आवाज़ में भी और देह में भी.

इसीलिये हम ओम पुरी से प्यार करते हैं.

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जो कलाकार किरदारों को स्याह सफ़ेद नहीं देखता, वही राष्ट्रीयता के खांचों में कलाकारों को फंसा कर देखने का विरोध करने का माद्दा रख सकता था. लकीरें खींच दी गयी हैं, इस पार-उस पार के लोगों को यकीन दिलाया जाता है कि वे एक दूसरे के दुश्मन हैं पर कमाल तो ये है कि वहां भी बच्चे वैसे ही रोते हैं और माएं वैसे ही डपटती हैं. महादेवी वर्मा ने ‘साहित्यकार की आस्था’ नामक निबंध में लिखा है कि किसी और पेशे में आस्था और कर्म का द्वैत चल सकता है ( मसलन एक लोहार अहिंसा में आस्था रखते हुए भी अच्छी तलवार ढाल सकता है ) पर रचनाकार वृहत्तर आस्था के बिना नहीं लिख सकता. यह बात कलाकार पर भी लागू होती है. ओम पुरी ने ‘गलत वक्त’ पर भी सही बात कहकर इसे साबित किया. वक्त भी गलत था और जगह तो उससे भी ज्यादा गलत थी. अपने को राष्ट्र का स्वयंभू ठेकेदार मानने वाला पत्रकार सैनिक नाम के डंडे से उन्हें हांकता रहा. यह वह दौर था जब फ़िल्मकार बन्दूक की नोक पर बयान दे रहे थे, राजनीति-व्यापार-अनुदान-दुशालों के आदान प्रदान सब चालू थे पर खेल और सिनेमा को राष्ट्रवादी प्रोजेक्ट में बाँध दिया गया था जबकि यही दोनों इन सीमाओं को लांघने की सबसे ज्यादा कुव्वत रखते हैं. यह सब हुआ. ओम पुरी के एक वाक्य को सन्दर्भ से काटकर यूट्यूब के व्यूज से कमाई करने वाली भड़काऊ वेबसाइट्स भड़काऊ शीर्षकों के साथ लाखों लोगों को अपना एजेंडा परोसती रहीं. ओम पुरी के चाहने वाले जैसे क्षमाभावी ( अपोलोजेटिक ) होकर उनके गौरवशाली अतीत की दुहाई देते रहे, उनके लाजवाब अभिनय से हमारे मन में बसी यादगार फिल्मों की याद दिलाते रहे. शायद ये दुहाइयाँ उनके लिए व्यक्तिगत रूप से गहरी निराशा ही लेकर आयी होंगी. ये बताने के लिए अब वे नहीं हैं. इस क्षमाभाव का क्रूरतम रूप यह था कि ऑस्कर अवार्ड्स की शाम उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी पर हमारे यहाँ होने वाले आधा दर्जन सालाना फिल्म पुरस्कार समारोहों में उनका ज़िक्र भी नहीं हुआ. सत्यजित राय की ‘गणशत्रु’ की तरह वे अपनी बिरादरी से धकिया दिए गए.

इस लेख का अंत ऐसे नहीं होना चाहिए था पर खुद ओम पुरी का त्रासद अंत मेरे लिए कोई और गुंजाइश नहीं छोड़ता. जो समाज एक वाक्य के लिए अपने सदस्य के जीवन भर के दाय को भुला देता है, वह धीरे धीरे सच सुनने का गुण खो देता है क्योंकि सच हमेशा आदर्श की परिधि में नहीं कहा जाता, जो सबका ख्याल करके बोला जाए वो सच नहीं समीकरण होता है. गलत तरफ पाए जाने का खतरा उठाकर भी अपनी बात कही जाए, इसी साहस का नाम सच है. इसका दूसरा नाम ईमानदारी है.

पादटिप्पणी : हालांकि एक अभिनेता ने अपनी पूरी फ़िल्मी बिरादरी को इस कृतघ्नता के लिए खुलकर धिक्कारा. उसका नाम नवाज़ुद्दीन सिद्धीकी है.

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 ओम पुरी को याद करते हुए  हमारे साथ देखिये  :

26 नवम्बर (दूसरा दिन )/ 9.30-11.45 / जाने भी दो यारों/ कुंदन शाह/ हिंदी/ फ़ीचर फ़िल्म/ 1983/ 132 मिनट

 

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वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गयी

भारत वाचिक परंपरा का देश रहा है. पुराण और पंचतंत्र से लेकर जातक कथाओं तक हमारे यहाँ कहानियां सुनने सुनाने का सिलसिला बहुत पुराना है. यही कारण है कि ईरान में आठवीं सदी में जन्मी दास्तानगोई जब भारत आयी तो उसे हाथों हाथ लिया गया. हमारा मध्यकाल उन कई कई रातों का गवाह है जब दास्तानगो लम्बे लम्बे चलने वाले किस्से को किश्त दर किश्त सुनाते थे और सुनने वाले उस दिलकश अंदाज़ से बंधे हर रात सुनने के लिए इकट्ठे होते थे. मध्यपूर्व में दास्तानगोई में अमूमन जंग और मोहब्बत यही मुख्य विषय होते थे लेकिन भारत में इसमें दो और आयाम जुड़े – तिलिस्म और अय्यारी.

18 वीं – 19 वीं सदी भारत में दास्तानगोई के उरूज़ का समय है. मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था कि हमज़ा दास्तान के आठ अध्याय और शराब के सोलह पीपे – इसके बाद ज़िंदगी से कुछ और नहीं चाहिए !

लेकिन समय बीता. ब्रिटिश शासन में जिन विधाओं को सस्ता और भदेस कहकर हिकारत से नकारा गया, उनमें दास्तानगोई भी थी. मीर बाकर अली इस दास्तानगोई की परंपरा के आख़िरी वारिस थे. 1928 में उनके देहांत के साथ इसका नामो निशान मिट गया.

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21 वीं सदी में इसके पुनः जीवित हो उठने की कहानी भी बड़ी रोचक है. ये न होता यदि शम्सुर्रहमान फ़ारूकी न होते और उससे भी पहले मुंशी नवल किशोर न होते. 19 वीं  सदी के अंतिम दशकों और 20 वीं सदी के शुरूआती दो दशकों में मुंशी नवल किशोर की प्रेस ने इन दास्तानों को छापा था. कुल 46 जिल्द, लगभग 44 हज़ार पृष्ठ और कोई 2 करोड़ लफ्ज़ किताबों में दर्ज होकर यह इन्तेज़ार कर रहे थे कि कोई आये और इन्हें देखे, अपनी रिवायत को पहचाने.

उर्दू के प्रसिद्द आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूकी ने अपने शोध के सिलसिले में कुछ जिल्दों को उल्टा पलटा. वे इनके हैरतअंगेज़ वर्णन से चकित रह गए, फिर उन्होंने इन 46 जिल्दों को ढूँढने का बीड़ा उठाया. हिन्दुस्तान के अलग अलग संग्रहालयों से जुटाकर इन्हें फिर से बटोरा गया और फिर इस कहानी में आये महमूद फ़ारूकी जिन्होंने इन दास्तानों को फिर से पेश करने का इरादा किया.

सन 2005 में दास्तानगोई की पहली प्रस्तुति हुई. प्रस्तुतकर्ता थे महमूद फ़ारूकी और हिमांशु त्यागी. इसे बहुत सराहना मिली और फिर तो सिलसिला चल निकला. महमूद फ़ारूकी और दानिश हुसैन की जोड़ी ने न सिर्फ पुरानी दास्तानों जैसे दास्तान-ए-अमीर हमज़ा को आज के हिसाब से थोडा ढालकर प्रस्तुत किया बल्कि उन्होंने आज के मसाइल को उठाते हुए नई दास्तानें भी लिखीं. बिक्रम बेताल से लेकर विजयदान देथा कृत राजस्थानी लोककथा चौबोली तक सभी कुछ इनका हिस्सा बनीं. विभाजन के दर्द को दास्तान-ए-तकसीम-ए-हिन्द में बयान किया गया तो दास्तान-ए-मोबाइल से लेकर दास्ताने कारपोरेट तक कोई विषय अछूता नहीं रहा. अंकित चड्ढा, हिमांशु बाजपेयी, राणा प्रताप सेंगर, राजेश कुमार नई पीढी के दास्तानगो सामने आये हैं जो अब इस सिलसिले को थमने नहीं देंगे.

‘दास्तान-ए-सेडीशन’, जो हमारे इस फेस्टिवल में प्रस्तुत की जायेगी, 2007 में लिखी गयी थी जब डॉ. बिनायक सेन को राजद्रोह के आरोप में सज़ा हुई थी. बहुत लोकप्रिय हुई इस दास्तान में दास्तानगो, अय्यार अमर ( यानी हीरो )  और जादूगरों के सरदार अफरासियाब ( यानी विलेन ) की कहानी सुनाते हैं. कहानी है कोहिस्तान की और धीरे धीरे इस कोहिस्तान में हमारा वर्तमान भारत घुल मिल जाता है.

अमर और अफरासियाब की इस लड़ाई में होता क्या है, जानने के लिए आपको राणा प्रताप सेंगर और राजेश कुमार की यह नायाब प्रस्तुति देखने आना होगा.

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राणा प्रताप सेंगर और राजेश कुमार

 

26 नवम्बर ( दूसरा दिन ) / 3.45 – 4.45 /  दास्तान-ए-सीडीशन/ लेखन-निर्देशन – महमूद फ़ारूकी / प्रस्तुति – राणाप्रताप सेंगर और राजेश कुमार/ हिंदुस्तानी / 60 मिनट

कहानी की काया और फिल्म की छाया : मनोज रूपड़ा

‘द अदर साइड’ – यह नाम है उस शॉर्ट फिल्म का जो हमारे उद्घाटन सत्र में दिखाई जायेगी. प्रख्यात कथाकार मनोज रूपड़ा  विभिन्न कला माध्यमों पर समय समय पर लिखते रहे हैं. उनका लेखन हमारे सौन्दर्यबोध और यथार्थबोध दोनों को समृद्ध करता रहा है. हम यहाँ उनके लेख ‘कहानी की काया और फिल्म की छाया’ का एक अंश प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें उन्होंने ‘द अदर साइड’ का शॉट दर शॉट सूक्ष्म विश्लेषण कर बताया है कि कैसे कैमरा , कहानी के कथानक को भाषा की गोद से निकालकर एक सजीव काया के रूप में हम तक पहुंचाता है. यह लेख उनकी आधार प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘कला का आस्वाद’ में संकलित है. हम इस अंश की अनुमति देने के लिए लेखक के आभारी हैं.

