हिमालयी कस्बे में प्रतिरोध का सिनेमा का एक नया अनुभव

पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) जिले का दशाईथल क़स्बा, जो तकरीबन 1900 मीटर की ऊंचाई पर बसा है, का मौसम और नजारा अति सुन्दर है। जहाँ एक बार जाने के बाद बार-बार जाने का हर किसी का मन करता है। पिथौरागढ़ ही नहीं हल्द्वानी शहर से ऊपर चढ़ाई चढ़ने पर रास्ते में आने वाले भीमताल, भुवाली, अल्मोड़ा और छोटे बड़े हर गांव-कस्बे की अपनी अलग सुंदरता है। रास्ते में मिलने वाले काफल, अल्मोड़ा में सीधे सपाट रेखा में बना लाला बाजार और खीम सिंह मोहन सिंह रौतेला, जोगा साह जैसी मिठाई की दुकानें जो की पिछली पाँच पीढ़ियों से चल रही है, उन पर मिलने वाली कुमाउँनी सिंगोंड़ी और बाल मिठाई भी प्रदेश भर में काफी प्रचलित है। इन सबके बावजूद दशाईथल कस्बे में बना ‘कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय’ आपको अपनी तरफ आकर्षित करता है। इसका कारण यहाँ के बच्चे और उनमें नित-रोज ऊर्जा का संचार करती वहां की हॉस्टल वार्डन रेनू शाह हैं।

दरअसल प्रतिरोध के सिनेमा की दो दिवसीय कार्यशाला के लिए इस विद्यालय को करीब से जानने और समझने का मौका मिला तो पता चला कि यहाँ अधिकतर वे ही बच्चे है जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है और रहने खाने का खर्च एवं अन्य सुविधाओं पर व्यय करने में असमर्थ है। बावजूद इसके यहाँ की हॉस्टल वार्डन (रेनू शाह) ने अन्य विद्यालयों की तुलना में यहाँ बेहतरीन सुविधाएँ उपलब्ध करवाई है। यहाँ के बच्चे पढने लिखने में तो अव्वल है ही बल्कि खेलकूद और गाने-बजाने में भी पीछे नहीं है। विद्यालय का ऑफिस रूम जिसमे विभिन्न प्रतियोगिताओं में जीती ट्राफियां सजी हैं इस बात का गवाह है। यही नहीं यहाँ के बच्चे बिना किसी ट्रेनिंग के अपना ऑर्केस्ट्रा चलाते है जिसमें बॉलीवुड से लेकर राजस्थानी, पंजाबी और पहाड़ी लोक गीत गाते है।

इसी कड़ी में प्रतिरोध के सिनेमा की ओर से यहाँ के बच्चों को ‘सिनेमा और कल्चर’ पर दिया गया एक्सपोज़र देश के अन्य एलिट स्कूल्स में बच्चों को दिए जाने वाले एक्सपोज़र से बेहतरीन था। जिसमें मुख्यधारा के सिनेमा से इतर ऐसा सिनेमा दिखाया जिसकी अपनी अलग ही पहचान है लेकिन तड़क-भड़क और पर्याप्त मार्केटिंग न होने के कारण बहुत कम लोगों तक पहुँचा है। यह पूरी कार्यशाला बच्चों में अच्छा सिनेमा देखने की आदत और सिनेमा की भाषा पर उनकी समझ बनाने पर केंद्रित थी। सीखने सिखाने के लिहाज़ से यह न सिर्फ खास था बल्कि मेरे लिए भी एक नया अनुभव था। इसके अलावा बच्चों को दुनिया की सैर भी करायी गयी।

प्रतिरोध के सिनेमा की एक खासियत यह भी है कि यह सिनेमा को न सिर्फ उसकी कला के पहलू से देखता है बल्कि उसे सामाजिक पहलू से भी जोड़कर देखता है और उस पर बात भी करता है। यही कारण है कि प्रतिरोध के सिनेमा ने उदयपुर के स्थानीय फ़िल्मकार की फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’, नार्मन मेक्लेरन की ‘चेयरी टेल’ और ‘नेबर्स’  और गीतांजलि राव की  ‘प्रिंटेड रेनबो’ से लेकर नागराज मंजुले की ‘फैन्ड्री’ ‘सैराट’, ‘मसान’ सूर्यशंकर दास और आनंद पटवर्धन की फिल्मों तक की विशाल रेंज को अपने फेस्टिवल्स में दर्शकों को दिखाया है।

दूसरी खासियत यह है कि फ़िल्म दिखाने के बाद चर्चा करना. फ़िल्म दिखाना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण फ़िल्म पर चर्चा करना भी है। यहाँ बच्चियों को जब लखनऊ के एन जी ओ सनतकदा द्वारा निर्मित  ‘सबा की कहानी’ फ़िल्म दिखायी गयी तब फ़िल्म के बाद चर्चा में बच्चियां अपनी बात रखते हुए बताती है कि वे भी अपनी कहानी और अपने सपनों को फ़िल्म के माध्यम से बताना चाहती है। आगे जब उनसे उनके सपनों के बारे में पूछा गया तो यह सामने आया की कोई आई पी एस बनना चाहती है, कोई आरटीओ तो कोई सामाजिक कार्यकर्त्ता बनकर समाज में बदलाव लाना चाहती है। इसी तरह किसी की चाह है कि फ़िल्मकार बने तो कोई संगीत के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहती है। मदुरै नगर परिषद में काम करने वाली दलित महिला सफाई कर्मी पर बनी अमुधन आर पी निर्देशित दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘पी’ पर भी बच्चों की प्रतिक्रिया इतनी गंभीर रही कि वे उस महिला और वहां की स्थिति के बारे में और विस्तार से जानना चाह रहे थे।

तीसरा यह सिर्फ सिनेमा ही नहीं बल्कि कला के और रूपों का भी पक्षधर है जिसमें थिएटर, कविता पाठ, गायन, कहानी विधा आदि, इसीलिए बल्ली सिंह चीमा के गीत ‘ले मशालें चल पड़े है’ और अदम गोंडवी और दुष्यंत कुमार की कृतियों से मिश्रित गीत ‘सौ में सत्तर आदमी’ से कार्यशाला के दूसरे दिन की शुरुआत की गयी। जिसको बच्चों ने काफी मजे से सुना और गाया भी, अगली बार कोशिश रहेगी कि नाटक और कहानी विधा पर भी बच्चों को थोड़ा एक्सपोज़र दिया जाये। प्रतिरोध के सिनेमा की एक और खासियत है कि यह निम्नतम संसाधनों से भी अपना काम चला लेता है। जहाँ बच्चों को सिनेमा दिखाया गया वहां न तो स्क्रीन उपलब्ध थी और न ही उपयुक्त स्पीकर्स हॉल भी सिनेमा दिखाने के उद्देश्य से नहीं था, किन्तु काम चलता गया हॉल की दीवार स्क्रीन बनी और प्रोजेक्टर के इन-बिल्ट स्पीकर से काम चलाया गया। मुझे लगता है यही अनुशासन किसी कैंपेन को निरंतर रखने और आगे बढ़ाने में सहायक है।

वर्त्तमान समय में निम्न स्तर के टीवी सीरियल और फिल्मों से इतर प्रतिरोध का सिनेमा एक अनूठा विचार है जो यह कभी नहीं कहता कि यह मत देखिये बल्कि यही कहता है कि यह भी देखिये। आज राष्ट्रवाद के समय में जहाँ हर किसी को अपने देश भक्त होने का प्रमाण देना होता है प्रतिरोध का सिनेमा ‘दि नेबर्स’ और ‘टू सलूशन फॉर वन प्रॉब्लम’ दिखाकर कहेगा कि अपने पड़ौसी से प्यार करिये और कुछ तकरार है तो संवाद के विकल्प को अपनाइये। इसके लिए जरुरी है कि प्रतिरोध का सिनेमा हर जगह पहुंचे। हर जगह पहुँचाने के लिए जरुरी है कि जहाँ भी जाये वहां सिनेमा की एक लाइब्रेरी स्थापित हो जहाँ से आस-पास की जगहों को फ़िल्मों का वितरण किया जा सके। उसको चाहने, देखने और समझने वाले लोग बढ़े जो अपनी स्थानीय जगहों पर इस कारवां को आगे बढ़ाये।

आने वाले समय में दीवार की जगह स्क्रीन हो, अलग से स्पीकर हो इसके लिये प्रतिरोध का सिनेमा हमेशा अपने चाहने वालों से सहयोग की अपेक्षा करता रहेगा।
धर्मराज जोशी

प्रतिरोध का सिनेमा की उदयपुर फिल्म सोसाइटी से जुड़े धर्मराज फ़िलहाल बेंगलुरु में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में मास्टर्स की पढ़ाई कर रहे हैं . उन्होंने फ़िल्म सोसाइटी सक्रियता के अलावा लम्बा समय बच्चों के साथ अध्यापन में भी बिताया है. उनसे joshidharmraj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय दशाईथल, गंगोलीहाट

विद्यालय की बालिकाओं का ऑर्केस्ट्रा

स्क्रीनिंग टाइम…

फ़िल्म के बाद चर्चा की बारी…

ग्रुप फ़ोटो

अब सेल्फ़ी की बारी…

अलविदा साथियों अगली बार फिर मिलेंगे….

अब फ़िल्म महोत्सव विद्या भवन ऑडिटोरियम में होगा

The Fourth Udaipur Film Festival, organised by Udaipur Film Society and the Cinema of Resistance campaign has been threatened and its venue forcibly shifted (by getting the original venue cancelled) on behest of, who else but, the ABVP. The 4th UFF has been conceived on the theme of “Voices from the Dalit resistance”, and features films that highlight Dalit student suicides, the Una movement, the expose of the Kairana “Hindu exodus”, fictions like Sairat, Anhey Ghorhey da Daan, and new documentaries on Dalit resistance like “Flames of Freedom: The Ichchapur Declaration”. The Sangh is afraid of precisely these films as is evident from the content and language of their letter forcing the administration to cancel the pre-assigned venue on the eve of the festival.

Please read the full PRESS RELEASE and spread the word and stand in solidarity with the committed team of Udaipur Film Society and the Pratirodh ka Cinema campaign who are determined not to buckle under pressure and go ahead with the full festival at an alternative venue.

साथियों, अधिकतम प्रसार की अपील के साथ यह प्रेस विज्ञप्ति प्रेषित है हमारा फेस्टिवल ‘दलित प्रतिरोध के उभरते स्वर’ पर केन्द्रित है. जाहिर है यह विषय सत्ता में बैठे लोगो को नहीं पचा साथ ही अटेचमेंट में संलग्न एबीवीपी की प्रेस विज्ञप्ति की भाषा भी देखिये :

प्रेस विज्ञप्ति

कल 14 अक्तूबर से शुरू होने वाले चौथे उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल को फेस्टिवल शुरू होने से ठीक एक दिन पहले की शाम को संघ और प्रसाशन ने दबाव बनाकर रुकवाने की भरपूर कोशिश की. फिल्मोत्सव के आयोजकों को पुलिस प्रसाशन द्वारा बुलाकर देर रात तक लम्बी बैठक की गयी. प्रशासन से बैठक का कारण यह था कि राजकीय कृषि महाविद्यालय का ऑडिटोरियम जो कि फ़िल्म महोत्सव करने का स्थल था यूनिवर्सिटी द्वारा रद्द कर दिया गया और इसका कारण यह बताया गया कि प्रशासन से कार्यक्रम की पूर्वानुमति नहीं ली गयी थी. ज्ञातव्य है कि उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी पिछले चार साल से यह फ़िल्म फेस्टिवल कर रही है, न तो पिछले तीन फिल्मोत्सवों में कोई पूर्वानुमति ली गयी और न ही किसी भी सांस्कृतिक आयोजन में कभी भी ऐसी किसी अनुमति की जरुरत होती है.