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फिल्म शाट का मुख्य गुण है हू-ब-बू पन और सीधी इंद्रियग्राह्यता। ‘चारुलता’ के शुरुआती सात मिनट का जिक्र मैंने उसी संदर्भ में किया है अगर चारुलता और उसके पति के बीच कोई संवाद होता और अगर वह अपने अकेलेपन की तकलीफ को शब्दों में व्यक्त करती तो उसका प्रभाव दर्शकों पर उतनी गहराई से न पड़ता। चारुलता की उस वक्त की भंगिमाओं और क्रिया-कलापों को कैमरा जब शाट के फ्रेम में दर्ज कर रहा होता है तब हमें इसे इस रूप में देखें कि साहित्यक कथानक और उसकी विषय-वस्तु के ताने-बाने को, जो भाषा की गोद में छुपा हुआ था, कैमरा उसका सीधा चित्रीकरण करते हुए उसे भाषा की गोद से निकालकर एक सजीव काया के रूप में सामने रख रहा है – एक ऐसी सजीव काया जो छाया से निर्मित हुई है।

फिल्म के इन मूलभूत गुणों हू-ब-हू पन और सीधी इंद्रियग्राहयता की क्षमता को अगर हम और अधिक सूक्ष्म रूप से देखना चाहें तो उसे लघु फिल्मों में और अधिक गहराई से देखा जा सकता है क्योंकि लघु फिल्में आमतौर पर मूक होती है उसमें कोई संवाद नहीं होता सिर्फ पटकथा होती है और उस पटकथा के अंदर जो छुपा हुआ कथ्य होता है वह अपने आप में किसी महागाथा से कम नहीं होता। ‘द अदर साइड’ और ‘आर्डर’ ऐसी ही फिल्में है।

सबसे पहले हम यहाँ ‘द अदर साइड’ की संक्षिप्त शॉट सूची प्रस्तुत करते हैं –

शॉट नं. 1-

फिल्म शुरू होते ही पार्श्व में एक अजीब-सी बेचैनी और डर पैदा करने वाली थीम ट्यून सुनाई देती है। फिर एक लंबी गली को ऊँचे कोण से दिखाया जाता है। गली में दोनों तरफ खड़ी इमारतों की पथरीली

the other side 3दीवारों पर दोनों हाथ टिकाए सैकड़ों लोग खड़े हैं। ये लगभग हैंड्स अप की मुद्रा है। सैकड़ों निहत्थे लोग दीवार पर अपने हाथ रखे धीरे-धीरे सरक रहे हैं।

शॉट नं. 2-

फिर कैमरा लो एंगल के एक ट्रेक शॉट में गली की पथरीली जमीन पर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है और एक लाश की खुली आँखों से पैर तक के दृश्य को क्लोज में दिखाते हुए आगे बढ़ जाता है।

शॉट नं. 3-

कैमरा एक बार फिर कट कर के दीवार पर सरकते हाथों को दिखाता है। उन हाथों के बीच एक निश्चित दूरी थी। कोई भी हाथ किसी दूसरे हाथ के इतना करीब नहीं था कि किसी भी तरह का स्पर्श संभव हो सके।

शॉट नं. 4-

कैमरा एक टूटी हुई दीवार के पीछे से कुछ चेहरों का करीब से अवलोकन करता है। उनमें से एक आदमी अपने किसी परिचित को देखकर अपनी भौंहें उठाकर कुछ अभिव्यक्त करता है।

(आफ स्क्रीन से बंदूक की गोली की आवाज)

भौंहें उठाकर किसी दूसरे को देखने वाला पीठ पर गोली खाकर सड़क पर गिर पड़ता है। (फिल्म का पहला संकेत – किसी भी तरह की अभिव्यक्ति की यहाँ गुंजाइश नहीं है। अगर कोई चुपके से भी किसी को विश करेगा तो उसका अंजाम है मौत।

शॉट नं. 5-

कैमरा एक बार फिर हाथों पर। कुछ देर बाद एक काला पुरुष हाथ निर्धारित गति का उल्लंघन करते हुए चोरी छुपे एक गोरे स्त्री हाथ के करीब पहुँचता है आदमी के दूसरे हाथ में शादी की अँगूठी है ठीक वैसी ही अँगूठी स्त्री के हाथ में भी है।

शॉट नं. 6-

कैमरा अब और ज्यादा जूम करके उन हाथों को क्लोज में लेता है, जैसे कोई बहुत तेज निगाहों से उन हाथों को देख रहा हो। जैसे ही पुरुष हाथ की अँगुली स्त्री हाथ की अँगुली को छूती है, एक गोली की आवाज आती है और अगले ही पल काले आदमी की लाश गली में पड़ी दिखाई देती है (दूसरा संकेत – किसी भी तरह के मानवीय स्पर्श की भी यहाँ अनुमति नहीं है)

शॉट नं. 7-

गली में सरकते लोग एक पल के लिए रुक जाते हैं और सब अपनी गर्दन मोड़कर पहले उस काले आदमी की लाश को देखते हैं फिर सबकी निगाहें उठ जाती है, कुछ देर वे टकटकी लगाए उस ”आफ स्क्रीन” गोली चलाने वाले को देखते हैं फिर सब दीवार की तरफ मुँह फेर लेते हैं और चुपचाप सरकने लगते हैं।

शॉट नं. 8-

गली में पड़ी लाशों का एक सामान्य-सा दृश्य। जैसे किसी चीज की गिनती की जा रही हो। सड़क में पड़ी लाशों के पार्श्व में चुपचाप सरकते पैरों का धुँधला-सा दृश्य।

शॉट नं. 9-

तभी लाइन में से एक आदमी अचानक बाहर आता है। जैसे उसे कोई दौरा पड़ गया हो। वह बिना किसी अंजाम की परवाह किए सीधे गली के बीचों-बीच सीना तानकर खड़ा हो जाता है। उसे कुछ देर खड़ा रहने दिया जाता है। यह अंदाजा लगाने के लिए कि उस आदमी के दुस्साहस की भीड़ में क्या प्रतिक्रिया होती है।

शाटॅ नं. 10-

दीवार से चिपककर सरकते आदमी चलना बंद कर देते हैं और पीछे मुड़कर उस निडर आदमी को देखते हैं।

शॉट नं. 1the other side 21-

(कैमरा आँख के लेवल पर) निडर आदमी उसकी आँख में आँख डालकर आगे बढ़ता है।

(आफ स्क्रीन बंदूक की आवाज) वह गिर पड़ता है।

शॉट नं. 12-

भीड़ में से एक साथ चार-पाँच लोग आगे बढ़ते हैं जैसे उन्हें कोई सामूहिक दौरा पड़ गया हो। (गोली की आवाज) पहला आदमी गिरता है। लेकिन कोई रुकता नहीं (गोली की आवाज) दूसरा आदमी गिरता है। लोग और बड़ी संख्या में आगे बढ़ते हैं (गोली की आवाज) तीसरा आदमी गिरता है लेकिन लोगों का सड़क पर उतरना तब तक जारी रहता है जब तक सड़क खचाखच भर नहीं जाती। अब वे लोग लगातार आगे की ओर बढ़ रहे हैं। कैमरे की आँख में आँखें डाले।

शॉट नं. 13

आत्मविश्वास से भरे इन चेहरों का करीब से अवलोकन। उनकी आँखों में न तो कोई खौफ है न आक्रोश। वे उस अदृश्य संहारकर्ता की तरफ निगाहें उठाए कुछ इस तरह चल रहे हैं जैसे वे इस इरादे के साथ चल रहे हों कि या तो मर जाएँगे या इस गली से बाहर निकल जाएँगे। बंदूक कुछ देर खामोश रहती है। फिर ”ऑफ स्क्रीन” से मशीनगन की आवाज। सिर्फ चेतावनी। कि अब बंदूक की जगह मशीनगन का इस्तेमाल हो सकता है।

शॉट नं. 14-

समूह आगे कूच कर रहा है। मशीनगन अब भी खामोश है। कुछ देर के लिए यह भ्रम होता है कि पीड़ितों का यह सामूहिक प्रयास सफल हो जाएगा और वे उस गली से बाहर निकल जाएँगे। लेकिन मशीनगन की यह खामोशी उस अदृश्य संहारकर्ता की रणनीति का हिस्सा थी। उसने पूरे समूह पर तड़ातड़ गोलियाँ बरसाने के बजाए अब एक व्यक्ति को चुन लिया। धीरे-धीरे कैमरा ऊपर की ओर उठ रहा है। लोगों का लगातार आगे बढ़ने का क्रम जारी है। कैमरा भीड़ में किसी एक आदमी पर स्थिर दृष्टि डालता है। कैमरा समूह से उस चेहरे को काटता हुआ उसका टाइट क्लोज अप लेता है। भय से डरा-सहमा आदमी कैमरे के फ्रेम से अलग हो जाता है। इस अकेले आदमी के विचलन से कुछ और लोगों का चलना संदिग्ध हो गया। कैमरा अब उन्हीं लोगों को समूह से अलग करता है, जो अनिश्चितता की वजह से डगमगाते हुए आगे बढ़ रहे हैं।

(आफ स्क्रीन से मशीनगन से गोलियाँ चलने की आवाज)

अनिश्चित और विचलित लोग तुरंत दीवार की ओर चले जाते हैं। फिर लगातार मशीनगन चलने की आवाज। बीच सड़क से समूह तितर-बितर होकर किनारे खिसक रहा है। गोलियों की बौछार के बीच लोग दौड़कर किनारे होते जा रहे हैं। फिर वे एक लाइन बनाकर दीवार के साथ चलने लगे। पूर्ववत। कैमरा गली में पड़ी लाशों के ऊपर से बिना कहीं ठहरे गुजर गया, यह उस संहारकर्ता की नजर है जिसकी रुचि मरे हुए लोगों में नहीं डरे हुए लोगों में है।

शॉट नं. 15-

(कैमरा ठीक एक नंबर शॉट की तरह उसी एंगल और उसी ऊँचाई पर) दीवार से सटी डरे हुए लोगों की कतार ठीक वैसे ही सरक रही है, दीवार से अपने हाथ चिपकाए, जैसे हमने उसे पहले शाट में देखा था।

पार्श्व में फिर वही बेचैन कर देने वाली थीम ट्यून सुनाई देती है और स्क्रीन पर लिखा दिखाई देता है – सन् 1961

डिजाल्व

सात मिनट की इस फिल्म की जो शॉट लिस्ट यहाँ प्रस्तुत की गई है, उसके आधार पर हम एक और लिस्ट तैयार कर सकते हैं – प्रेम, जान-पहचान, स्पर्श, स्पंदन, सहानुभूति, सहिष्णुता, मानवीय सरोकार, किसी भी तरह की निजी अनुभूति या निजी अभिव्यक्ति या किसी भी तरह की सामूहिकता या एकता या किसी भी तरह की सांस्कृतिक विविधता… ये सब उस अदृश्य संहारकर्ता की बंदूक के निशाने पर है, जो ‘अदर साइड’ में है।

फिल्म कहीं से भी यह संकेत नहीं देती कि वह कौन से देश की कौन-सी गली थी, जिसमें इतने सारे लोगों को बंधक बना लिया गया था। जो लोग बंधक बनाए गए थे उनकी कोई ऐसी पहचान भी कहीं उभरकर नहीं आती, कि वे किसी खास देश या नस्ल या संप्रदाय के नागरिक हैं।

यह जो मिली जुली पहचानों वाली नागरिकता है, जिसमें काले अफ्रीकी गोरे यूरोपीय, साँवले एशियाई सब शामिल हैं, जब हम इतनी विविध पहचानों को एक साथ एक ही गली में घिरा हुआ देखते हैं तब यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होता कि यह कोई ऐसी गली नहीं है, जिसे हम तथ्यात्मक रूप से किसी देशकाल के संदर्भ में पहचान सकें और अदर साइड से गोलियों की बौछार करने वाला भी किसी एक देश या नस्ल, या संप्रदाय का दुश्मन नहीं है, उसकी गोलियाँ सब को समान रूप से अपना शिकार बनाती है।

फिल्म हमारे सामने यह सवाल रखती है और हमारे विवेक को चुनौती देती है कि हम सन 1961 की उस ‘गली’ को किस रूप में देखें। अगर अस्तित्ववादी नजरिए से देखा जाए तो यह वही दशक था, जब मनुष्य ने पहली बार अपनी निजी स्वतंत्रता के महत्व को समझा था और पहली बार उसे महसूस हुआ था कि व्यवस्था चाहे प्रजातांत्रिक हो या समाजवादी हर तंत्र में कहीं न कहीं एक बंद गली है और हर व्यवस्था में एक अदृश्य नियामक ताकत होती है, जो मनुष्य से उसकी निजी अनुभूतियों और उसकी सहजवृत्तियों को छीनकर उसे तंत्र के अनुकूल बनाने की कोशिश करती है।

लघु फिल्मों के कथ्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है। वह अपनी बात किसी खास संदर्भ में या किसी निश्चित अर्थ के जरिए नहीं कहती। वह सिर्फ एक तरह का वातावरण रचती है और दर्शकों के विवेक को चुनौती देती है कि वह खुद कल्पना करे कि ऐसी कौन-सी गली है, जिसमें सबको एक साथ घेर लिया गया है और वह कौन है, जो बिना किसी जातीय या सांप्रदायिक या नस्ली भेदभाव के सबको अपना शिकार बना रहा है। ज्यादा बारीकी से सोचने की जरूरत नहीं है अदर साइड में जो अदृश्य ताकत है उसके लिए इस गली के सभी लोग अपनी विविध पहचानों को खोकर एक ”वर्ग” में बदल गए हैं। एक ऐसा वर्ग जो निहत्था है, जिसने अपने हाथ दीवार के सामने आत्मसमर्पण के लिए उठा दिए हैं।

सवाल उठाया जा सकता है कि इस तरह के फिल्मांकन में तथ्य को छिपाने या उसे अदर साइड में गोपनीय रखने का क्या औचित्य है? अगर फिल्मकार का उद्देश्य किसी खास सत्य की खोज से है तो वह अपने खोजे हुए सत्य को प्रेक्षक के सामने क्यों नहीं रखता?

मारियो वर्गास योसा ने गोपनीय तथ्यों की इस ‘खामोशी’ और अभिव्यक्ति के व्यक्त हिस्सों के द्वंद्व को बड़ी खूबसूरती से अपनी किताब ‘युवा उपन्यासकार के नाम खत’ में रखा है। उनका मानना है कि ‘जब किसी कथा में वाचक टुकड़े-टुकड़े में कुछ कहते हुए बार-बार गायब हो जाता है, तब वह पाठक को यह अवसर देता है कि वह अनुपस्थित सूचनाओं के लिए अपनी कल्पना का इस्तेमाल करे और उन रिक्त स्थानों की पूर्ति अपनी खुद की कल्पनाशक्ति और अपने यथार्थ बोध से करे।’उन्होंने इस तकनीक को ‘छुपे हुए तथ्य’ की तकनीक का नाम दिया था और हेमिंग्वे की मशहूर कहानी ‘किलर्स’ तथा बोर्खेस की ‘द सिक्रेट मिरेकल’ का जिक्र करते हुए यह समझाने की कोशिश की थी कि घटना के छुपे हुए तथ्य या कथ्य के लुप्त अंश कभी अर्थहीन या मनमाने नहीं होते बल्कि वेव्यक्त किए गए तथ्य से भी ज्यादा महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण होते हैं।मनोज रूपड़ा

लेखक के बारे में : प्रख्यात कथाकार मनोज रूपड़ा के दो कहानी संग्रह ‘दफन तथाअन्य कहानियाँ’,  ‘साज-नासाज’ और एक उपन्यास ‘प्रति संसार’ आ चुका है. वे प्रथम नागपुर फिल्म फेस्टिवल में मुख्य वक्ता थे.

25 नवम्बर ( पहला दिन )/ 12.30-1.00/ दी अदर साईड / जोसेफ़ डेलेऊ / संवाद रहित (बेल्जियम)/ ब्लैक एंड व्हाइट/ शॉर्ट फ़िल्म / 1966/ 10मिनट

अटकती साँसें, हाँफता देश

इस बालदिवस पर गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुई बच्चों की मृत्यु की दास्ताँ को फिर से याद करना बहुत ज़रूरी है. सच तो ये है कि ये मौतें हादसा नहीं हत्या थी और हत्याएं ज़ारी हैं. अगस्त के दूसरे सप्ताह में सारा देश क्षोभ और हैरत के साथ इन नौनिहालों की मौत के बारे में पढ़ और देख रहा था पर सब को ये नहीं पता था एक पत्रकार इस आपदा की चेतावनी पहले से दे रहा था .

वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह अपने पोर्टल ‘गोरखपुर न्यूज़ लाईन’ पर लगातार इस बारे में लिख रहे थे. मनोज पिछले एक दशक से इन्सिफेलाईटिस के प्रकोप और हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की नाकामी के बारे में काम करते और लिखते रहे हैं.

मनोज जन संस्कृति मंच के महासचिव हैं और ‘प्रतिरोध का सिनेमा‘ के हरावल दस्ते के सदस्य हैं. हमारे पांचवे फिल्म फेस्टिवल में मनोज सिंह व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे: ‘अटकती सासें हांफता देश’

प्रस्तुत है अगस्त के दूसरे खौफनाक हफ़्ते की आँखों देखी एक्स्क्लूजिव रिपोर्ट मनोज सिंह की कलम से

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दस अगस्त की सुबह 11.20 बजे बीआरडी मेडिकल कालेज के नेहरू अस्पताल में लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई का इंतजाम देखने वाले आपरेटर कृष्ण कुमार, कमलेश तिवारी, बलवंत गुप्ता लिक्विड मेडिकल आक्सीजन प्लांट पर रीडिंग लेने पहुंचे। प्लांट की रीडिंग 900 देखते ही चैंक गए। इसका मतलब था कि 20 हजार लीटर वाले आक्सीजन प्लांट में सिर्फ 900 केजी लिक्विड आक्सीजन उपलब्ध थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। पांच हजार तक रीडिंग पहुंचते ही लिक्विड आक्सीजन लिए टैंकर आ जाता था और प्लांट को रिफिल कर देता था। उन्होंने फौरन हाथ से बाल रोग विभाग की अध्यक्ष को पत्र लिखा और उस पर अपने हस्ताक्षर बनाए। पत्र की काॅपी प्राचार्य, बीआरडी मेडिकल कालेज से सम्बद्ध नेहरू अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक, एनेस्थीसिया विभाग के अध्यक्ष और नोडल अधिकारी एनआरएचएम मेडिकल कालेज को भी भेजी।
उन्होंने लिखा -‘ हमारे द्वारा पूर्व में तीन अगस्त को लिक्विड आक्सीजन के स्टाक की समाप्ति के बारे में जानकारी दी गई थी। आज 11.20 बजे की रीडिंग 900 है जो आज रात तक सप्लाई हो पाना संभव है। नेहरू चिकित्सालय में पुष्पा सेल्स कम्पनी द्वारा स्थापित लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई पूरे नेहरू चिकित्सालय में दी जाती है। जैसे कि-टामा सेंटर, वार्ड संख्या 100, वार्ड संख्या 12, वार्ड 6, वार्ड 10, वार्ड 12, वार्ड 14 व एनेस्थीसिया व लेबर रूम तक इससे सप्लाई दी जाती है। ‘ पुष्पा सेल्स कम्पनी के अधिकारी से बार-बार बात करने पर पिछला भुगतान न किए जाने का हवाला देते हुए लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई देने से इंकार कर दिया है। तत्काल आक्सीजन की व्यवस्था न होने पर सभी वार्डों में भर्ती मरीजों की जान का खतरा ……। अत: श्रीमान जी से निवेदन है कि मरीजों के हित को देखते हुए तत्काल आक्सीजन लिक्विड आक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित कराने की कृपा करें।’
‘ खतरा ’ लिखने के बाद इन आपरेटरों के हाथ कांप गए थे। वे जानते थे आक्सीजन खत्म होने का क्या अंजाम हो सकता है। शायद इसीलिए उनसे आगे कुछ लिखा नहीं गया। उन्हें उम्मीद थी कि खत पहुंचते ही साहब लोग एक्टिव हो जाएंगे और लिक्विड आक्सीजन मंगा लेंगे या उसके विकल्प में आक्सीजन सिलेण्डर की व्यवस्था कर देंगे।
लेकिन आपरेटर नही जानते थे कि एक दूसरे ढंग की खतो खिताबत भी चल रही थी। यह उन लोगों के बीच थी जो  ‘आक्सीजन लेने-देने’ में विशेषज्ञ हैं। यह खतो खिताबत लिक्विड आक्सीजन सप्लाई करने वाली कम्पनी पुष्पा सेल्स प्राइवेट लिमिटेड के बीच छह माह से चल रही थी। मसला यह था कि कम्पनी का बकाया 70 लाख तक पहुंच गया था और उसे मेडिकल कालेज की ओर से भुगतान नहीं मिल रहा था। कम्पनी कह रही थी कि स्थितियां उसके नियंत्रण से बाहर चली गई है। लिहाजा वह लिक्विड आक्सीजन सप्लाई नहीं कर पाएगी। इस मसले का हल एक ताकतवर सरकार और उसके अफसर जो गोरखपुर से लखनउ तक बैठे थे, नहीं निकाल सके।
जो खतरा इन आपरेटरों ने देख लिया था, उसे ये सभी ताकतवर लोग बेखबर बने रहे। ये इतने बेखबर थे एक रोज पहले इसी मेडिकल कालेज में ढाई घंटे तक इंसेफेलाइटिस व अन्य रोगों से बच्चों की मौत पर मंथन करते रहे लेकिन उन्हें यह पता तक नहीं चल सका कि उनके बैठके से 100 मीटर दूरी पर आक्सीजन का मीटर शून्य की तरफ खिसकता जा रहा है। इस गहन मंथन में जादुई निष्कर्ष यह निकला था कि इंसेफेलाइटिस के लिए गंदगी जिम्मेदार है और वे गंदगी खत्म कर इसे भी खत्म कर देंगे। इसके बाद सबने स्वच्छ भारत अभियान का नारा लगाया।
दस तारीख की रात घड़ी की सुईयों ने जैसे ही साढ़े सात बजाए, लिक्विड आक्सीजन का प्रेशर कम होने का संकेत होने लगा। उस वक्त सिर्फ 52 आक्सीजन सिलेण्डर थे। उसे जोड़ा गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 100 बेड के इंसेफेलाइटिस वार्ड में इंसेफेलाइटिस से ग्रस्त बच्चों, जन्म के वक्त संक्रमण व अन्य बीमारियों के कारण भर्ती हुए नवजात तथा वार्ड संख्या 14 में भर्ती वयस्क मरीजों की जान जाने लगी। शाम साढ़े सात बजे से 11 बजे तक आठ बच्चों की जान चली गई। अगले दिन दोपहर तक कोहराम मच गया। 24 घंटे में 25 और जाने चली गईं।
यह खबरें मीडिया के जरिए सार्वजनिक हुईं तो लोग गम में डूब गए। सोशल मीडिया उनके दुख और क्षोभ की अभिव्यक्ति का मंच बनने लगा।