दरअसल अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के द्वारा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति को ज्ञापन सौंपा गया था. जिसमे फ़िल्म महोत्सव को आग भड़काने और बाबा साहेब आंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाला बताया गया. कुलपति ने दबाव में आकर विश्विद्यालय सभागार में कार्यक्रम को निरस्त कर दिया जबकि इसकी पूर्व लिखित अनुमति सोसाइटी ने पहले ही ले ली थी एवं निर्धारित शुल्क 24,450 रूपये भी जमा करा दिए थे.

विश्वविधालय द्वारा अनुमति निरस्त किए जाने के बाद सोसाइटी को आनन-फानन में नया कार्यक्रम स्थल चुनना पड़ा. अब यह फ़िल्म महोत्सव विद्या भवन ऑडिटोरियम में होगा. पूरा कार्यक्रम तीनो दिन यथावत वैसे ही रहेगा.

इस ख़बर के साथ एबीवीपी की प्रेस विज्ञप्ति और कृषि महाविद्यालय के डीन के द्वारा दिया गया निरस्तगी का पत्र संलग्न है. विद्यार्थी परिषद् की प्रेस विज्ञप्ति में रोहित वेमुला, गुजरात के ऊना मामले और कैराना जैसे विषयों पर फ़िल्म प्रदर्शन और बहस को धर्म एवं जाति पर लड़वाने वाला विषय बताया गया और यह सब मामले छात्रों को बरगलाने की साजिश बताये गये हैं. फेस्टिवल के आयोजकों द्वारा कहा गया कि जातिगत शोषण के सभी मुद्दों पर बात एवं बहस करके ही जतिमुक्त समाज की दिशा में बढ़ा जा सकता है. इन सभी मुद्दों पर बात करके एवं जातिगत भेदभाव एवं अन्याय का कड़ा विरोध करके ही हम एक समतामूलक समाज की दिशा में आगे बढ़ सकते है. अतः इन विषयों पर चुप्पी नहीं बल्कि बात करना ही जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है. पुलिस प्रशासन द्वारा जिन फिल्मों पर आपति एवं सवाल उठाये गये उनके बारें में सोसाइटी का कहना है कि वह सभी फ़िल्में देश के प्रतिष्ठित निर्माताओं और निर्देशकों द्वारा बनाई गयी है. जिन्हें देश विदेश में पर्याप्त प्रशंसा भी मिली है.

लोग जुड़ते गए कारवां बढ़ता गया…

कुमार सुधीन्द्र पहले फिल्मोत्सव से ही उदयपुर फिल्म सोसाइटी के सक्रिय सदस्य हैं. उन्हें उदयपुर फिल्म सोसाइटी के आधार स्तंभों में से एक कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी. इस बार के बैनर-पोस्टर-बैजेस सभी कुछ उन्हीं के डिजाइन किये हुए हैं. वे संक्षिप्त अवधि के लिए ‘उदयपुर फिल्म सोसाइटी’ के संयोजक भी रहे हैं.

सुधीन्द्र ने अपने और सोसाइटी के चार साला सफ़र पर यह लेख लिखा है. इसमें हम उनकी प्रतिबद्धता और सरोकारों की झलक भी पा सकते हैं और टीम की एकजूटता  का रोमांच भी महसूस कर सकते हैं.

प्रस्तुत है लेख :

 

साल 2013 मेंसितंबर14 और 15 को जब ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के पहले उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल का आगाज़ हुआ उससे पहले इस मुहीम के तहत देशभर में 40 से अधिक फ़िल्म फ़ेस्टिवल हो चुके थे। उदयपुर में इसकी शुरुआत के पीछे यहाँ के जनवादी प्रगतिशील बुद्धिजीवियों और युवाओं का लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति ज़िम्मेदारी का भाव रहा है कि जब देश और दुनिया में आमजन से जुड़े सरोकार के मुद्दों पर संवाद उभरकर सामने नहीं आ रहा है तब क्यों ना सिनेमा के जरिये यह पहल की जाये।जिसमें सरोकारी सिनेमा, नाटक, क़िस्सागोई, पोस्टर-पेंटिंग, गीत, कविता आदि सभी माध्यमों के जरिये आमजन जिसमें खासतौर से हाशिये के लोगों के सवालों को मुख्यधारा के समाज के सामने लाया जाये और इसके लिए वैकल्पिक रास्ते सुझाये जाएँ।

1291376_540402929372731_97138084_oइसी विचार केआधार पर हुए हुए पहले उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के सफल आयोजन में देश-दुनिया का सिनेमा देखा और दिखाया गया। यह फ़ेस्टिवल ख्यातनाम फ़िल्म अभिनेता बलराज साहनी को समर्पित था जिसमें उनकी फ़िल्म ‘गरमहवा’ दिखाई गई। जैसा कि इस पहल के पीछे का मकसद आमजन से जुड़े मुद्दों पर संवाद स्थापित करना था, तो इस पहले फ़िल्म फ़ेस्टिवल से ही संवाद की यह प्रक्रिया शुरू हो गई। हर फ़िल्म के प्रदर्शन के बाद उस पर दर्शकों के साथ फ़िल्मकार और निर्देशक के बीच संवाद रखा गया जिससे स्थानीय लोगों को दिखाई गई फ़िल्म की पॉलिटिक्स और उसके दर्शन के बारे में समझना आसान हुआ। पहले फ़ेस्टिवल में मशहूर दस्तावेज़ी फ़िल्मकार आनंदपटवर्धन उनकी दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘जयभीमकॉमरेड’ की स्क्रीनिंग में मौजूद रहे और उनके साथ हुआ दर्शकों का ज्वलंत संवाद आज भी हमारे मानसपटल पर दर्ज़ है। इस दो दिवसीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल से शुरुआत के बाद दूसरा उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल तीन दिन का रखा गया जो साल 2014 मेंसितंबर 5-7 को किया गया। इसकी खास बात यह थी कि इसमें हमने उदयपुर के स्थानीय फ़िल्मकारों को जगह देने के साथ-साथ राजस्थानी सिनेमा को भी देखा और दिखाया। इसमें पति-पत्नी के रिश्तों की विभिन्न परतों को सामने लाती राजस्थानी फ़िल्म ‘भोभर’ प्रमुख थी। इस दौरान इसके लेखक रामकुमार सिंह के साथ संवाद भी हुआ जो कि उल्लेखनीय है। इनके साथ चैतन्य तम्हाणे मराठी फ़िल्म ‘फँड्री’,नकुल सिंह साहनी अपनी दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘इज्जतनगर की असभ्य बेटियां’ और मोहम्मद गनी अपनी फ़िल्म ‘क़ैद’ के साथ हमारे कारवां में सहभागी बने। यह फ़ेस्टिवल चित्रकार ज़ैनुल आबेदिन,  फ़िल्मकार ख़्वाजा अब्बास अहमद, ज़ोहरा सहगल और नबारुण भट्टाचार्य को समर्पित था।

दूसरे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के बाद हम साल 2015 में तीसरे फ़िल्म फ़ेस्टिवल के आयोजन की ओर बढ़े। इससे पूर्व हमने मासिक फ़िल्म प्रदर्शन की प्रक्रिया को जारी रखा। इससे हमें छोटी-छोटी कोशिशों में नए साथियों तक पहुंचे। पूर्व के दोनों फ़ेस्टिवल के अनुभवों से सीखते हुए हम लोगों ने तीसरे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल से पहले कई मासिक फ़िल्म स्क्रीनिंग की। स्कूलों और कॉलेजों तक हमारी पहुँच रही। स्कूलों में की गई फ़िल्म स्क्रीनिंग को हमने ‘बालरंग’ नाम से एक खास पहचान दी और सलूम्बर ब्लॉक में अपनी पहुँच बनाते हुए ‘मोबाइल / टूर फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ किया। इसी तरह उदयपुर के बाहर राजसमंद जिले के नाथद्वारा ब्लॉक में भी फ़िल्म स्क्रीनिंग के जरिये ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ ने आम लोगों के बीच अपनी जगह बनाई। उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी के पूर्व संयोजक शैलेंद्र बताते है कि जावरमाइंस और कुंवारिया कस्बे के स्कूलों में भी स्क्रीनिंग की गई। शहर के मोहल्लों में बच्चों का फ़िल्म क्लब बनाया गया-  सतरंगी चिल्ड्रन फ़िल्म क्लब।

इन सारी प्रकियाओं से गुजरते हुए हम तीसरे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के करीब पहुंचे। दिन थे 25-26-27 सितंबर, साल 2015। यहाँ तक पहुँचते हुए हम अपनी सिनेमाई समझ और काम का दायरा बढ़ा चुके थे। इस कारवां में मिले कई साथी अब स्कूल-कॉलेज की स्क्रीनिंग नियमित सँभालने लगे हैं और कुछ साथी फ़िल्म सोसाइटी की मासिक स्क्रीनिंग। कुछ साथियों ने बालरंग की स्क्रीनिंग का ज़िम्मा उठाया हुआ है तो कुछ साथी इसमें नवाचार करने की कोशिशों में लगे हुए हैं। अपने जूनून और जज़्बे के चलते हमारे साथियों ने चित्तौड़गढ़, सलूम्बर, नाथद्वारा, जयपुर और जमशेदपुर में फ़िल्म सोसाइटी शुरू कर ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ का विस्तार किया। यहाँ खास बात यह है कि 26 सितंबर 2015 को लंदन (यू.के.) में भी इस सिनेमा का एक और चैप्टर शुरू हुआ।

तीसरे फ़िल्म फ़ेस्टिवल में तीन बातें सबसे प्रमुख रही, पहली इस फ़ेस्टिवल के जरिये उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी से जुड़े युवा साथी कुमार गौरव ने जमशेदपुर दंगे पर बनी अपनी पहली दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘कर्फ़्यू’ दिखाई।

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तीसरे फेस्टिवल में पोस्टर

दूसरी बात यह कि इस आयोजन में हमारे साथ थिएटर टीम ‘आगाज़’ भी जुड़ी। इसने इस्मत चुगताई की कहानियों पर आधारित नाटक का मंचन किया और संवादधर्मिता को बढ़ाया। और यहाँ तीसरी उल्लेखनीय बात यह थी कि तीसरे फ़िल्म फ़ेस्टिवल तक आते-आते हमारे साथियों ने पोस्टर विधा को भी ऊंचाई प्रदान की। सिनेमा, नाटक और पोस्टर विधा के इस खूबसूरत संयोजन का सबसे बेहतर उदाहरण है, उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी।

हमारा तीसरा फ़िल्म फ़ेस्टिवल इस मायने में भी उल्लेखनीय है कि इसमें हमने सिनेमा पर संवाद के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुभव को भी सुना और उनसे संवाद किया। हमने जाना कि कैसे जमीनी सच्चाइयों को छुपाकर देश का मीडिया और राज्य पूंजीपतियों और सामंती लोगों के साथ गठजोड़ स्थापित किये हुए है। यहाँ पर हमारा मज़बूत हस्तक्षेप यह रहा कि जमीनी संघर्षों को ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के जरिये उन लोगों तक ले गए जो बाजारवादी संस्कृति के दौर में देश की कई सच्चाइयों से रूबरू नहीं हो पाए थे। इस प्रक्रिया में हमारी नई पीढ़ी एक तरफ मुज़फ्फरनगर के दंगों की वास्तविकता जानकर भौंचक थी तो दूसरी ओर कश्मीर की ‘हाफविडो’ कही जाने वाली महिलाओं की दास्तान जानकर ग़मगीन थी। यहाँ फ़िल्मकार नकुल सिंह साहनी और इफ्फ़त फ़ातिमा से हुआ संवाद हमारे लिए ऐतिहासिक रहा। यह फ़ेस्टिवल FTII के विद्यार्थी संघर्ष के समर्थन मेंऔर एम.एम. कलबुर्गी, गोविन्द पानसरे, इस्मत चुग़ताई, भीष्म साहनी और चित्तप्रसाद की स्मृति को समर्पित था।