gorakhpur tragedy 2

दम तोड़ती संवेदना

और इसी वक्त वे किरदार फिर नमूदार हुए जिन्होंने इंसेफेलाइटिस के खात्मे का दो दिन पहले समाधान ढूंढ लिया था। कैमरे के चमकते फलैश के बीच कागजों को उलटते-पुलटते सबसे पहले जिले के सबसे बड़े हाकिम ने घोषणा की कि आक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई। वैकल्पिक इंताजम पूरे थे। मौतों की यह संख्या ‘ सामान्य ’ है। यहां 18-20 मौतें तो हर रोज होती रही हैं। फिर भी हम जांच करेंगे। चार अफसरों की कमेटी बना दी है। कोई जिम्मेदार पाया जाएगा तो सख्त कार्रवाई होगी। जब हाकिम यह बात कह रहे थे तो उनके कमरे के बाहर कुशीनगर जिले के रामकोला की संगीता और उसकी बेटी दहाड़े मार रो रही थीं। संगीता के सात दिन के नाती की मौत हो गई थी। बच्चा नियोनेटल वार्ड में पड़ा था। एक दिन पहले ही वह आया था। मां-बेटी की चीख डीएम के प्रेस कांफ्रेस के कमरे तक पहुंच रही थी और मीडिया को ब्रीफिंग में दिक्कत आ रही थी। दरवाजा बंद करने का आदेश हुआ लेकिन चीखें दरवाजा और मेडिकल कालेज की दीवारें पार कर अंदर पहुंचती रहीं।
अगले दिन सरकार के दो-दो मंत्री आए। आते ही वे दो घंटे तक बैठक के लिए एक कमरे में बंद हो गए। बाहर टीवी चैनलों के कैमरे उनका इंतजार कर रहे थे। इधर वार्ड में मौत का तांडव जारी था। विजयी की बेटी शांति और विजय बहादुर का बेटा रोशन की जान जा चुकी थी। डाॅक्टर इसलिए शव नहीं दे रहे थे कि वार्ड माओं की चीखों से गूंजने लगेगा और इसी दौरान मंत्री आ जाएं तो उन्हंे अच्छा नहीं लगेगा। टीवी वाले भी इनकी मौत का ‘ तमाशा ’ बनाएंगे।
दोनों मंत्री घंटे बैठक के बाद निकल तो एक के हाथ बहुत से कागजात थे तो दूसरे के हाथ में एक आर्डर। कागजात वाले मंत्री ने मीडिया को बताया कि मैने दो वर्ष के अगस्त महीने के रिकार्ड देखे हैं। इन महीनांे में 500-600 मौतंे हो जाती हैं। यह ‘ सामान्य ’ है। इस वर्ष आंकड़े बढ़े नहीं हैं। दूसरे मंत्री ने कहा कि आक्सीजन संकट में प्रिसिपल की लापरवाही है। उन्हें सस्पेंड किया जाता है। उन्होंने नौ अगस्त की मीटिंग में मुख्यमंत्री के समक्ष आक्सीजन सप्लाई करने वाली कम्पनी को भुगतान न करने का मामला उठाया नहीं था। मुख्यमंत्री इससे अवगत नहीं थे। ’
इसके बाद ही प्रिसिंपल का त्यागपत्र मीडिया में आता है जिसमें उन्होंने लिखा है कि बच्चों की मौत में उनकी कोई गलती नहीं हैं। वह बच्चों की मौत से बहुत आहत हैं। इसलिए प्रिसिंपल का पद छोड़ रहे हैं। ’
दोनों मंत्री लौट गए। फिर शाम को लखनउ में एक बार फिर सरकार मीडिया के सामने आई। सीएम बोलते हैं कि आक्सीजन का पैसा तो पांच अगस्त को भी गोरखपुर भेज दिया गया था। प्रधानमंत्री जी बच्चों की मौत से दुखी हैं। ’
विपक्षी नेताओं की गाड़िया एक के बाद एक मेडिकल कालेज पहुंच रही हैं। अंदर काली वर्दीधारी कमांडो तैनात हैं। ऐसा लगता है कि कोई आतंकवादी हमला हुआ है। विपक्षी नेता संवेदना प्रकट करते हुए बाहर आते हैं। मीडिया वाले कैमरा लिए दौड़ पड़ते हैं। विपक्षी नेता की आवाज टीवी पर एयर होने लगती है-सीएम संवदेनहीन हैं। वह इस्तीफा दें।
बड़ी-बड़ी गाड़ियों, सफेद लकदक कुर्ते मंे लैस नेताओं के बीच में से कंधे पर अपने लाडलों का शव लादे रोती-विलखती माएं और पिता दीखते हैं। बाबा राघवदास की प्रतिमा पर मोमबत्ती जलाने वाले आ पहुंचे हैं। तभी हवा तेज हो जाती है और सभी मोमबत्तियां एक साथ बुझ जाती हैं। रात का रिपोर्टर रात डेढ़ बजे अपनी खबर अपडेट करता है-24 घंटे में फिर 11 बच्चों की मौत हो गई है।
13 अगस्त की सुबह बूंदाबांदी से होती है। भादो का महीना है लेकिन आसमान जमकर बरस नहीं रहा है। लगता है कि उसके पास पानी की कमी हो गई है। अचानक चैनलों के ओवी वैन तेजी से मेडिकल कालेज की तरफ भागने लगते हैं। खबर तैर जाती है कि सूबे के मुख्यमंत्री आ रहे हैं। उनके साथ नड्ढा साहब भी हैं। इंसेफेलाइटिस वार्ड में सफारी पहने सुरक्षा कर्मी कुत्तों को लेकर घूम रहे हैं जो सबको संूघते जाते है। वार्ड के फर्श चमकाए जा रहे हैं। मीडिया को छोड़ सभी को बाहर जाने का आदेश गूँज रहा है।
दो दिन से खाली आक्सीजन प्लांट के पास एक टैंकर आ गई है। वह रात दो बजे लिक्विड आक्सीजन लेकर आई। प्लांट में आक्सीजन रिफिल हो गई है। मीटर का रीडिंग छह हजार बता रहा है।
दोपहर 12 बजे हलचल तेज हो जाती है। गेट पर मास्क लगाए डाॅक्टर मुस्तैद हो जाते हैं। सीएम और हेल्थ मिनिस्टर तेजी से वार्ड में घुसते हैं। साथ में तमाम नेता भी अंदर आ जाते हैं। अंदर पत्रकार पहले से मौजूद हैं। एक टीवी रिपोर्टर बाहर चीख रही है कि अस्पताल में इतने लोगों को नहीं जाना चाहिए। कुछ देर बाद अंदर से खबर आती है कि भीड़ के दबाव में एक दरवाजे का शीशा टूट गया है। सूचना विभाग के एक अफसर बाहर आते हैं और मीडिया कर्मियों से कहते हैं सेमिनार हाल में चलिए। वही सीएम साहब बात करेंगे। पत्रकार सेमिनार हाल की तरफ चल पड़ते हैं। तभी कुछ पत्रकारों के मोबाइल पर खबर फलैश होने लगती है कि इंसेफेलाइटिस वार्ड में सीएम भावुक हो गए। आंख पोछते देखे गए।
प्रेस कांफ्रेस में सीएम गंभीर होने के साथ दुखी नजर आ रहे हैं। वह सूचना देते हैं कि प्रधानमंत्री बच्चों की मौत से बहुत दुखी है। यह वाक्य वह कई बार रिपीट करते हैं। फिर वह कहते हैं कि इंसेफेलाइटिस के लिए उनसे ज्यादा कौन लड़ा है ? उनसे ज्यादा इस मुद्दे पर कौन संवेदनशील हैं ? यह कहते हुए उनका गर्ला भर्रा जाता है। कुछ पत्रकार मोबाइल पर तत्काल खबर अपडेट करते हैं कि सीएम एक बार फिर भावुक हुए। वह मीडिया से अपील करते हंै-फेक खबर न चलाइए। तथ्यों पर रिपोर्ट करिए। मुख्य सचिव की रिपोर्ट आने दीजिए। जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई होगी कि नजीर बनेगी।
अब हेल्थ मिनिस्टर नड्ढा साहब बोल रहे है। वह तस्दीक करते हैं कि सीएम साहब ने इंसेफेलाइटिस के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष किया है। वह इस बार संसद में नहीं थे तो इंसेफेलाइटिस का मुद्दा नहीं उठा। वही हर बार यह मुद्दा उठाते थे। वह घोषण करते हैं कि वायरल रिसर्च सेंटर के लिए 85 करोड़ रूपया दिया जा रहा है।
अब पत्रकारों के सवाल पूछने की बारी है। चैनल वाले सबसे पहले सवाल पूछ रहे हैं। सवाल पूछने के पहले कई बार अपने चैनल का नाम और अपना नाम ले रहे हैं। एक-दो सवाल के बाद आक्सीजन का सवाल उठ जाता है। कई पत्रकार एक साथ सवाल पूछने लगते हैं। पीछे वाले पत्रकार सवाल पूछने के लिए आगे आते हैं तभी धन्यवाद की आवाज आती है और सीएम उठ जाते हैं। प्रेस कांफ्रेस खत्म हो जाती है।
शाम को खबर आती है कि डा. कफील इंसेफेलाइटिस वार्ड के नोडल अफसर पद से हटा दिए गए हैं। ये वही डाॅक्टर हैं जिन्हें आक्सीजन संकट के वक्त संवेदनशीलता दिखाने के लिए प्रशंसा पाई थी। अब उनके बारे में तमाम ज्ञात-अज्ञात बातें सोशल मीडिया पर आने लगती हैं। दो दिन का ‘ मीडिया का नायक ’ ‘ खलनायक ’ में बदलने लगता है। आक्सीजन, बच्चों की मौत चर्चा से गायब होने लगती है। सोशल मीडिया पर दो दिन से चुप साधे लगे गरजने लगे हैं।
सुबह की बूंदाबादी रात में तेज बारिश में बदल गई है। रात का रिपोर्टर खबर अपडेट कर रहा है-आधी रात को तमाम चिकित्सक, कर्मचारी, लिपिक मेडिकल कालेज में ही मौजूद हैं। कम्प्यूटर पर आंकड़े तैयार किए जा रहे हैं। 24 घंटे में 12 और बच्चों की मौत हो गई हैै। वार्ड संख्या 14 में दो और मरीज मर गए हैं।