और अब हम पहुँच चुके हैं चौथे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के करीब।यह कई मामलों में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय आयोजन होने वाला है।इसकी प्रासंगिकता गुजरात में हुए दलित आंदोलन और हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में सांस्थानिक हत्या के शिकार हुए अम्बेडकरवादी एक्टिविस्ट और रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला और महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय नोखा, बीकानेर में वहां के शिक्षक और संस्थान की मिलीभगत से मारी गई शिक्षक प्रशिक्षु डेल्टा मेघवाल के न्याय के लिए समर्थन से देखी जा सकती है।यह चौथा उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल अब्बास कैरोस्तामी, महाश्वेता देवी, गुरदयाल सिंह और सुलभा देशपांडे की यादों को समर्पित होगा।इस फ़ेस्टिवल में खासतौर से देश में उभरते दलित प्रतिरोध और ऑनर किलिंग्स के दो प्रमुख मुद्दों पर परिचर्चा होगी जिसमें दलित आंदोलन का हिस्सा रहे कुछ एक्टिविस्ट सहभागी रहेंगे।

हमारी अब तक की सिनेमाई प्रतिरोध की यात्रा में युवा साथी प्रमुख भूमिकाओं में सामने आये हैं।चाहे आमजन के बीच फ़िल्म स्क्रीनिंग का मामला हो या पोस्टर बनाकर उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी के आयोजन और सामाजिक मुद्दों को लोगों के सामने रखने का  या वार्षिक फ़िल्म उत्सव का आयोजन, यहाँ युवा साथियों का जज़्बा और ‘साथी कल्चर’ देखने लायक है।टीम के सभी युवा साथियों के पास ज़िम्मेदारी है, कुछ साथी फ़ेस्टिवल के लिए चंदा जुटाने में लगे हुए हैं तो कुछ नित-नए पोस्टर बनाकर सोशल मीडिया और फोटो-ब्लॉग के जरिये फ़ेस्टिवल के प्रमोशन का काम कर रहे हैं तो कुछ साथी व्यवस्था संबंधी अन्य जिम्मेदारियों को पूरा कर रहे हैं।स्मारिका, ब्रोशर, पोस्टर, ऑडिटोरियम, जनसंपर्क आदि काम अपनी गति ले रहे हैं, यह सब संपादित करना युवा साथियों की एक टीम के बिना आसान नहीं होता।इस काम में फ़िल्म सोसाइटी से जुड़े उदयपुर के वरिष्ठ साथियों का सहयोग और मार्गदर्शन भी प्रमुख भूमिका निभाता है।

प्रतिरोध की संस्कृति की पैरवी करते हुए हम लोग इस बात में यकीन करते हैं कि उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी अपने यहाँ सभी को अपनी बात रखने, सहमति-असहमति जाहिर करने के अधिकार को साथ लेते हुए अपना काम करती है।यहाँ कोई असहमति रखता है तब वह अपने तर्कों, तथ्यों और सन्दर्भों के साथ उसका प्रतिपक्ष भी खड़ा करता है।यहाँ एक बार कहना बेहद जरुरी हो जाता है कि बात कहने के साथ-साथ हम सामने वाले व्यक्ति को पहले सुनना भी जरुरी समझते हैं।इसी वजह से फ़िल्म सोसाइटी इन दिनों अपने ‘साथी कल्चर’ की मिसाल देती है कि हम विभिन्न विधाओं से जुड़े लोग एक साथ रहते हुए एक-दूजे से सीखकर अपना कारवां आगे बढ़ा रहे हैं।यह ‘सेल्फ इंस्पिरेशन’ की भी बात है।

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‘प्रतिरोध के सिनेमा’ का राष्ट्रीय अधिवेशन

इस महत्वपूर्ण मूल्य का ज़िक्र किये बिना हमारी बात अधूरी ही कही जाएगी कि तमाम मुश्किल हालात के बावजूद’ प्रतिरोध का सिनेमा’ के तहत चलने वाले इस कारवां के लिए हम लोग किसी भी तरह से कॉर्पोरेट, NGO या किसी अन्य तरह की एजेंसी से कोई स्पांसरशिप नहीं लेते हैं।’नॉन-स्पांसरशिप’ के इस मॉडल का इस मुहीम से जुड़े सभी साथी अनुसरण करते हैं।

उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी अब तक के अपने कार्य-अनुभव से अपना पक्ष स्पष्ट कर चुका है कि देश में वर्चस्ववादी ताकतें चाहे किसी भी रूप में विद्यमान हो, चाहे वह राजनीतिक सत्ता के रूप में हो या चाहे सामाजिक सत्ता के रूप में, यह उन तमाम ब्राह्मणवादी, सामंतवादी, पूंजीवादी, धार्मिक कट्टरपंथ और फ़ासीवाद के विरुद्ध अपना पक्ष मज़बूत रखता है और समाज के हाशिये पर धकेल दिए गए समुदायों के लोकतान्त्रिक और मानवीय हक़ों की पैरवी प्राथमिकता से करता है।हम समझते हैं कि समाज में बराबरी, न्याय और बंधुत्व की भावना के बिना असमानता और भेदभाव परक  व्यवस्था ख़त्म नहीं हो सकती है, इसलिए बेहद जरुरी है कि लोगों के बीच आपसी संवाद का रास्ता हमेशा खुला रहे।लोकतान्त्रिक तरीके से हुए संवाद से आपसी समझ बढ़ने के साथ-साथ प्रतिरोध की संस्कृति का यह कारवां भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक अपनी पहुँच बढ़ा पायेगा और इससे वैकल्पिक रास्ते भी खुलेंगे।

Sudhindra, the Designer at work at the First Udaipur Film Festival

कुमार सुधीन्द्र

इस बात के आखिर में हम गुजरात के दलित आंदोलन से निकली इन बातों को दोहराकर अपना पक्ष स्पष्ट करते हैं कि, गाय की पूँछ तुम रखो,हमें हमारी जमीन दो!”और गाय अगर आपकी माता है तब उसका अंतिम सँस्कार भी खुद करो !

फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम: इच्छापुर का उद्घोष

इस बार हमारे फिल्मोत्सव को तीन फिल्मों का प्रीमियर करने का मौका हासिल हुआ है. ‘फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम’ उनमें से एक है. ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी का इस महत्त्वपूर्ण दस्तावेजी फिल्म पर लेख प्रस्तुत है. यह लेख  साप्ताहिक  ‘समय की चर्चा’ में सबसे पहले प्रकाशित हुआ था.

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भारतीय दस्तावेज़ी  सिनेमा की यह खासियत है कि यह नई से नई घटनाओं और प्रवृति  को कैद करने और प्रस्तुत करने के लिए तत्पर रहता है. ऐसा इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि एक तो दस्तावेज़ी सिनेमा बाजारू होने से अपने को बचा सका है दूसरे सामाजिक –राजनीतिक आन्दोलनों में शामिल कार्यकर्ताओं के पास तकनीक के सुलभ और सस्ते होने की वजह से किसी घटना या प्रवृत्ति को अब किसी फ़िल्म के माध्यम से पेश करना असंभव नहीं. ऐसी ही कुछ कहानी एकदम नई दस्तावेज़ी फ़िल्म फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम की है जिसे दिल्ली में रह रहे सामाजिक कार्यकर्ता और फ़िल्मकार सुब्रत कुमार साहू ने बनाया है. सुब्रत पिछले 2 दशकों से उड़ीसा के सामाजिक –राजनीतिक आन्दोलनों से गहरे जुड़े हैं और इससे पहले भी वे म्लेच्छ संहार : इण्डिया’स कल्कि प्रोजक्ट, डैमेजड और आई सिंग देअरफोर आई एम नाम सेमहत्वपूर्ण दस्तावेज़ी फ़िल्में बना चुके हैं. यह फ़िल्म दक्षिणी पश्चिमी उड़ीषा के कालाहांडी जिले के एक छोटे गावं इच्छापुर में आ रहे महत्वपूर्ण बदलावों की सूचना देती है जिसकी घटनाओं को हाल में घटे गुजरात के दलित आन्दोलन के साथ जोड़ने पर धुर पूरब से लेकर पश्चिम तक एक बड़ा सामाजिक –राजनीतिक वृत्त बनता दिखाई देता है.

बाहरी तौर पर हरा भरा और शांत दिखता इच्छापुर पिछले साल से अशांत है जबसे आदिवासियों की स्थानीय देवी डोकरी को इच्छापुर के ब्राहमणों द्वारा अपनी तरह से अपनाने और उन्हें फिर आदिवासियों के लिए ही वंचित कर देने का षड्यंत्र रचा जा रहा है. यह नई तकनीक के सर्वसुलभ और सस्ते होने की खासियत है कि फ़िल्मकार द्वारा इस षड्यंत्र पर चिंता करने से पहले ही स्थानीय लोगों ने सस्ते कैमरे से अपनी लड़ाई के शुरुआती दृश्यों को रिकार्ड कर लिया और सहेज कर रखा हुआ था जिस वजह से इस फ़िल्म में हम आन्दोलन और इस षड्यंत्र की निरंतरता को देख पाते हैं.

यह आन्दोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण बनता दिखाई दे रहा है क्योंकि यह अस्मिता के सवाल से आगे बढ़कर जमीन के सवाल से अपने आपको जोड़ता हुआ दिखता है. यह इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इस आन्दोलन में दलितों के साथ आदिवासीऔर ओबीसी भी कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ाई लड़ रहे हैं. फ़िल्म का बड़ा हिस्सा वंचितों के साथ इच्छापुर की अलग –अलग लोकेशनों में घूमता है जिनके नामों से पता चलता है कि ये सारी जगहें तो वहां के 90% प्रतिशत मूल आदिवासियों की थी न कि बहुत बाद में आये 5 से 10 फीसद ब्राहमणों की.

सुब्रत पूरे धैर्य और मेहनत के साथ पिछले एक साल से इस आन्दोलन को दर्ज करने की कोशिश करते रहे हैं और अब ये पूरा आन्दोलन हमारे सामने हैं. इसी फ़िल्म से पता चलता है कि इच्छापुर के लोगों ने अपने शोषकों के खिलाफ़ आखिरी लड़ाई का हल्ला बोल दिया है. गुजरात के दलितों की तरह उन्होंने भी सवर्णों का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया और वे अपनी खोयी हुई जमीन को वापिस हासिल करने की निर्णायक लड़ाई में जुटे हैं.

अभी इस दस्तावेज़ी फ़िल्मके सारे इंटरव्यू और कमेंटरी उड़िया में हैं जिनका अंग्रेजी में सब टाइटल साथ –साथ चलता है. जैसे ही इस फ़िल्म का हिंदी संस्करण तैयार होकर नए फ़िल्मफेस्टिवलों और अनौपचारिक स्क्रीनिंगों के जरिये समूचे भारत के दर्शकों तक पहुंचेगा तब इस आन्दोलन का नाता समूचे दलित आन्दोलन से जुड़कर दस्तावेज़ी सिनेमा और नए कैमरा की सार्थकता को सिद्ध करता दिखाई देगा .

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  • फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम / दस्तावेजी फिल्म / निर्देशक सुब्रत कुमार साहू / 77 मिनिट / 3.55-5.10, 15 अक्टूबर
  •  निर्देशक सुब्रत कुमार साहू के साथ गुफ़्तगू / 5.10-5.30, 15 अक्टूबर

एक थी डेल्टा : भँवर मेघवंशी

हमारा यह फिल्मोत्सव डेल्टा मेघवाल के लिए न्याय की लड़ाई के समर्थन में है.

क्या आप डेल्टा मेघवाल के बारे में जानते हैं ? हो सकता है, आपको जानकारी न हो या आधीअधूरी जानकारी हमारे मीडिया ने आप तक पहुंचाई हो. सुप्रसिद्ध पत्रकार एवं  एक्टिविस्ट भँवर मेघवंशी ने डेल्टा की सांस्थानिक हत्या की पड़ताल करता यह लेख लिखा है. वे फेसबुक पर क्रमिक रूप से इसे लिखते रहे हैं. प्रस्तुत लेख नवीनतम कड़ियों को समेटे हुए है.भँवर मेघवंशी हमारे तीसरे फिल्मोत्सव के अतिथि वक्ता भी थे.

प्रस्तुत है यह जरूरी लेख :

7 मई 1999 को शिक्षक महेन्द्रा राम के घर जन्मी पुत्री का नाम डेल्टा रखा गया .त्रिमोही जैसे छोटे से गाँव के लिए यह नाम ही किसी अजूबे से कम नहीं था .यहाँ के अधिकांश लोगों में किसी ने भी अपनी पूरी ज़िन्दगी में ऐसा नाम सुना तक नहीं था .जो पढ़े लिखे है उन्होंने भी भूगोल की किताबों में डेल्टा के बारे में पढ़ा था ,लेकिन किसी का नाम डेल्टा ,यह तो अद्भुत ही बात थी .ऐसा नाम रखने के पीछे के अपने मंतव्य को प्रकट करते हुए महेन्द्रा राम मेघवाल बताते है कि – ‘ जिस तरह नदी अपने बहाव के इलाके में तमाम विशेषताएं छोड़ कर समंदर तक पंहुच कर मिट्टी को अनूठा सौन्दर्य प्रदान करती है ,जिसे डेल्टा कहा जाता है ,ठीक वैसे ही हमारे परिवार में पहली बेटी का आगमन हमारी जिंदगी को अद्भुत ख़ुशी और सुन्दरता देनेवाला था ,इसलिए मैंने उसका नाम डेल्टा रखा .मैं चाहता था कि मेरी बेटी लाखों में से एक हो ,उसका ऐसा नाम हो जो यहाँ पर किसी का नहीं है .” वाकई अद्वितीय नामकरण किया महेन्द्राराम ने अपनी लाड़ली बेटी का !

कहते है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात ,सो डेल्टा ने अपने होनहार होने को अपनी शैशवावस्था में ही साबित करना शुरू कर दिया .वह जब अपने पैरो पर खड़ी होने लगी तो उसके पांव संगीत की धुन पर थिरकने लगते थे .बचपन में जब अन्य बच्चे तुतला तुतला कर अपनी बात कहते है ,तब ही डेल्टा स्पष्ट और प्रभावी उच्चारण करने लगी .महेन्द्राराम को विश्वास हो गया कि उसकी बेटी अद्भुत प्रतिभा की धनी है .उन्होंने उसे अपने विद्यालय राजीव गाँधी पाठशाला जहाँ पर वे बतौर शिक्षक कार्यरत थे ,वहां साथ ले जाना शुरू कर दिया .प्राथमिक शाला में पढ़ते हुए डेल्टा ने मात्र पांच साल की उम्र में दूसरी कक्षा की छात्रा होते हुए राष्ट्रिय पर्व पर आत्मविश्वास से लबरेज़ अपना पहला भाषण दे कर सबको आश्चर्यचकित कर डाला .जब वह चौथी कक्षा में पढ़ रही थी तो उसने रेगिस्तान का जहाज़ नामक एक चित्र बनाया ,जो राज्य स्तर पर चर्चित हो कर आज भी जयपुर स्थित शासन सचिवालय की दीवार की शोभा बढ़ा रहा है .मात्र आठ वर्ष की उम्र में डेल्टा ने फर्राटेदार अंग्रेजी में एक स्पीच दे कर लोगों को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दिया .

डेल्टा ने अपनी पांचवी तक की पढाई अपने ही गाँव त्रिमोही की राजीव गाँधी स्वर्णजयंती पाठशाला में की ,यहाँ पर वो हर प्रतियोगिता में अव्वल रही .आठवी पढने के लिए वह त्रिमोही से दो किलोमीटर दूर गडरा रोड में स्थित आदर्श विद्या मंदिर गयी .यहाँ भी हर गतिविधि और पढाई में वह आगेवान बनी . मेट्रिक की पढाई राजकीय बालिका माध्यमिक विध्यालय गडरा रोड से पूरी करके उसने सीनियर की शिक्षा स्वर्गीय तेजुराम स्वतंत्रता सेनानी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से प्राप्त की .यह सब उसने मात्र पंद्रह साल की आयु में ही कर दिखाया .
बहुमुखी प्रतिभासंपन्न डेल्टा सदैव अव्वल रहने वाली विद्यार्थी तो थी ही ,वह बहुत अच्छी गायिका भी थी ,उसके गाये भजनों की स्वर लहरियां श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किये देती थी .बचपन में ही उसके हाथों ने कुंची थाम ली थी ,वह किसी सधे हुए चित्रकार की भांति चित्रकारी करती थी .साथ ही साथ वह बहुत बढ़िया नृत्य भी करती थी .वह स्काऊट की लीडर भी थी और स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की परेड्स का भी नेतृत्व करती थी .

मात्र पांच साल की उम्र में मंच पर भाषण ,छह साल की उम्र में राज्य स्तरीय चित्रकारी ,आठ साल में इंग्लिश स्पीच ,दस साल की उम्र में परेड का नेतृत्व और पंद्रह साल की होते होते बारहवी कक्षा उत्तीर्ण करनेवाली डेल्टा हर दिल अज़ीज़ बन चुकी थी .वह इस इलाके की अध्ययनरत अन्य छात्राओं के लिए भी एक आदर्श बन गयी थी .त्रिमोही के हर अभिभावक की ख्वाहिश थी कि उनकी बेटी भी डेल्टा जैसी होनहार बन कर गाँव और परिवार का नाम रोशन करें .

आत्मविश्वास से भरी डेल्टा अपने प्रिय पिता और परिजनों के स्वप्नों को साकार करना चाहती थी ,वह आईपीएस बनने के अपने पिता के सपने को पूरा करना चाहती थी ,लेकिन वो जानती थी कि उसके पिता महेन्द्राराम कितनी मुश्किलों से उसे और अन्य भाई बहनों को पढ़ा रहे थे ,इसलिए वह जल्दी से जल्दी अपने पैरों पर खड़े होना चाहती थी ,ताकि पिता पर भार कम हो .उसने शिक्षिका बनने का संकल्प लिया और जयनारायण व्यास विश्वविध्यालय द्वारा आयोजित बेसिक स्कूल टीचर कोर्स की प्रवेश परीक्षा में शामिल हो गयी ,यहाँ भी उसने अपनी कामयाबी के झंडे गाड़े ,उसने छह सौ अंको वाली यह परीक्षा चार सौ उनसत्तर अंको से पास कर ली .शुरुआत में उसे जैसलमेर सेंटर मिला ,जहाँ वह चार दिन रही भी ,लेकिन वहां का माहौल ठीक नहीं होने से वह घर लौट आई . बाद में नोखा स्थित श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय को सही जानकर उसे मात्र पंद्रह साल की आयु में सन 2014 में बीकानेर जिले के नोखा पढ़ने के लिये भेज दिया गया. नोखा के इसी जैन आदर्श संस्थान में डेल्टा दो वर्ष से अध्ययनरत थी .

सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि अचानक  डेल्टा मेघवाल का शव 29 मार्च 2016 को श्री आदर्श जैन कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के हॉस्टल परिसर की पानी की टंकी में मिला .डेल्टा के पिता महेंद्रा राम को इस बात की सूचना दोपहर एक बजे दी गई ,वो देर रात 12 बजे नोखा पहुंचे .30 मार्च 2016 को सुबह 8 .30 पर उनकी ओर से नोखा थाने में संस्थान के संचालक ईश्वर चंद वैद ,पीटीआई विजेन्द्रसिंह ,वार्डन प्रिया शुक्ला तथा वार्डन के पति प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करवाई गई ,जो भारतीय दंड संहिता की धारा 302 ,376 (ग ) 201 ,34 एवं पोक्सो कानून की धारा 5 तथा 6 और अनुसूचित जाति ,जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 की धारा 3 (1 ) (12 ) के तहत दर्ज की गई .

डेल्टा के साथ बलात्कार तथा उसकी जघन्य हत्या के बाद पुलिस की भूमिका ,स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा डेल्टा को चरित्रहीन बताना .पुलिस द्वारा पहले ही दिन से पानी में डूबकर सुसाईड करने की कहानी दोहराना तथा शव के अंतिम संस्कार कर दिए जाने के बाद मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को बदलवा देना और बाद में पुलिस द्वारा प्रेस कांफ्रेंस करके डेल्टा के चरित्र पर आक्षेप लगाना .यह सब डेल्टा के सुनियोजित सांस्थानिक मर्डर को साबित करने के लिये काफी है .हम कह सकते है कि डेल्टा के साथ जैन संस्थान में बलात्कार किया गया ,उसके बाद साक्ष्य मिटाने के लिए उसे मार डाला गया .चूँकि जैन संस्थान का मालिक ईश्वरचंद आर एस एस  तथा बीजेपी से जुड़ा हुआ व्यक्ति है ,इसलिए उसे बचाने के लिए राजस्थान की सरकार ने डेल्टा की चरित्र हत्या की और अंततः पुलिस ने अपने आकाओं के इशारे पर इस जघन्य हत्या को आत्महत्या साबित करते हुए चार्जशीट पेश करने का दुष्कर्म कर दिखाया .कुमारी डेल्टा मेघवाल नोखा के आदर्श संस्थान के श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय की द्वितीय वर्ष छात्रा थी, इसी कॉलेज द्वारा संचालित हॉस्टल में वह रहती थी. उसकी शिक्षा,स्वास्थ्य तथा सुरक्षा की सम्पूर्ण जिम्मेदारी इसी आदर्श कहे जाने वाले जैन कॉलेज की ही थी. सवाल उठता है कि क्या इस जिम्मेदारी को कॉलेज निभाया ?