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5 वें उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल में मिलिए ‘गोरखपुर न्यूज़ लाईन’ से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार एवं जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह से पड़ताल सत्र के दौरान | 27 नवंबर 2017 : सोमवार : सुबह 11.30 से 1.00

 

तुरुप : नए सिनेमा की धमक

हमारे फेस्टिवल की एक महत्त्वपूर्ण प्रस्तुति है फ़ीचर फ़िल्म ‘तुरुप’. एकतारा कलेक्टिव द्वारा निर्मित इस फिल्म के बारे में लिख रहे हैं ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी :

 

आज से एक दशक पहले जब हम नयी तकनीक और उसके फलस्वरूप निर्मित होने वाली नयी सिनेमाई संभावनाओं की बात करते थे तोकुछ लोग इसे सिनेमाई फ़सक से ज्यादा न समझते थे. अब समय बीतने पर जैसे –जैसे कैमरा आम लोगों की पहुँच में आता गया और छोटे किफ़ायती प्रोजक्टरों की वजह से नए –नए सिनेमा हाल बनाना संभव होने लगा नया सिनेमा भी निर्मित होकर हम तक पहुँचने लगा है. इस सन्दर्भ में मथुरा का जन सिनेमा, समूचे भारत में सक्रिय होने को तत्पर सर्वहारा स्टूडियो और एक दशक से मध्य प्रदेश में काम कर रहे एकतारा कलेक्टिव पर बात करना नितांत जरुरी है.

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जन सिनेमा और सर्वहारा स्टूडियो ने अब तक आम लोगों के सहयोग अपनी एक –एक फ़ीचर फ़िल्म पूरी कर अब दूसरी की तैय्यारी में जुटे हैं जबकी एकतारा कलेक्टिव की यह पहली फ़ीचर फ़िल्म है. इससे पहले यह समूह 2011 में‘चंदाके जूते’ और 2013में‘जादुई मच्छी’ नाम से दो लघु कथा फिल्में निर्मित कर चुका है.

एकतारा कलेक्टिव की नयी फ़िल्म ‘तुरुप’ सिनेमा हाल में चलने वाली आम मुम्बईया फ़िल्मों से मामूली सी कम अवधि की यानि 71 मिनट की है. यहाँ अवधि पर विशेष जोर देना इसलिए है क्योंकि इस वजह से यह कथा फ़िल्मों के आम दर्शकों तक भी अपनी पहुँच बना सकेगी. तुरुप की कहानी और उसका सिनेमाई ट्रीटमेंट दोनों ही बहुत खास है शायद इसलिए यह नए सिनेमा की महत्वपूर्ण फ़िल्म भी साबित होगी. यह एक आम क़स्बे की कहानी है जिसमे किसी तरह गुजर –बसर करने वालेलोग हैं जिनके लिए शतरंज की एक बिसात खेल लेना ही बहुत बड़ी बात है. क़स्बे के चक्की चौराहे पर एक एक चबूतरे के नीचे फ़र्श पर बकायदा एक शतरंज बना हुआ. इसी के बहाने पूरे क़स्बे की जुटान होती है. तिवारी जी और माजिद इस क़स्बे के सबसे उम्दा खिलाड़ी हैं. तिवारी जी शतरंज के अलावा हिन्दू राष्ट्रवाद की बिसात बिछाने में भी जुटे हैं. माजिद ड्राइवर है और क़स्बे की ही दलित लड़की लता से प्रेम करता है. लता अपनी छोटी सी नौकरी के जरिये अपने बीमार बाप और छोटे भाई की भी गुजर बसर करती है. तिवारी के लोग हिन्दू राष्ट्रवाद के पतीले को सुलगाने में लगे हैं. इसलिए तिवारी का सहायक माजिद और लता के सम्बन्ध को पसंद नहीं करता और एक दिन चाय की दुकान पर माजिद के साथ जबरदस्ती करते हुए उसे इस क़स्बे को छोड़ने की चेतावनी देता है. माजिद कहीं और से इस क़स्बे में कमाने आया है. लेकिन सभी कहीं न कहीं से कमाने आये हैं यह ख़ास डायलाग एक आम आदमी शतरंज के खेल के दौरान कहता है जब तिवारी का सहायक माजिद और लता के सम्बन्ध के बहाने माजिद को क़स्बे से बाहर करने की बात करता है.

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तिवारी के राष्ट्रवाद को खाद उभरते हुए उद्योगपति वरुण से भी मिलती है जिसकी अकेली पत्नी नीलिमा गुजरे जमाने की पत्रकार है और अपने पति के पाखंड से ऊब चुकी है. एक नए घटनाक्रम में तिवारी का गैंग क़स्बे में हुई एक अंतरधार्मिक शादी को तूल देने की कोशिश करता है और नीलिमाअपनी घरेलु सहायिका मोनिकाके जरिये तिवारी के षड्यंत्र पर एक न्यूज़ स्टोरी कर पानी फेरती है. तिवारी के गैंग की चाल पर पानी फिरना और चक्की चौराहे के शतरंज के टूर्नामेंट में तिवारी का माजिद के हाथों टूर्नामेंट हारना साथ –साथ चलता है.

 

तुरुप की ख़ास बात यही है कि यह समाज में बुने जा रहे नए षड्यंत्रों को चुपचाप अपनी कहानी का हिस्सा बना पाती है. इस फ़िल्म का बनना इसलिए और भी ख़ास है क्योंकि नयी तकनीक पर सवार होकर यह अब नए कस्बों-मुहल्लों में पहुंच सकेगी.

 

संजय जोशी

 

26 नवम्बर ( दूसरा दिन ) / 12.00 -1.30/  तुरुप/ एकतारा कलेक्टिव/ हिंदी- अंग्रेजी सब-टाइटल्स/ फ़ीचर फ़िल्म/ 2017/ 72 मिनट

हिमालयी कस्बे में प्रतिरोध का सिनेमा का एक नया अनुभव

पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) जिले का दशाईथल क़स्बा, जो तकरीबन 1900 मीटर की ऊंचाई पर बसा है, का मौसम और नजारा अति सुन्दर है। जहाँ एक बार जाने के बाद बार-बार जाने का हर किसी का मन करता है। पिथौरागढ़ ही नहीं हल्द्वानी शहर से ऊपर चढ़ाई चढ़ने पर रास्ते में आने वाले भीमताल, भुवाली, अल्मोड़ा और छोटे बड़े हर गांव-कस्बे की अपनी अलग सुंदरता है। रास्ते में मिलने वाले काफल, अल्मोड़ा में सीधे सपाट रेखा में बना लाला बाजार और खीम सिंह मोहन सिंह रौतेला, जोगा साह जैसी मिठाई की दुकानें जो की पिछली पाँच पीढ़ियों से चल रही है, उन पर मिलने वाली कुमाउँनी सिंगोंड़ी और बाल मिठाई भी प्रदेश भर में काफी प्रचलित है। इन सबके बावजूद दशाईथल कस्बे में बना ‘कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय’ आपको अपनी तरफ आकर्षित करता है। इसका कारण यहाँ के बच्चे और उनमें नित-रोज ऊर्जा का संचार करती वहां की हॉस्टल वार्डन रेनू शाह हैं।

दरअसल प्रतिरोध के सिनेमा की दो दिवसीय कार्यशाला के लिए इस विद्यालय को करीब से जानने और समझने का मौका मिला तो पता चला कि यहाँ अधिकतर वे ही बच्चे है जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है और रहने खाने का खर्च एवं अन्य सुविधाओं पर व्यय करने में असमर्थ है। बावजूद इसके यहाँ की हॉस्टल वार्डन (रेनू शाह) ने अन्य विद्यालयों की तुलना में यहाँ बेहतरीन सुविधाएँ उपलब्ध करवाई है। यहाँ के बच्चे पढने लिखने में तो अव्वल है ही बल्कि खेलकूद और गाने-बजाने में भी पीछे नहीं है। विद्यालय का ऑफिस रूम जिसमे विभिन्न प्रतियोगिताओं में जीती ट्राफियां सजी हैं इस बात का गवाह है। यही नहीं यहाँ के बच्चे बिना किसी ट्रेनिंग के अपना ऑर्केस्ट्रा चलाते है जिसमें बॉलीवुड से लेकर राजस्थानी, पंजाबी और पहाड़ी लोक गीत गाते है।

इसी कड़ी में प्रतिरोध के सिनेमा की ओर से यहाँ के बच्चों को ‘सिनेमा और कल्चर’ पर दिया गया एक्सपोज़र देश के अन्य एलिट स्कूल्स में बच्चों को दिए जाने वाले एक्सपोज़र से बेहतरीन था। जिसमें मुख्यधारा के सिनेमा से इतर ऐसा सिनेमा दिखाया जिसकी अपनी अलग ही पहचान है लेकिन तड़क-भड़क और पर्याप्त मार्केटिंग न होने के कारण बहुत कम लोगों तक पहुँचा है। यह पूरी कार्यशाला बच्चों में अच्छा सिनेमा देखने की आदत और सिनेमा की भाषा पर उनकी समझ बनाने पर केंद्रित थी। सीखने सिखाने के लिहाज़ से यह न सिर्फ खास था बल्कि मेरे लिए भी एक नया अनुभव था। इसके अलावा बच्चों को दुनिया की सैर भी करायी गयी।