डेल्टा के साथ हुए यौनाचार एवं उसके पश्चात हुई निर्मम हत्या की हर कड़ी में साज़िश बहुत साफ नज़र आती है .जैन कॉलेज के प्रबंधन से लेकर पुलिस के अधिकारी कर्मचारी तक ,डेल्टा के लिए न्याय मांगने के लिए जुटे कुछ संदिग्ध लोगों से लेकर राजनीतिक आरक्षण की वजह से जनप्रतिनिधि बन पाये अनुसूचित जाति के नेताओं तक किसी ने भी अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाई हो ,ऐसा पूरे प्रकरण में दिखाई नहीं पड़ता है .ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि सब तरफ अन्याय करने की हौड सी मची हुई थी .डेल्टा का मामला जिन धाराओं में दर्ज हुआ ,अभी तो उन्हीं पर सवालिया निशान है . जबकि यह सर्वविदित है कि नब्बे के दशक में बना अजा जजा अत्याचार निवारण अधिनियम इसी साल 26 जनवरी 2016 को समाप्त हो कर अजा जजा अत्याचार निवारण संशोधित अधिनियम के रूप में लागू हो चुका है ,बावजूद इसके न केवल पुराने कानून की धाराओं में मामला दर्ज किया गया ,बल्कि उसी पुराने कानून के तहत ही चालान पेश करके पुलिस ने अपने बौद्धिक दिवालियेपन को जगजाहिर करने का ही काम किया है .इतना ही नहीं  पोक्सो एक्ट की भी धाराओं का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है ,जो धाराएं 5 एवं 6 लगाई गई है ,उनकी उपधाराओं का उल्लेख नहीं करना मामले को कमजोर करने का ही प्रयास लगता है .पोक्सो कानून की धारा 21 लगाई जानी चाहिए थी ,मगर नहीं लगाई गई है .हत्या के लिए लगाई गई भारतीय दंड संहिता की धारा 302 को तफ्तीश में बदल दिया गया है ,चार्जशीट भादस की धारा 305 के तहत पेश की गई है जो मर्डर को सुसाईड में तब्दील कर देती है .

क्या जाँच अधिकारी को दलित उत्पीडन ,यौन शोषण एवं पोक्सो जैसे कानूनों की सामान्य जानकारी भी नहीं थी या जानबूझकर यह गंभीर लापरवाही की गई ताकि दोषियों को बचाया जा सके .डेल्टा के शव का अपमान करनेवाले पुलिस अफसरान और संस्था अध्यक्ष के खिलाफ कोई भी कार्यवाही नहीं किया जाना क्या साबित करता है ,जिन सरकारी अधिकारीयों ने अपने कर्तव्य के निर्वहन में अपराधिक लापरवाही बरती है ,उन पर अजा जजा अत्याचार निवारण संशोधित अधिनियम की धारा 4 के तहत कार्यवाही क्यों नहीं की गई ? कार्यस्थल पर यौन हिंसा सम्बन्धी दिशानिर्देशों का सपष्ट उल्लंघन पाये जाने के बावजूद जैन संस्थान की मान्यता रद्द करने सम्बन्धी किसी भी तरह की कार्यवाही या अनुशंसा नहीं किया जाना क्या किसी मिलीभगत की तरफ ईशारा नहीं करते है .डेल्टा हत्याकांड के नामजद आरोपी आदर्श जैन संस्थान के अध्यक्ष ईश्वरचंद वैद जिन्होंने अपनी जवाबदेही को नहीं समझा तथा डेल्टा के मर्डर को आत्महत्या बनाने और साक्ष्य मिटाने का आपराधिक कृत्य किया है ,उन्हें बाइज्जत दोषमुक्त करना किस तरह से न्यायसंगत ठहराया जा सकता है ?

इतना ही नहीं बल्कि डेल्टा के पीड़ित परिजनों को दलित अत्याचार निवारण कानून और पोक्सो एक्ट एवं राजस्थान पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत मिलने वाला मुआवजा जो की 5 लाख 25 हजार रूपये होना चाहिए था ,वह देने के बजाय सिर्फ 90 हजार रुपये ही दिया जाना और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा मुआवजा देने का प्रार्थना पत्र अस्वीकार कर दिया जाना भी जुल्म की ही इस श्रृंखला की ही तो कोई कड़ी नहीं है ?

अब तक के पूरे घटनाक्रम से साफ हो गया है कि नोखा में डेल्टा के साथ जो जुल्म हुआ ,उस पर पर्दा डालने के काम में श्री आदर्श जैन संस्थान ,बीकानेर पुलिस और अनुसूचित जाति के जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत साफ साफ परिलक्षित होती है .हर कदम पर सब कुछ पहले से मैनेज्ड था ,पुलिस और अपराधी मिले हुए थे .सब मिलकर सच्चाई पर मिट्टी डालने का दुष्कृत्य कर रहे थे .किसी भी स्तर पर ऐसा नहीं लगता है कि डेल्टा मर्डर केस की सच्चाई को उजागर करने और अपराधियों को सजा दिलाने की कहीं भी ईमानदार कोशिस की गई हो !

जब यह स्पष्ट हो गया कि डेल्टा को राजस्थान के शासन और प्रशासन की ओर से न्याय नहीं मिल सकता है ,तो जस्टिस फॉर डेल्टा केम्पेन और दलित अत्याचार निवारण समिति सहित कई दलित एवं मानव अधिकार संगठनों की ओर से डेल्टा के गाँव त्रिमोही (गडरारोड )से लेकर देश और विदेशों तक सीबीआई जाँच की मांग को लेकर धरने ,प्रदर्शन ,रैलियां ,मोमबत्ती जुलुस आयोजित किये गये .

डेल्टा के साथ हुए अन्याय से जैसे जैसे लोग वाकिफ हुए जबरदस्त जन आक्रोश पैदा हो गया .सत्तारूढ़ दल के लिए जवाब देना भारी पड़ने लगा .इसी बीचकांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गाँधी डेल्टा के घर त्रिमोही पंहुच गये ,उन्होंने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर डेल्टा को देश की बेटी करार देते हुए उसे न्याय दिलाने का ऐलान किया .मामला बढ़ता देखकर राज्य सरकार की नींद खुली और उसने पहली बार महसूस किया कि देशव्यापी दलित आक्रोश उसके लिए भारी पड़ सकता है ,इसलिए आनन फानन में डेल्टा के पिता महेंद्रा राम को जयपुर बुलाया .

चौहटन सुरक्षित क्षेत्र के विधायक तरुण राय कागा जो कि प्रारंभ में इस मसले में काफी संवेदनशील रहे है तथा डेल्टा को न्याय मिले इसके लिए भी अपनी पार्टी में कोशिस करते रहे है ,उनके साथ महेन्द्रराम मुख्यमंत्री वसुंधराराजे से मिले .अंततः राज्य सरकार ने 20 अप्रैल 2016 को केंद्र सरकार को डेल्टा मामले की सीबीआई जाँच हेतु अनुशंसा कर दी .लोगों को उम्मीद जगी कि अब राज्य की निकम्मी पुलिस के हाथ से यह मामला केन्द्रीय जाँच ब्यूरो के पास चला जायेगा और मामले की निष्पक्ष जाँच होगी .

लेकिन सीबीआई जाँच के नाम पर राज्य और केंद्र की सरकार ने डेल्टा के परिजनों और उसके लिए संघर्षरत लोगों के साथ धोखा किया .राज्य सरकार द्वारा अनुशंसा किये जाने को तीन माह बीत गये है और डेल्टा की हत्या हुए चार माह गुजर गये है मगर आज तक सीबीआई जाँच के लिए नोखा नहीं पंहुची है .सीबीआई जाँच का पूरा पाखंड अब उजागर हो चुका है .राज्य की भाजपा सरकार ने सिर्फ अनुशंसा करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है और केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने राजस्थान पुलिस द्वारा आरोप पत्र दाखिल करने तक एक प्रतिभावान दलित छात्रा के बलात्कार के बाद मर्डर जैसे जघन्य कांड की सीबीआई जाँच के सम्बन्ध में नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है . कुल मिलाकर सीबीआई हेतु जाँच की बात को पहले तो ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया और इसी बीच बीकानेर पुलिस ने अत्यंत ही लचर किस्म का चालान बीकानेर न्यायालय में पेश कर दिया ,जिसकी आड़ में केंद्र सरकार ने सीबीआई जाँच की मांग को ठुकरा दिया .बीकानेर पुलिस ने अपनी चार्जशीट में जैन आदर्श  संस्थान के अध्यक्ष ईश्वरचंद को पूरी तरह से बचा लिया गया है .वार्डन प्रिया शुक्ला और उसका पति प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला पैरवी के अभाव में जमानत पर बाहर आ गये है . अब केवल बलात्कारी शिक्षक विजेन्द्रसिंह जेल में बचा है .

नारों का शोर थम चुका है .पीड़ित के घर तक आने जाने वाले राजनीतिक पर्यटक भी अब नहीं दिखलाई पड़ रहे है .धरनों के टेंट समेटे जा चुके है .सोशल मीडिया के शेर भी अन्यत्र व्यस्त हो गये है ,अब डेल्टा का मुद्दा उस तरह से हमारी संवेदनाओं को उद्देव्लित नहीं कर रहा है ,जिस तरह हमने रोहित वेमुला को भुलाया ,उसी तरह डेल्टा भी भुलायी जाने लगी है .चंद सरोकारी लोगों और डेल्टा के परिजनों को छोड़कर शायद ही कोई इस बात को याद करना चाहे कि देश की एक होनहार छात्रा की मौत की सच्चाई को सामने नहीं लाया जा सका . सरकारों का क्या ,उन्हें तो जब तक वोटों की चोट नहीं पड़े तब तक कोई जिए या मरे ,कोई फर्क ही नहीं पड़ता है .

संविधान व तमाम कानूनों के होने और आंदोलनों एवं संघर्षों के बावजूद हमने अपनी आँखों से डेल्टा के मामले में न्याय ,व्यवस्था और कानून को दम तोड़ते देखा है .अगर भारतीय लोकतंत्र को बचाना है तो यह जरुरी है कि डेल्टा सहित हर अन्यायपूर्ण मसले की निष्पक्ष जाँच हो तथा अपराधी चाहे वे कितने ही प्रभावशाली क्यों ना हो ,सलाखों के पीछे जाये ,अन्यथा हम एक विफल लोकतंत्र और अन्यायकारी राष्ट्र है .

जब तक डेल्टा जैसी देश की होनहार बेटियां इस देश में असुरक्षित है ,तब तक भारत माता की जय के नारे बेमानी है ,बेहूदे है और बकवास है !

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विशेष :

  • डेल्टा के पिता महेन्द्राराम मेघवाल इस फिल्मोत्सव में हमारे बीच होंगे.
  • पिछले दिनों डेल्टा के घर गडरा रोड से जयपुर तक दस दिन की ‘दलित महिला स्वाभिमान यात्रा’ निकाली गयी. इस यात्रा की संयोजक सुमन देवाथिया भी हमारे बीच होंगी.

जंगल के दावेदारों की गायिका : महाश्वेता

हमारा फिल्मोत्सव महाश्वेता देवी की स्मृति को समर्पित है.

महाश्वेता जी बांग्ला की लेखिका थीं, पर हिंदी के पाठकों और साहित्यकारों के बीच भी वे बेहद लोकप्रिय थीं। उन्होंने आदिवासियों, दलितों, स्त्रियों और हाशिये के अन्य समुदायों तथा गरीब-मेहनतकश वर्ग के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया। महाश्वेता जी उन लेखकों में थीं जो शासकीय दमन का विरोध करते हुए जनता के प्रतिरोधों और आंदोलनों के पक्ष में पूरी हिम्मत के साथ खड़े होते रहे हैं। उन्होंने लेखन के क्षेत्र में स्त्री की ताकतवर दावेदारी स्थापित की और जनपक्षधर साहित्य लेखन के क्षेत्र में एक जबर्दस्त मिसाल कायम की। ‘जंगल के दावेदार’, ‘अग्निगर्भ’, ‘चोट्टि मुंडा और उनका तीर’, ‘टेरोडेक्टिल’, ‘शालगिरह की पुकार’, ‘हजार चैरासी की मां’, ‘मास्टर साब’ आदि उनके ज़्यादातर बहचर्चित उपन्यासों में आदिवासियों और भूमिहीन किसानों की जिंदगी, उनका जुझारू संघर्ष और बेमिसाल प्रतिरोध ही केंद्र में रहे। उन्होंने 1857 के महासंग्राम से संबन्धित ‘झांसी की रानी’, ‘नटी’ और ‘अग्निशिखा’ नामक तीन उपन्यास भी लिखे। उनके कई कहानी संग्रह भी प्रकाशित हैं। ‘द्रौपदी’, ‘बांयेन’, ‘बीज’ ‘शिकार’, ‘रूदाली’ ‘अक्लांत कौरव’, ‘घहराती घटाएं’ आदि उनकी चर्चित कहानियां हैं।

वामपंथी सरकार के जरिए नंदीग्राम और सिंगुर में राज्य दमन किए जाने के खिलाफ उन्होंने उत्पीड़ित किसानों का पक्ष लिया था, जो प्रगतिशील-जनपक्षधर लेखकों की सामाजिक-राजनीतिक भूमिका के लिहाज से हमेशा पथ-प्रदर्शक रहेगा. उन्होंने कहा था, ”हमें उनसे (किसानों से) सीखने की जरूरत है। उनसे सीखने का भाव लेकर उनके पास जाओ उनको सिखाने का नहीं। इस देश का आम आदमी ज्यादा जानता है।” बुद्धिजीवियों और नौजवानों की भूमिका के बारे में उन्होंने उसी साक्षात्कार में कहा था- ”हमें घर में बैठने का कोई अधिकार नहीं है। जो जहां है वहाँ से निकलो। घर में बैठकर बड़ी-बड़ी बात करने का समय नहीं, बाहर निकलने का समय है। मैं तो हमेशा सबसे कहती हूँ, नौजवानों से भी कहती हूँ- जाओ गांवों में, किसानों में, उनसे जाकर मिलो।”art2

इस समय महाश्वेता देवी को याद करना और प्रासंगिक है. 21 सितम्बर को हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय में महाश्वेता देवी की कहानी ‘द्रौपदी’ के मंचन के बाद दक्षिणपंथी गिरोह ने इसे सेना का अपमान करनेवाला और देशद्रोही नाटक बताकर शहर भर में प्रदर्शन किये और दबाव में आकर विश्वविद्यालय ने विभाग के शिक्षकों के खिलाफ जांच बिठा दी. ‘द्रौपदी’ महाश्वेता देवी की प्रसिद्द कहानी है जिस पर पहले भी कई बार नाटक खेले जाते रहे हैं. याद आता है, मणिपुरी के मशहूर निर्देशक हेस्नाम कन्हाईलाल ने सन 2000 में यह नाटक खेला था. भारतीय रंगमंच के एक विलक्षण प्रयोग के अंतर्गत मुख्य अभिनेत्री साबित्री हेस्नाम, जो उनकी पत्नी थीं, मंच पर  अनावृत्त हो गयी थीं. सन 2004 में मणिपुर की बारह महिलाओं ने असाम राइफल्स के खिलाफ नग्न होकर जो ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था, उसकी प्रेरणा यही नाटक माना जाता है. %e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2

पद्मभूषण हेस्नाम कन्हाईलाल का 6 अक्टूबर, 2016 को निधन हो गया.

महाश्वेता और कन्हाईलाल, दोनों  कलाओं में विद्रोह के चितेरे हैं. हम उनकी विरासत को आगे बढाने के लिए प्रयासरत हैं.

प्लासेबो : अभय कुमार

कहानी एक हादसे से शुरू हुई. निर्देशक अभय कुमार के भाई साहिल ने अपने हाथ से खिड़की का कांच तोड़कर खुदको ज़ख़्मी कर लिया. उनका स्नायुतंत्र ध्वस्त हो गया और उन्हें एक बड़े ऑपरेशन से गुजरना पड़ा. अभय इस हादसे के बाद सवालों से घिर गए. साहिल भारत के सर्वोच्च शिक्षण संस्थानों में से एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के विद्यार्थी थे. किस उधेड़बुन में था साहिल ? क्या चीज़ परेशान कर रही थी उसे ? इन सवालों के जवाब जानने के लिए अभय ने कैमरा उठाया और वे एम्स कैम्पस में घुस गए. वहीं होस्टल में रहने लगे. यह एकदम ख़ुफ़िया छापामार कार्रवाई थी यानी अभय बाहरी हैं, यह किसी को बताया नहीं गया था. पहले सोचा था कि यह कुछ महीनों का मामला होगा लेकिन आखिरकार वे डेढ़ साल तक वहां रहे.

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फिल्म एक आत्महत्या के बाद विद्यार्थियों के प्रदर्शन से शुरू होती है और फिर यह गलाकाट प्रतिस्पर्धा, भेदभाव और इस सबके साथ अकेलेपन और अवसाद में जाते विद्यार्थियों के बीच घूमती है. अभय, साहिल और उसके तीन और दोस्तों ( चोपड़ा, सेठी और के – जिसका नाम हम आखिर में जान पाते हैं ) को अपनी फिल्म का मुख्य चरित्र बनाते हैं. वंचनाओं का कोई एक रूप नहीं होता और न ही कोई बना बनाया रेडीमेड हल उपलब्ध है उनका. यही कारण है कि यह फिल्म अपने शिल्प और कहन में जटिल है और कोई समाधान भी नहीं सुझाती. फिर भी, इतना तय है कि संस्थानों की उदासीन क्रूरता, संस्थानों के बाहर की ‘समझदार’ दुनिया और संस्थानों के भीतर विद्यार्थी को तोड़ डालती परतदार यंत्रणाएं – प्लासेबो हमारे सामने एक धूसर चित्र रख देती है. यह चित्र हमारा आइना है.

फिल्मोत्सव के दूसरे दिन की दो फ़िल्में – ‘प्लासेबो’ और ‘आई एम नागेश्वर राव स्टार’ हमारे सामने हमारे परिसरों का वो चेहरा रख देती हैं जिसका हम सामना नहीं करना चाहते क्योंकि वह हमारा भयावह यथार्थ है. प्रासंगिक है कि हमारा यह फिल्मोत्सव जिन दो होनहार प्रतिभाओं को याद कर रहा है, उन्हें भी हमारे परिसरों ने ही निगल लिया – डेल्टा और रोहित.

  • प्लासेबो / दस्तावेजी फ़िल्म/ अभय कुमार / 96 मिनिट / 1.00 – 2.40, 15 अक्टूबर

प्रतिरोध का सिनेमा – सिनेमा का प्रतिरोध

“हमें कैमरे का इस्तेमाल वैसे ही करना चाहिए जैसे वियतनामियों ने अमरीका से युद्ध में लड़ते हुए साइकिल का किया.”

  • गोदार्द,फ्रेंच न्यू वेव सिनेमा के फिल्मकार – अर्जेंटीना के क्रांतिकारी फिल्मकार फर्नान्डो सोलानास से बातचीत में, 1969 ( ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी के लेख से उद्धृत)

“डाक्यूमेंट्री फिल्म के लिए वर्तमान समय काफी मुफीद है, शायद सबसे खुशनुमा….इस ऊर्जा को जो सबसे अद्भुत ( यूनीक) बनाता है और यह न सिर्फ भारत बल्कि भूमंडलीकरण के परिदृश्य में तो और भी मौजूं है, वह यह कि इसका निर्माण बिना किसी औपचारिक,संगठित और आर्थिक संरचना के हुआ है.”

  • प्रख्यात दस्तावेजी फिल्मकार संजय काक के लेख से उद्धृत.

10620435_718144558265233_3731730261649592674_o (संजय काक बीज वक्तव्य देते हुए : दूसरा उदयपुर फ़िल्मोत्सव)

भूमंडलीकरण और टैक्नौलोजी के विस्तार के साथ सिनेमा बनाना सिर्फ कुछ धनिकों के हाथ की कुंजी नहीं रह गया है. इसके बावजूद हम हर दूसरी फिल्म के बनने के करोड़ों के आंकड़े और फिर उसमें एकाध शून्य बढ़ाकर कमाई के आंकड़े पढ़ते हैं. इन दोनों तथ्यों में छुपी विडम्बना को समझना मुश्किल नहीं है. मल्टीप्लेक्सेज ने सिनेमा को ऐसे उत्पाद में बदल दिया है जो सिनेमा को वहां मिलने वाली चिप्स सरीखा बनाकर ही बेच रहा है.क्या सिंगल स्क्रीन थिएटर, मल्टीप्लेक्सेज के सामने अंतिम लड़ाई हार गए हैं ? क्या मल्टीप्लेक्सेज में सुबह के एकाध शो में दिखाई जा रही छोटे बजट की सामयिक फिल्मों को स्वतंत्र सिनेमा के लिए बन रही जगह के खुशनुमा रूप में देखा जाए ? इन दोनों ही सवालों का जवाब नहीं है लेकिन यह सरल ‘नहीं’ नहीं है, इसके लिए रणनीति और लम्बी सांस्कृतिक कार्रवाई की जरूरत है.’प्रतिरोध का सिनेमा’ इसी कोशिश का एक मॉडल है. दरअसल सिनेमा बनाना कम खर्चीला होने के बावजूद, वितरण की व्यवस्था पर पूंजीवादी शक्तियों का एकाधिकार है. इस मायने में जनता के मुद्दे उठाने वाले सिनेमा की व्यापक पहुँच और उसके अपने पांवों पर खड़े होने की लड़ाई, नीम्बू पानी की कोक से लड़ाई से भिन्न नहीं है.

क्या आपको अस्सी के दशक तक सिनेमा हॉल में फिल्म के पहले दिखाई जाने वाली छोटी एक एक मिनट की फ़िल्में याद हैं. उन्हें ‘वृत्त चित्र’ कहते थे. नहीं, वे मुफ्त नहीं थीं, उनके पैसे सिनेमा हॉल के मालिकों से लिए जाते थे, जो वे अंततः आपसे ही वसूलते थे. फिल्म्स डिविजन ये फ़िल्में बनाता था. एनऍफ़डीसी उस दौर में समानांतर सिनेमा को भी आर्थिक संरक्षण देता था. समय के साथ ये दोनों मॉडल ढह गए. इस संरक्षणवादी मॉडल का ढहना अन्तः सिनेमा में उभरने वाली स्वतन्त्र आवाजों के लिए अच्छा ही साबित हुआ. आज गैर कथात्मक फिल्मों को हिन्दी में ‘दस्तावेजी सिनेमा’ कहा जाता है, जो वैसे तो डाक्यूमेंट्री सिनेमा का सटीक अनुवाद ही है, लेकिन ध्यान से देखें तो इन दो लफ़्ज़ों में पुराने और नए मॉडल का मूलभूत फर्क छिपा है. वृत्तचित्र – हिन्दी में प्रसिद्द पद ‘इतिवृत्तात्मकता’ की याद दिलाता है और इस शब्द सरीखा ही वह तटस्थ और निरपेक्ष होने का दावा करता था. पहला दावा झूठा था क्योंकि सरकारी संरक्षण उसे सरकारी नीतियों के पक्ष और उनके प्रचार प्रसार की राजनीति के पक्ष में खडा करता था और दूसरा दावा निराशाजनक था क्योंकि इन वृत्तचित्रों में ( चुनींदा अपवादों को छोड़कर ) उन मुद्दों से जुड़ाव की रत्ती भर भी झलक नहीं मिलती थी, जिन्हें वह उठाता था. नया दस्तावेजी सिनेमा न सिर्फ स्वतन्त्र है बल्कि वह इस स्वतंत्रता के लिए आवश्यक आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए रास्ते तलाश रहा है.