प्रतिरोध के सिनेमा की एक खासियत यह भी है कि यह सिनेमा को न सिर्फ उसकी कला के पहलू से देखता है बल्कि उसे सामाजिक पहलू से भी जोड़कर देखता है और उस पर बात भी करता है। यही कारण है कि प्रतिरोध के सिनेमा ने उदयपुर के स्थानीय फ़िल्मकार की फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’, नार्मन मेक्लेरन की ‘चेयरी टेल’ और ‘नेबर्स’  और गीतांजलि राव की  ‘प्रिंटेड रेनबो’ से लेकर नागराज मंजुले की ‘फैन्ड्री’ ‘सैराट’, ‘मसान’ सूर्यशंकर दास और आनंद पटवर्धन की फिल्मों तक की विशाल रेंज को अपने फेस्टिवल्स में दर्शकों को दिखाया है।

दूसरी खासियत यह है कि फ़िल्म दिखाने के बाद चर्चा करना. फ़िल्म दिखाना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण फ़िल्म पर चर्चा करना भी है। यहाँ बच्चियों को जब लखनऊ के एन जी ओ सनतकदा द्वारा निर्मित  ‘सबा की कहानी’ फ़िल्म दिखायी गयी तब फ़िल्म के बाद चर्चा में बच्चियां अपनी बात रखते हुए बताती है कि वे भी अपनी कहानी और अपने सपनों को फ़िल्म के माध्यम से बताना चाहती है। आगे जब उनसे उनके सपनों के बारे में पूछा गया तो यह सामने आया की कोई आई पी एस बनना चाहती है, कोई आरटीओ तो कोई सामाजिक कार्यकर्त्ता बनकर समाज में बदलाव लाना चाहती है। इसी तरह किसी की चाह है कि फ़िल्मकार बने तो कोई संगीत के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहती है। मदुरै नगर परिषद में काम करने वाली दलित महिला सफाई कर्मी पर बनी अमुधन आर पी निर्देशित दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘पी’ पर भी बच्चों की प्रतिक्रिया इतनी गंभीर रही कि वे उस महिला और वहां की स्थिति के बारे में और विस्तार से जानना चाह रहे थे।

तीसरा यह सिर्फ सिनेमा ही नहीं बल्कि कला के और रूपों का भी पक्षधर है जिसमें थिएटर, कविता पाठ, गायन, कहानी विधा आदि, इसीलिए बल्ली सिंह चीमा के गीत ‘ले मशालें चल पड़े है’ और अदम गोंडवी और दुष्यंत कुमार की कृतियों से मिश्रित गीत ‘सौ में सत्तर आदमी’ से कार्यशाला के दूसरे दिन की शुरुआत की गयी। जिसको बच्चों ने काफी मजे से सुना और गाया भी, अगली बार कोशिश रहेगी कि नाटक और कहानी विधा पर भी बच्चों को थोड़ा एक्सपोज़र दिया जाये। प्रतिरोध के सिनेमा की एक और खासियत है कि यह निम्नतम संसाधनों से भी अपना काम चला लेता है। जहाँ बच्चों को सिनेमा दिखाया गया वहां न तो स्क्रीन उपलब्ध थी और न ही उपयुक्त स्पीकर्स हॉल भी सिनेमा दिखाने के उद्देश्य से नहीं था, किन्तु काम चलता गया हॉल की दीवार स्क्रीन बनी और प्रोजेक्टर के इन-बिल्ट स्पीकर से काम चलाया गया। मुझे लगता है यही अनुशासन किसी कैंपेन को निरंतर रखने और आगे बढ़ाने में सहायक है।

वर्त्तमान समय में निम्न स्तर के टीवी सीरियल और फिल्मों से इतर प्रतिरोध का सिनेमा एक अनूठा विचार है जो यह कभी नहीं कहता कि यह मत देखिये बल्कि यही कहता है कि यह भी देखिये। आज राष्ट्रवाद के समय में जहाँ हर किसी को अपने देश भक्त होने का प्रमाण देना होता है प्रतिरोध का सिनेमा ‘दि नेबर्स’ और ‘टू सलूशन फॉर वन प्रॉब्लम’ दिखाकर कहेगा कि अपने पड़ौसी से प्यार करिये और कुछ तकरार है तो संवाद के विकल्प को अपनाइये। इसके लिए जरुरी है कि प्रतिरोध का सिनेमा हर जगह पहुंचे। हर जगह पहुँचाने के लिए जरुरी है कि जहाँ भी जाये वहां सिनेमा की एक लाइब्रेरी स्थापित हो जहाँ से आस-पास की जगहों को फ़िल्मों का वितरण किया जा सके। उसको चाहने, देखने और समझने वाले लोग बढ़े जो अपनी स्थानीय जगहों पर इस कारवां को आगे बढ़ाये।

आने वाले समय में दीवार की जगह स्क्रीन हो, अलग से स्पीकर हो इसके लिये प्रतिरोध का सिनेमा हमेशा अपने चाहने वालों से सहयोग की अपेक्षा करता रहेगा।
धर्मराज जोशी

प्रतिरोध का सिनेमा की उदयपुर फिल्म सोसाइटी से जुड़े धर्मराज फ़िलहाल बेंगलुरु में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में मास्टर्स की पढ़ाई कर रहे हैं . उन्होंने फ़िल्म सोसाइटी सक्रियता के अलावा लम्बा समय बच्चों के साथ अध्यापन में भी बिताया है. उनसे joshidharmraj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय दशाईथल, गंगोलीहाट

विद्यालय की बालिकाओं का ऑर्केस्ट्रा

स्क्रीनिंग टाइम…

फ़िल्म के बाद चर्चा की बारी…

ग्रुप फ़ोटो

अब सेल्फ़ी की बारी…

अलविदा साथियों अगली बार फिर मिलेंगे….

अब फ़िल्म महोत्सव विद्या भवन ऑडिटोरियम में होगा

The Fourth Udaipur Film Festival, organised by Udaipur Film Society and the Cinema of Resistance campaign has been threatened and its venue forcibly shifted (by getting the original venue cancelled) on behest of, who else but, the ABVP. The 4th UFF has been conceived on the theme of “Voices from the Dalit resistance”, and features films that highlight Dalit student suicides, the Una movement, the expose of the Kairana “Hindu exodus”, fictions like Sairat, Anhey Ghorhey da Daan, and new documentaries on Dalit resistance like “Flames of Freedom: The Ichchapur Declaration”. The Sangh is afraid of precisely these films as is evident from the content and language of their letter forcing the administration to cancel the pre-assigned venue on the eve of the festival.

Please read the full PRESS RELEASE and spread the word and stand in solidarity with the committed team of Udaipur Film Society and the Pratirodh ka Cinema campaign who are determined not to buckle under pressure and go ahead with the full festival at an alternative venue.

साथियों, अधिकतम प्रसार की अपील के साथ यह प्रेस विज्ञप्ति प्रेषित है हमारा फेस्टिवल ‘दलित प्रतिरोध के उभरते स्वर’ पर केन्द्रित है. जाहिर है यह विषय सत्ता में बैठे लोगो को नहीं पचा साथ ही अटेचमेंट में संलग्न एबीवीपी की प्रेस विज्ञप्ति की भाषा भी देखिये :

प्रेस विज्ञप्ति

कल 14 अक्तूबर से शुरू होने वाले चौथे उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल को फेस्टिवल शुरू होने से ठीक एक दिन पहले की शाम को संघ और प्रसाशन ने दबाव बनाकर रुकवाने की भरपूर कोशिश की. फिल्मोत्सव के आयोजकों को पुलिस प्रसाशन द्वारा बुलाकर देर रात तक लम्बी बैठक की गयी. प्रशासन से बैठक का कारण यह था कि राजकीय कृषि महाविद्यालय का ऑडिटोरियम जो कि फ़िल्म महोत्सव करने का स्थल था यूनिवर्सिटी द्वारा रद्द कर दिया गया और इसका कारण यह बताया गया कि प्रशासन से कार्यक्रम की पूर्वानुमति नहीं ली गयी थी. ज्ञातव्य है कि उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी पिछले चार साल से यह फ़िल्म फेस्टिवल कर रही है, न तो पिछले तीन फिल्मोत्सवों में कोई पूर्वानुमति ली गयी और न ही किसी भी सांस्कृतिक आयोजन में कभी भी ऐसी किसी अनुमति की जरुरत होती है.

दरअसल अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के द्वारा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति को ज्ञापन सौंपा गया था. जिसमे फ़िल्म महोत्सव को आग भड़काने और बाबा साहेब आंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाला बताया गया. कुलपति ने दबाव में आकर विश्विद्यालय सभागार में कार्यक्रम को निरस्त कर दिया जबकि इसकी पूर्व लिखित अनुमति सोसाइटी ने पहले ही ले ली थी एवं निर्धारित शुल्क 24,450 रूपये भी जमा करा दिए थे.

विश्वविधालय द्वारा अनुमति निरस्त किए जाने के बाद सोसाइटी को आनन-फानन में नया कार्यक्रम स्थल चुनना पड़ा. अब यह फ़िल्म महोत्सव विद्या भवन ऑडिटोरियम में होगा. पूरा कार्यक्रम तीनो दिन यथावत वैसे ही रहेगा.

इस ख़बर के साथ एबीवीपी की प्रेस विज्ञप्ति और कृषि महाविद्यालय के डीन के द्वारा दिया गया निरस्तगी का पत्र संलग्न है. विद्यार्थी परिषद् की प्रेस विज्ञप्ति में रोहित वेमुला, गुजरात के ऊना मामले और कैराना जैसे विषयों पर फ़िल्म प्रदर्शन और बहस को धर्म एवं जाति पर लड़वाने वाला विषय बताया गया और यह सब मामले छात्रों को बरगलाने की साजिश बताये गये हैं. फेस्टिवल के आयोजकों द्वारा कहा गया कि जातिगत शोषण के सभी मुद्दों पर बात एवं बहस करके ही जतिमुक्त समाज की दिशा में बढ़ा जा सकता है. इन सभी मुद्दों पर बात करके एवं जातिगत भेदभाव एवं अन्याय का कड़ा विरोध करके ही हम एक समतामूलक समाज की दिशा में आगे बढ़ सकते है. अतः इन विषयों पर चुप्पी नहीं बल्कि बात करना ही जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है. पुलिस प्रशासन द्वारा जिन फिल्मों पर आपति एवं सवाल उठाये गये उनके बारें में सोसाइटी का कहना है कि वह सभी फ़िल्में देश के प्रतिष्ठित निर्माताओं और निर्देशकों द्वारा बनाई गयी है. जिन्हें देश विदेश में पर्याप्त प्रशंसा भी मिली है.