सन उन्नीस सौ चौहत्तर में आनंद पटवर्धन की फिल्म ‘क्रान्ति की तरंगें’ को हम इस नए रास्ते की ओर पहले कदम के रूप में आँक सकते हैं. नब्बे के दशक तक के पी ससी, दीपा धनराज, वसुधा जोशी, रंजन पालित, रीना मोहन, मंजीरा दत्ता, रुचिर जोशी, मधुश्री दत्ता जैसे नए फिल्मकारों की पीढी आ गयी थी जिन्होंने अपनी दस्तावेजी फिल्मों के जरिये असुविधाजनक लेकिन जरूरी सवाल पूछने शुरू कर दिए थे पर फिर भी इन फिल्मों की व्यापक पहुँच अभी भी टेढ़ी खीर थी.

नब्बे के दशक में डिजिटल टैक्नोलौजी आयी जिसने न सिर्फ भारी भरकम कैमरों के तकलीफदेह इस्तेमाल  को गैरजरूरी बना दिया बल्कि इसने फिल्मों के वितरण और प्रसार को भी सुगम बना दिया.

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(पहले उदयपुर फ़िल्मोत्सव में आनंद पटवर्धन के साथ सूर्य शंकर दाश)

‘प्रतिरोध का सिनेमा’ इसी ऐतिहासिक मोड़ पर आया. सन दो हज़ार चार में सरकारी सेंसरशिप के खिलाफ स्वतन्त्र फिल्मकारों ने ‘विकल्प’ फिल्म समारोह करके इस राह को दिखा दिया था. 2006 की 23 मार्च को यानी भगत सिंह की शहादत दिवस के दिन जन संस्कृति मंच की उत्तर प्रदेश इकाई ने  गोरखपुर में पहले फिल्मोत्सव का आयोजन किया. पहले फिल्मोत्सव से ही दृढतापूर्वक एक फैसला लिया गया जिसे ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ की वैचारिकी और अनूठेपन के रूप में चिह्नित किया जा सकता है. इस अभियान ने सरकारी, कॉरपोरेट और एन जी ओ – स्पोंसरशिप के किसी भी रूप को साफ़ तौर पर ठुकरा दिया. इसकी बजाय इसने आयोजन के लिए जन सहयोग पर भरोसा किया. जन सहयोग का अर्थ यह नहीं कि दर्शक टिकट खरीदकर पैसा देगा, बल्कि यह कि जो दर्शक इस अभियान के साथ जुड़ाव महसूस करेगा वह जिस रूप में चाहे अपनी सहभागिता कर सकेगा. आर्थिक भी और अन्य रूपों में भी.

ध्यान से देखें तो इस एक विचार में कलात्मक क्षेत्र में प्रतिरोध का सारा रास्ता छिपा है. सिनेमा यदि एक उत्पाद से ज्यादा एक कलाकृति है तो उसके उपभोग नहीं आस्वादन के सिद्धांत होने चाहिए और कलारूपों की वे सारी बहसें जो दुनिया भर में उसके आस्वादन के सिद्धांतों को लेकर चलती रही हैं, उस पर भी लागू होनी चाहिए. यही कारण है कि प्रतिरोध का सिनेमा उत्सवों ने फिल्म प्रदर्शन के बाद उनपर खुले सम्वाद सत्र आयोजित कर इन फिल्मों के कलात्मक पक्ष के साथ साथ इन फिल्मों के जरिये उठने वाले सवालों पर सार्थक बहस को जन्म दिया.फिल्मकारों और दर्शकों के बीच एक पुल का काम किया और सबसे बड़ी बात, दर्शकों को उपभोक्ता से ज्यादा सहभागी में बदलकर कला की सामाजिक प्रतिबद्धता को सुनिश्चित किया.सहभागिता का यह सिद्धांत दर्शकों पर भी लागू होता है और हर अगले शहर में जहां ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ की नई इकाई शुरू होती है, एक नहीं बल्कि समूह की जवाबदेही , एक नहीं बल्कि समूह के प्रति सुनिश्चित होती जाती है.इस अभियान की यही जनतांत्रिक पद्धति इसे एक इवेंट नहीं बल्कि एक अभियान के रूप में चिह्नित करती है और यह फैलता जा रहा है. आज नौ राज्यों के पंद्रह से ज्यादा शहरों में नियमित सालाना फिल्मोत्सव और मासिक स्क्रीनिंग्स होती हैं. कोलकाता में ग्रामीण और शहरी इलाकों में चल फिल्मोत्सवों के रूप में, उदयपुर में बच्चों के लिए स्कूलों में और मोहल्ला स्क्रीनिंग्स के रूप में, हैदराबाद में विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के बीच फिल्मों के प्रसार के नए नए रास्ते खोजे जा रहे हैं. जन सहभागिता पर भरोसे का प्रत्युत्तर उनके विविध रूपों में जुड़ने में दिखाई देता है. गोरखपुर में ऑडिटोरियम न होने पर आरिफ़ अजीज़ लेनिन अपने स्कूलों के ब्लैकबोर्ड लाकर पर्याप्त अन्धेरा करते हैं तो उदयपुर में असलम खान अपने नए खाली मकान को उत्सव अवधि में मेहमानों के रुकने के लिए खुशी से सौंप देते हैं, भिलाई में सफाई कामगारों के बीच दिखाई जा रही आर पी अमुधन की फिल्म ‘शिट’ को सबके लिए बोधगम्य बनाने के लिए एक युवा साथी उठकर लाइव अनुवाद शुरू कर देता है तो नैनीताल में चौथे फिल्मोत्सव की सदारत कर रहे शेखर पाठक अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की मंच से घोषणा कर एक फिल्म आयोजन को समाज के व्यापक सरोकारों से जोड़ देते हैं. बेला नेगी, बिक्रमजित गुप्ता या ऐसे कई फिल्मकारों की फीचर फ़िल्में, जो अपेक्षानुरूप अखिल भारतीय रिलीज न मिल पाने के कारण देश के उस व्यापकवर्ग तक नहीं पहुँच पाती जिसकी कहानी वे अपनी फिल्म में दिखाते हैं, उन्हें ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ ने छोटे शहरों के दर्शकों के बीच पहुँचाया. दस्तावेजी सिनेमा में तो यह लड़ाई और तीखी है क्योंकि कॉरपोरेट सेक्टर द्वारा जब जल-जंगल-जमीन को हथियाया जा रहा है और सरकारें अपने कल्याणकारी राज्य के खोल के अंदर कॉरपोरेट सेक्टर के साथ दुरभिसंधि कर चुकी हैं तब सरकारों की जवाबदेही निभाने में विफलता और कॉरपोरेट की लूट को दिखानेवाला सिनेमा वितरण के लिए इस परम्परागत तंत्र के पास तो नहीं जा सकता, उसे किसी वैकल्पिक जन माध्यम की ही जरूरत है.

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Shailendra, Co-ordinator, Udaipur Film Festival, Dr. Naval Kishor, Surya Shankar Dash, Bela Negi and Sanjay Joshi, Co-ordinator, The Group, Jan Sanskriti Manch releasing the Smarika of the First Udaipur Film Festival at the Inaugaral function

आज ftii के विद्यार्थियों की हड़ताल के सन्दर्भ में यह सवाल नए आयाम प्राप्त कर लेते हैं. अंतर्राष्ट्रीय फिल्मोत्सव, गोवा में प्लेकार्ड्स लहरा रहे दो विद्यार्थियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है, FTII के लोगो वाली टीशर्ट पहनने वालों को रोक दिया जाता है और FTII के छात्रों की फिल्मों को इस फिल्मोत्सव में प्रदर्शन से रोक दिया जाता है. सरकार महीनों से चल रही हड़ताल की तो पूरी आपराधिक उपेक्षा करती ही रही, उसके राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रसार को भी पूरी बेशर्मी से कुचलने की कोशिश की. कॉरपोरेट परस्त मीडिया ने भी FTII के विद्यार्थियों को परजीवी के रूप में चित्रित कर उनके विरोध को राजनीति प्रेरित बताया और IIT जैसे संस्थानों से तुलना कर ftii के विद्यार्थियों पर कितना खर्चा होता है और ये बदले में देश को क्या देते हैं , जैसी बेईमान बहस की ओर इसे मोड़ा. FTII के विद्यार्थियों की लड़ाई सिर्फ निर्देशक के चयन की लड़ाई नहीं है, जैसा उसे दिखाया गया.यह अंततः कला की स्वतंत्रता की लड़ाई है.कला, उत्पाद की तरह कुछ ‘दे’ या वह जो भी दे उसे लाभ हानि के तराजू में तोला जा सके, यह मांग तो अंततः उसे राज्याश्रय और सेठाश्रय की ओर ही ले जायेगी, जिसका अगला चरण ऐसे शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता के क्षय में आयेगा, जिसके विरुद्ध पूरे दमखम से आज FTII के विद्यार्थी लड़ रहे हैं. ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ की पक्षधरता ऐसे ही मामलों में स्पष्टता से प्रकट होती है. प्लेकार्ड्स लहराने वाले विद्यार्थियों में से एक किसलय की फिल्म हमारे यहाँ दिखाई गयी थी और FTII के पूर्व छात्र नकुल सिंह साहनी की नई दस्तावेजी फिल्म ‘मुज़फ्फरनगर बाकी है’ को जब दिल्ली में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के गुंडों द्वारा रोक दिया गया तब ‘प्रतिरोध का सिनेमा’के आह्वान पर देश भर में इसका एक ही दिन सामूहिक प्रदर्शन हुआ.

यह ऐतिहासिक दिन ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के सही रास्ते पर होने के विशवास की पुष्टि ही करता है. जनता तक पहुँच, जनता का समर्थन और जननिर्भरता से निर्माण ये तीन स्वप्न हैं. तीसरा यदि अभी छोटे स्तर पर ही संभव और बड़े पैमाने पर अभी भी दूर लगता हो तो याद रखना चाहिए कि दस साल पहले, पहले दो सपने भी असम्भाव्य ही थे और वे आज हक़ीकत हैं.

उदयपुर चैप्टर से जुड़े दो प्रसंगों के साथ बात आगे बढ़ाऊंगा. तीसरे उदयपुर फिल्मोत्सव के लिए फिल्मों का चयन –निर्धारण कार्य चल रहा था.फिल्मों के चयन के लिए एक राष्ट्रीय स्तर पर क्यूरेशन कमेटी है और स्थानीय टीम के साथ मिलकर फिल्मों का चुनाव किया जाता है. फिल्मों के चयन में समकालीनता और प्रासंगिकता दोनों का ध्यान रखा जाता है. यानी नई के साथ वे पुरानी फ़िल्में भी चुनी जा सकती हैं जो उससे जुड़े किसी कलाकार के कारण आज प्रासंगिक हों या अपनी क्लासिकी के कारण हर दौर में दोहराई जा सकती हों.यहाँ यह जोड़ दिया जाए कि प्रासंगिकता का अर्थ – जिस शहर में आयोजन हो रहा है, वहां के लिए मौजूं होना भी है और जिस वक्त में आयोजन हो रहा है, उस वक्त के जरूरी सवालों से टकराना भी है. एक और बात जो फिल्मों के चयन में आधार बनती है, वो है फिल्मकारों की आयोजन तिथियों में आने की स्वीकृति मिल पाना. चयन पर आख़िरी मुहर स्थानीय टीम की ही लगती है और बाज दफ़ा किसी ख़ास फिल्म को लेकर लम्बी बहसों का भी यादगार इतिहास मेल्स के पन्नों में दर्ज है.