लोग जुड़ते गए कारवां बढ़ता गया…

कुमार सुधीन्द्र पहले फिल्मोत्सव से ही उदयपुर फिल्म सोसाइटी के सक्रिय सदस्य हैं. उन्हें उदयपुर फिल्म सोसाइटी के आधार स्तंभों में से एक कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी. इस बार के बैनर-पोस्टर-बैजेस सभी कुछ उन्हीं के डिजाइन किये हुए हैं. वे संक्षिप्त अवधि के लिए ‘उदयपुर फिल्म सोसाइटी’ के संयोजक भी रहे हैं.

सुधीन्द्र ने अपने और सोसाइटी के चार साला सफ़र पर यह लेख लिखा है. इसमें हम उनकी प्रतिबद्धता और सरोकारों की झलक भी पा सकते हैं और टीम की एकजूटता  का रोमांच भी महसूस कर सकते हैं.

प्रस्तुत है लेख :

 

साल 2013 मेंसितंबर14 और 15 को जब ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के पहले उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल का आगाज़ हुआ उससे पहले इस मुहीम के तहत देशभर में 40 से अधिक फ़िल्म फ़ेस्टिवल हो चुके थे। उदयपुर में इसकी शुरुआत के पीछे यहाँ के जनवादी प्रगतिशील बुद्धिजीवियों और युवाओं का लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति ज़िम्मेदारी का भाव रहा है कि जब देश और दुनिया में आमजन से जुड़े सरोकार के मुद्दों पर संवाद उभरकर सामने नहीं आ रहा है तब क्यों ना सिनेमा के जरिये यह पहल की जाये।जिसमें सरोकारी सिनेमा, नाटक, क़िस्सागोई, पोस्टर-पेंटिंग, गीत, कविता आदि सभी माध्यमों के जरिये आमजन जिसमें खासतौर से हाशिये के लोगों के सवालों को मुख्यधारा के समाज के सामने लाया जाये और इसके लिए वैकल्पिक रास्ते सुझाये जाएँ।

1291376_540402929372731_97138084_oइसी विचार केआधार पर हुए हुए पहले उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के सफल आयोजन में देश-दुनिया का सिनेमा देखा और दिखाया गया। यह फ़ेस्टिवल ख्यातनाम फ़िल्म अभिनेता बलराज साहनी को समर्पित था जिसमें उनकी फ़िल्म ‘गरमहवा’ दिखाई गई। जैसा कि इस पहल के पीछे का मकसद आमजन से जुड़े मुद्दों पर संवाद स्थापित करना था, तो इस पहले फ़िल्म फ़ेस्टिवल से ही संवाद की यह प्रक्रिया शुरू हो गई। हर फ़िल्म के प्रदर्शन के बाद उस पर दर्शकों के साथ फ़िल्मकार और निर्देशक के बीच संवाद रखा गया जिससे स्थानीय लोगों को दिखाई गई फ़िल्म की पॉलिटिक्स और उसके दर्शन के बारे में समझना आसान हुआ। पहले फ़ेस्टिवल में मशहूर दस्तावेज़ी फ़िल्मकार आनंदपटवर्धन उनकी दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘जयभीमकॉमरेड’ की स्क्रीनिंग में मौजूद रहे और उनके साथ हुआ दर्शकों का ज्वलंत संवाद आज भी हमारे मानसपटल पर दर्ज़ है। इस दो दिवसीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल से शुरुआत के बाद दूसरा उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल तीन दिन का रखा गया जो साल 2014 मेंसितंबर 5-7 को किया गया। इसकी खास बात यह थी कि इसमें हमने उदयपुर के स्थानीय फ़िल्मकारों को जगह देने के साथ-साथ राजस्थानी सिनेमा को भी देखा और दिखाया। इसमें पति-पत्नी के रिश्तों की विभिन्न परतों को सामने लाती राजस्थानी फ़िल्म ‘भोभर’ प्रमुख थी। इस दौरान इसके लेखक रामकुमार सिंह के साथ संवाद भी हुआ जो कि उल्लेखनीय है। इनके साथ चैतन्य तम्हाणे मराठी फ़िल्म ‘फँड्री’,नकुल सिंह साहनी अपनी दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘इज्जतनगर की असभ्य बेटियां’ और मोहम्मद गनी अपनी फ़िल्म ‘क़ैद’ के साथ हमारे कारवां में सहभागी बने। यह फ़ेस्टिवल चित्रकार ज़ैनुल आबेदिन,  फ़िल्मकार ख़्वाजा अब्बास अहमद, ज़ोहरा सहगल और नबारुण भट्टाचार्य को समर्पित था।

दूसरे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के बाद हम साल 2015 में तीसरे फ़िल्म फ़ेस्टिवल के आयोजन की ओर बढ़े। इससे पूर्व हमने मासिक फ़िल्म प्रदर्शन की प्रक्रिया को जारी रखा। इससे हमें छोटी-छोटी कोशिशों में नए साथियों तक पहुंचे। पूर्व के दोनों फ़ेस्टिवल के अनुभवों से सीखते हुए हम लोगों ने तीसरे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल से पहले कई मासिक फ़िल्म स्क्रीनिंग की। स्कूलों और कॉलेजों तक हमारी पहुँच रही। स्कूलों में की गई फ़िल्म स्क्रीनिंग को हमने ‘बालरंग’ नाम से एक खास पहचान दी और सलूम्बर ब्लॉक में अपनी पहुँच बनाते हुए ‘मोबाइल / टूर फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ किया। इसी तरह उदयपुर के बाहर राजसमंद जिले के नाथद्वारा ब्लॉक में भी फ़िल्म स्क्रीनिंग के जरिये ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ ने आम लोगों के बीच अपनी जगह बनाई। उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी के पूर्व संयोजक शैलेंद्र बताते है कि जावरमाइंस और कुंवारिया कस्बे के स्कूलों में भी स्क्रीनिंग की गई। शहर के मोहल्लों में बच्चों का फ़िल्म क्लब बनाया गया-  सतरंगी चिल्ड्रन फ़िल्म क्लब।

इन सारी प्रकियाओं से गुजरते हुए हम तीसरे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के करीब पहुंचे। दिन थे 25-26-27 सितंबर, साल 2015। यहाँ तक पहुँचते हुए हम अपनी सिनेमाई समझ और काम का दायरा बढ़ा चुके थे। इस कारवां में मिले कई साथी अब स्कूल-कॉलेज की स्क्रीनिंग नियमित सँभालने लगे हैं और कुछ साथी फ़िल्म सोसाइटी की मासिक स्क्रीनिंग। कुछ साथियों ने बालरंग की स्क्रीनिंग का ज़िम्मा उठाया हुआ है तो कुछ साथी इसमें नवाचार करने की कोशिशों में लगे हुए हैं। अपने जूनून और जज़्बे के चलते हमारे साथियों ने चित्तौड़गढ़, सलूम्बर, नाथद्वारा, जयपुर और जमशेदपुर में फ़िल्म सोसाइटी शुरू कर ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ का विस्तार किया। यहाँ खास बात यह है कि 26 सितंबर 2015 को लंदन (यू.के.) में भी इस सिनेमा का एक और चैप्टर शुरू हुआ।

तीसरे फ़िल्म फ़ेस्टिवल में तीन बातें सबसे प्रमुख रही, पहली इस फ़ेस्टिवल के जरिये उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी से जुड़े युवा साथी कुमार गौरव ने जमशेदपुर दंगे पर बनी अपनी पहली दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘कर्फ़्यू’ दिखाई।

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तीसरे फेस्टिवल में पोस्टर

दूसरी बात यह कि इस आयोजन में हमारे साथ थिएटर टीम ‘आगाज़’ भी जुड़ी। इसने इस्मत चुगताई की कहानियों पर आधारित नाटक का मंचन किया और संवादधर्मिता को बढ़ाया। और यहाँ तीसरी उल्लेखनीय बात यह थी कि तीसरे फ़िल्म फ़ेस्टिवल तक आते-आते हमारे साथियों ने पोस्टर विधा को भी ऊंचाई प्रदान की। सिनेमा, नाटक और पोस्टर विधा के इस खूबसूरत संयोजन का सबसे बेहतर उदाहरण है, उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी।

हमारा तीसरा फ़िल्म फ़ेस्टिवल इस मायने में भी उल्लेखनीय है कि इसमें हमने सिनेमा पर संवाद के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुभव को भी सुना और उनसे संवाद किया। हमने जाना कि कैसे जमीनी सच्चाइयों को छुपाकर देश का मीडिया और राज्य पूंजीपतियों और सामंती लोगों के साथ गठजोड़ स्थापित किये हुए है। यहाँ पर हमारा मज़बूत हस्तक्षेप यह रहा कि जमीनी संघर्षों को ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के जरिये उन लोगों तक ले गए जो बाजारवादी संस्कृति के दौर में देश की कई सच्चाइयों से रूबरू नहीं हो पाए थे। इस प्रक्रिया में हमारी नई पीढ़ी एक तरफ मुज़फ्फरनगर के दंगों की वास्तविकता जानकर भौंचक थी तो दूसरी ओर कश्मीर की ‘हाफविडो’ कही जाने वाली महिलाओं की दास्तान जानकर ग़मगीन थी। यहाँ फ़िल्मकार नकुल सिंह साहनी और इफ्फ़त फ़ातिमा से हुआ संवाद हमारे लिए ऐतिहासिक रहा। यह फ़ेस्टिवल FTII के विद्यार्थी संघर्ष के समर्थन मेंऔर एम.एम. कलबुर्गी, गोविन्द पानसरे, इस्मत चुग़ताई, भीष्म साहनी और चित्तप्रसाद की स्मृति को समर्पित था।

और अब हम पहुँच चुके हैं चौथे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के करीब।यह कई मामलों में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय आयोजन होने वाला है।इसकी प्रासंगिकता गुजरात में हुए दलित आंदोलन और हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में सांस्थानिक हत्या के शिकार हुए अम्बेडकरवादी एक्टिविस्ट और रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला और महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय नोखा, बीकानेर में वहां के शिक्षक और संस्थान की मिलीभगत से मारी गई शिक्षक प्रशिक्षु डेल्टा मेघवाल के न्याय के लिए समर्थन से देखी जा सकती है।यह चौथा उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल अब्बास कैरोस्तामी, महाश्वेता देवी, गुरदयाल सिंह और सुलभा देशपांडे की यादों को समर्पित होगा।इस फ़ेस्टिवल में खासतौर से देश में उभरते दलित प्रतिरोध और ऑनर किलिंग्स के दो प्रमुख मुद्दों पर परिचर्चा होगी जिसमें दलित आंदोलन का हिस्सा रहे कुछ एक्टिविस्ट सहभागी रहेंगे।

हमारी अब तक की सिनेमाई प्रतिरोध की यात्रा में युवा साथी प्रमुख भूमिकाओं में सामने आये हैं।चाहे आमजन के बीच फ़िल्म स्क्रीनिंग का मामला हो या पोस्टर बनाकर उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी के आयोजन और सामाजिक मुद्दों को लोगों के सामने रखने का  या वार्षिक फ़िल्म उत्सव का आयोजन, यहाँ युवा साथियों का जज़्बा और ‘साथी कल्चर’ देखने लायक है।टीम के सभी युवा साथियों के पास ज़िम्मेदारी है, कुछ साथी फ़ेस्टिवल के लिए चंदा जुटाने में लगे हुए हैं तो कुछ नित-नए पोस्टर बनाकर सोशल मीडिया और फोटो-ब्लॉग के जरिये फ़ेस्टिवल के प्रमोशन का काम कर रहे हैं तो कुछ साथी व्यवस्था संबंधी अन्य जिम्मेदारियों को पूरा कर रहे हैं।स्मारिका, ब्रोशर, पोस्टर, ऑडिटोरियम, जनसंपर्क आदि काम अपनी गति ले रहे हैं, यह सब संपादित करना युवा साथियों की एक टीम के बिना आसान नहीं होता।इस काम में फ़िल्म सोसाइटी से जुड़े उदयपुर के वरिष्ठ साथियों का सहयोग और मार्गदर्शन भी प्रमुख भूमिका निभाता है।

प्रतिरोध की संस्कृति की पैरवी करते हुए हम लोग इस बात में यकीन करते हैं कि उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी अपने यहाँ सभी को अपनी बात रखने, सहमति-असहमति जाहिर करने के अधिकार को साथ लेते हुए अपना काम करती है।यहाँ कोई असहमति रखता है तब वह अपने तर्कों, तथ्यों और सन्दर्भों के साथ उसका प्रतिपक्ष भी खड़ा करता है।यहाँ एक बार कहना बेहद जरुरी हो जाता है कि बात कहने के साथ-साथ हम सामने वाले व्यक्ति को पहले सुनना भी जरुरी समझते हैं।इसी वजह से फ़िल्म सोसाइटी इन दिनों अपने ‘साथी कल्चर’ की मिसाल देती है कि हम विभिन्न विधाओं से जुड़े लोग एक साथ रहते हुए एक-दूजे से सीखकर अपना कारवां आगे बढ़ा रहे हैं।यह ‘सेल्फ इंस्पिरेशन’ की भी बात है।

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‘प्रतिरोध के सिनेमा’ का राष्ट्रीय अधिवेशन

इस महत्वपूर्ण मूल्य का ज़िक्र किये बिना हमारी बात अधूरी ही कही जाएगी कि तमाम मुश्किल हालात के बावजूद’ प्रतिरोध का सिनेमा’ के तहत चलने वाले इस कारवां के लिए हम लोग किसी भी तरह से कॉर्पोरेट, NGO या किसी अन्य तरह की एजेंसी से कोई स्पांसरशिप नहीं लेते हैं।’नॉन-स्पांसरशिप’ के इस मॉडल का इस मुहीम से जुड़े सभी साथी अनुसरण करते हैं।

उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी अब तक के अपने कार्य-अनुभव से अपना पक्ष स्पष्ट कर चुका है कि देश में वर्चस्ववादी ताकतें चाहे किसी भी रूप में विद्यमान हो, चाहे वह राजनीतिक सत्ता के रूप में हो या चाहे सामाजिक सत्ता के रूप में, यह उन तमाम ब्राह्मणवादी, सामंतवादी, पूंजीवादी, धार्मिक कट्टरपंथ और फ़ासीवाद के विरुद्ध अपना पक्ष मज़बूत रखता है और समाज के हाशिये पर धकेल दिए गए समुदायों के लोकतान्त्रिक और मानवीय हक़ों की पैरवी प्राथमिकता से करता है।हम समझते हैं कि समाज में बराबरी, न्याय और बंधुत्व की भावना के बिना असमानता और भेदभाव परक  व्यवस्था ख़त्म नहीं हो सकती है, इसलिए बेहद जरुरी है कि लोगों के बीच आपसी संवाद का रास्ता हमेशा खुला रहे।लोकतान्त्रिक तरीके से हुए संवाद से आपसी समझ बढ़ने के साथ-साथ प्रतिरोध की संस्कृति का यह कारवां भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक अपनी पहुँच बढ़ा पायेगा और इससे वैकल्पिक रास्ते भी खुलेंगे।

Sudhindra, the Designer at work at the First Udaipur Film Festival

कुमार सुधीन्द्र

इस बात के आखिर में हम गुजरात के दलित आंदोलन से निकली इन बातों को दोहराकर अपना पक्ष स्पष्ट करते हैं कि, गाय की पूँछ तुम रखो,हमें हमारी जमीन दो!”और गाय अगर आपकी माता है तब उसका अंतिम सँस्कार भी खुद करो !

फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम: इच्छापुर का उद्घोष

इस बार हमारे फिल्मोत्सव को तीन फिल्मों का प्रीमियर करने का मौका हासिल हुआ है. ‘फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम’ उनमें से एक है. ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी का इस महत्त्वपूर्ण दस्तावेजी फिल्म पर लेख प्रस्तुत है. यह लेख  साप्ताहिक  ‘समय की चर्चा’ में सबसे पहले प्रकाशित हुआ था.

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भारतीय दस्तावेज़ी  सिनेमा की यह खासियत है कि यह नई से नई घटनाओं और प्रवृति  को कैद करने और प्रस्तुत करने के लिए तत्पर रहता है. ऐसा इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि एक तो दस्तावेज़ी सिनेमा बाजारू होने से अपने को बचा सका है दूसरे सामाजिक –राजनीतिक आन्दोलनों में शामिल कार्यकर्ताओं के पास तकनीक के सुलभ और सस्ते होने की वजह से किसी घटना या प्रवृत्ति को अब किसी फ़िल्म के माध्यम से पेश करना असंभव नहीं. ऐसी ही कुछ कहानी एकदम नई दस्तावेज़ी फ़िल्म फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम की है जिसे दिल्ली में रह रहे सामाजिक कार्यकर्ता और फ़िल्मकार सुब्रत कुमार साहू ने बनाया है. सुब्रत पिछले 2 दशकों से उड़ीसा के सामाजिक –राजनीतिक आन्दोलनों से गहरे जुड़े हैं और इससे पहले भी वे म्लेच्छ संहार : इण्डिया’स कल्कि प्रोजक्ट, डैमेजड और आई सिंग देअरफोर आई एम नाम सेमहत्वपूर्ण दस्तावेज़ी फ़िल्में बना चुके हैं. यह फ़िल्म दक्षिणी पश्चिमी उड़ीषा के कालाहांडी जिले के एक छोटे गावं इच्छापुर में आ रहे महत्वपूर्ण बदलावों की सूचना देती है जिसकी घटनाओं को हाल में घटे गुजरात के दलित आन्दोलन के साथ जोड़ने पर धुर पूरब से लेकर पश्चिम तक एक बड़ा सामाजिक –राजनीतिक वृत्त बनता दिखाई देता है.

बाहरी तौर पर हरा भरा और शांत दिखता इच्छापुर पिछले साल से अशांत है जबसे आदिवासियों की स्थानीय देवी डोकरी को इच्छापुर के ब्राहमणों द्वारा अपनी तरह से अपनाने और उन्हें फिर आदिवासियों के लिए ही वंचित कर देने का षड्यंत्र रचा जा रहा है. यह नई तकनीक के सर्वसुलभ और सस्ते होने की खासियत है कि फ़िल्मकार द्वारा इस षड्यंत्र पर चिंता करने से पहले ही स्थानीय लोगों ने सस्ते कैमरे से अपनी लड़ाई के शुरुआती दृश्यों को रिकार्ड कर लिया और सहेज कर रखा हुआ था जिस वजह से इस फ़िल्म में हम आन्दोलन और इस षड्यंत्र की निरंतरता को देख पाते हैं.

यह आन्दोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण बनता दिखाई दे रहा है क्योंकि यह अस्मिता के सवाल से आगे बढ़कर जमीन के सवाल से अपने आपको जोड़ता हुआ दिखता है. यह इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इस आन्दोलन में दलितों के साथ आदिवासीऔर ओबीसी भी कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ाई लड़ रहे हैं. फ़िल्म का बड़ा हिस्सा वंचितों के साथ इच्छापुर की अलग –अलग लोकेशनों में घूमता है जिनके नामों से पता चलता है कि ये सारी जगहें तो वहां के 90% प्रतिशत मूल आदिवासियों की थी न कि बहुत बाद में आये 5 से 10 फीसद ब्राहमणों की.

सुब्रत पूरे धैर्य और मेहनत के साथ पिछले एक साल से इस आन्दोलन को दर्ज करने की कोशिश करते रहे हैं और अब ये पूरा आन्दोलन हमारे सामने हैं. इसी फ़िल्म से पता चलता है कि इच्छापुर के लोगों ने अपने शोषकों के खिलाफ़ आखिरी लड़ाई का हल्ला बोल दिया है. गुजरात के दलितों की तरह उन्होंने भी सवर्णों का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया और वे अपनी खोयी हुई जमीन को वापिस हासिल करने की निर्णायक लड़ाई में जुटे हैं.

अभी इस दस्तावेज़ी फ़िल्मके सारे इंटरव्यू और कमेंटरी उड़िया में हैं जिनका अंग्रेजी में सब टाइटल साथ –साथ चलता है. जैसे ही इस फ़िल्म का हिंदी संस्करण तैयार होकर नए फ़िल्मफेस्टिवलों और अनौपचारिक स्क्रीनिंगों के जरिये समूचे भारत के दर्शकों तक पहुंचेगा तब इस आन्दोलन का नाता समूचे दलित आन्दोलन से जुड़कर दस्तावेज़ी सिनेमा और नए कैमरा की सार्थकता को सिद्ध करता दिखाई देगा .

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  • फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम / दस्तावेजी फिल्म / निर्देशक सुब्रत कुमार साहू / 77 मिनिट / 3.55-5.10, 15 अक्टूबर
  •  निर्देशक सुब्रत कुमार साहू के साथ गुफ़्तगू / 5.10-5.30, 15 अक्टूबर