तीसरे फिल्मोत्सव के समय संजय भाई द्वारा इफ्फत फ़ातिमा की नई दस्तावेजी फिल्म ‘खून दिय बराव’ का सुझाव दिया गया. इस फिल्म का अभी तक सीमित प्रदर्शन ही हुआ था पर संजय ने यह फिल्म देख भी रखी थी और खूब तारीफ भी की थी. इफ्फत फातिमा का हमारे ( यानी उदयपुर फिल्म सोसाइटी के) लिए विशेष महत्त्व था. दूसरे फिल्मोत्सव में उनकी फिल्म ‘व्हेयर हैव यू हिडन माई न्यू क्रिसेंट मून’ दिखाई गयी थी.इस फिल्म के अंगरेजी/कश्मीरी में होने के कारण इस फिल्म के संवादों का हिन्दी तर्जुमा जन संस्कृति मंच के वरिष्ठ साथी गोपाल प्रधान द्वारा किया गया था और यह फिल्म जहां भी दिखाई जाती थी वहां फिल्म के दौरान कोई साथी समानांतर सम्वाद पढता जाता था. कहना न होगा कि फिल्मों को अधिकाधिक लोगों तक पहंचाने के प्रयास के तहत किये गए कई उत्साही प्रयोगों में से ये एक था. पर थी यह व्यवस्था फौरी ही. उदयपुर में हमारे एक नौजवान साथी कुमार गौरव ने इस का चुटकियों में हल करते हुए इन सबटाइटल्स को इन्सर्ट कर दिया. तो दूसरे उदयपुर फिल्मोत्सव में भी और आगे जहां भी यह फिल्म दिखाई गयी, उदयपुर आंशिक रूप से उसके साथ जुड़ ही गया. ‘व्हेयेर हेव यू हिडन माई न्यू क्रिसेंट मून’ कश्मीर में लापता लोगों के परिजनों की व्यथा कथा कहती है. यह फिल्म इफ्फ़त जी के दस साल लम्बे शोध का एक हिस्सा थी जो वे अपने गृह राज्य कश्मीर में रहते हुए दस्तावेजीकृत कर रही थीं. ‘खून दिय बराव’ उसी लम्बी परियोजना की अगली संभवतः मुकम्मल कड़ी थी. इफ्फ़त फ़ातिमा को हम उदयपुर बुलाने और सुनने के भी इच्छुक थे, अतः यह फिल्म शुरुआती दौर में ही दिखाई जाने वाले सूची में जगह पा गयी. इफ्फ़त जी ने हमारे बुलावे को मान भी लिया. आगे उमा चक्रबर्ती – जो भारत की अग्रणी नारीवादी इतिहासकार होने के साथ साथ दस्तावेजी फिल्मकार भी हैं, उन्हें बुलाया जाना भी निश्चित हुआ. चूंकि उमा जी कश्मीर के सवाल पर लिखती रही हैं, अतः हमने उदघाटन फिल्म के रूप में ‘खून दिय बराव’ को रखना और फिल्म के बाद इन दोनों के सम्वाद का क्रम तय कर दिया.

स्थानीय टीम के रूप में हमें तो सारी फ़िल्में पहले देख ही लेनी होती है. स्मारिका तैयार करने और भावी प्रस्तुतियों के लिए आधार तैयार करने के क्रम में भी यह होता ही है. फ्स्तिवल के कोई पंद्रह दिन पहले मैंने और प्रज्ञा ( उदयपुर फिल्म सोसाइटी की सदस्य और मेरी पत्नी ) ने मिलकर यह फिल्म देखी. फिल्म देखने के बाद थोड़ी देर खामोशी पसरी रही. गहरा असर छोड़ने वाली यह फिल्म पिछली फिल्म से आगे की कड़ी थी. अगर पिछली फिल्म में ‘सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम’ ( AFSPA ) के शिकार लोगों की तकलीफों से रूबरू कराती थी तो इसमें उनकी तकलीफों के साथ साथ उनके लड़ने के जज़्बे और उनके असंतोष की विविध अभिव्यक्तियाँ भी थीं. न्याय की प्रत्येक आक्रोशित पुकार को देशद्रोह मानने के इस घोर राष्ट्रवादी समय में ये दृश्य संवेदनशील प्रतीत हो रहे थे. शहर में उन्हीं दिनों एक निजी विश्वविद्यालय में रह रहे एक हजार से ज्यादा कश्मीरी छात्रों को अचानक आधी रात जबरन छात्रावास और शहर से विस्थापित कर दिया गया था. एक मेस वर्कर से एक छात्र की मामूली झड़प के बाद बजरंग दल ने दृश्य में प्रवेश कर इसे ‘भारत बनाम कश्मीर’ का रंग दे दिया था. क्या ऐसे में यह फिल्म शहर में एक समझ पैदा करने की जगह अनचाहे विवाद को जन्म दे देगी ? हम सेंसरशिप के सबसे खतरनाक रूप ‘सेल्फ सेंसरशिप’ का शिकार हो रहे थे. हम दोनों के बाद कोर कमेटी के दस और साथियों ने यह फिल्म देखी, सामूहिक फैसला हुआ कि घोषित कार्यक्रम के अनुसार फिल्म तो दिखाई जायेगी, हाँ, हमने ये जरूर किया कि ‘तकनीकी बाध्यता’ का हवाला देकर इसे उदघाटन फिल्म की जगह समारोह की अंतिम फिल्म बना दिया.

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(तीसरा फ़िल्मोत्सव : बाएं से दायें कुमार गौरव, भंवर मेघवंशी, नकुल सिंह साहनी, इफ्फ़त फ़ातिमा और हिमांशु पंड्या दर्शको से संवाद करते हुए)

आख़िरी दिन की आख़िरी फिल्म तक दर्शक घट जाते हैं लेकिन उदयपुर फिल्मोत्सव तीन सालों में लोगों के दिलों में जगह बना चुका है तो परिणामतः फिल्म के प्रदर्शन के समय डेढ़ सौ लोग मौजूद थे.सबके साथ फिल्म देखते समय मैं खुद से ज्यादा औरों की निगाह से फिल्म को देखने की कोशिश कर रहा था, शायद मेरे और साथी भी ऐसा कर रहे हों.फिल्म ख़तम हुई, कुछ क्षण वैसे ही सन्नाटा रहा, जैसा हमने अपने घर में पसरा महसूस किया था. फिर – दो अनजान लडकियाँ, जिन्हें मैंने इस फेस्टिवल से पहले नहीं देखा था, अपनी जगह से खड़ी हुईं, और देखते देखते सारा हॉल खडा हो गया. तालियाँ बज रही थीं और मेरे कई सारे भ्रम टूट रहे थे. सिर्फ अच्छा सिनेमा ही दर्शकों की संवेदनशीलता और आस्वादन को बेहतर नहीं बनाता बल्कि अच्छे दर्शक भी अच्छे सिनेमा के लिए मजबूत आधारस्तंभ का कार्य करते हैं और ये दोनों प्रक्रियाएं इतनी अन्योन्याश्रित हैं कि इनमें लाभार्थी-प्रेषक का मापन मूढमति ही करेगा.

दूसरा उदाहरण उस नौजवान का है, जिसका ज़िक्र दो पैरेग्राफ पहले भी आया है. कुमार गौरव उदयपुर फिल्म सोसाइटी का अठारह वर्षीय सदस्य जिसने अभी बारहवीं की परीक्षा दी है. अपने गृह जिले , जमशेदपुर में जब साम्प्रदायिक दंगे भड़के तो गौरव ने कैमरा उठाया और ऐन तनावग्रस्त क्षेत्र में जाकर सब पहलुओं से फिल्मांकन का प्रयास किया. परिणाम एक फिल्म के रूप में आया – ‘कर्फ्यू’. (आज उस फिल्म के कारण गौरव को दक्षिणपंथी गिरोहों द्वारा ऑनलाइन धमकियां मिल रही हैं, वो एक अलग मसला है.) यह मुझे उल्लेखनीय क्यों लगता है ? नहीं, बतौर फिल्म ‘कर्फ्यू’ कैसी है, उसका शिल्प परम्परागत मानदंडों पर कैसा है, यह मेरे लिए मसला है ही नहीं. मेरे लिए सिर्फ यह चकित कर देने वाली बात है कि एक दंगे के समय एक नौजवान ने कैमरा उठाकर उसका दस्तावेजीकरण करने की सोची. पहले उदयपुर फिल्मोत्सव में मुख्य वक्ता सूर्य शंकर दाश ने जब नौजवानों से कहा था कि कैमरा आपका नया हथियार होना चाहिए तो क्या उसकी कड़ी की स्वाभाविक परिणति के रूप में आज यह परिघटना नहीं देखी जानी चाहिए ? दूसरी बात, सिनेमा की अभिजनता और विशिष्टता को तर्क करके ही उसकी बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है. प्रख्यात कथाकार स्वयं प्रकाश ने एक साक्षात्कार में कहा था कि जिस समाज में सैंकड़ों कहानीकारों के लिखने और पढ़े जाने के लिए अवकाश नहीं है, उसमें आप किसी चमत्कार की तरह एक प्रेमचंद के होने की उम्मीद नहीं कर सकते. सिनेमा अपनी तकनीकी बाधाओं के चलते अभी तक इस सामान्यीकरण को प्राप्त नहीं कर पाता था, पर अब तकनीक की सर्वसुलभता के बाद जरूरी है कि सिनेमा बनाने की अभिजनता को भी ख़त्म किया जाए.

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ऊपर के दोनों उदाहरण उस शुरुआती बात को पुख्ता करने के लिए ही दिए गए कि जनसहभागिता, न सिर्फ जनता तक पहुँच और जवाबदेही को बढाती है बल्कि वह कारवाँ को भी बड़ा बनाती है और नए जुड़ने वाले सिर्फ कारवाँ को बड़ा ही नहीं बनाते बल्कि इसे नई नई दिशाएं भी देते हैं. शंकर शैलेन्द्र ने इसी तरह के कारवाँ के लिए लिखा था – ‘हमारे कारवाँ को मंजिलों का इन्तजार है / ये आँधियों, ये बिजलियों की पीठ पर सवार है.’

हिमांशु पंड्या ( सदस्य, उदयपुर फिल्म सोसाइटी )

  • * ( इस लेख को लिखने के सन्दर्भ में सूचनाओं से लेकर दृष्टि प्रदान करने तक में मेरे साथी संजय जोशी का महत्त्वपूर्ण योग्दान है. यह दृष्टि लेख लिखने के दौरान ही नहीं बल्कि निरंतर होने वाले फिल्मोत्सवों के दौरान भी मिली है.)
  • यह लेख समकालीन जनमत के सिनेमा विशेषांक में सबसे पहले प्रकाशित हुआ.

‘अग्निशिखा : स्त्री, आज़ादी और इज्ज़त के बारे में’

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आठ साल पुरानी बात है. एक लडकी को एक लड़के से प्यार हो गया और दोनों ने साथ रहने, जीवन साथ बिताने का फैसला लिया. कितनी सुन्दर बात थी. कहानी बदल जाती है अगर हम आपको यह बताएं कि लडकी और लड़का अलग अलग जाति के थे. कुछ लोगों की नज़र में अपने समुदाय द्वारा बनायी गयी चौहद्दी को लांघना प्यार नहीं अपराध था और अपराध की सज़ा दी जाती है. आठ साल बाद वह लड़की अपने गाँव लौटी और उसे दूसरी रात गाँव के मुख्य चौराहे पर अनेक लोगों की मौजूदगी में जला दिया गया. जिन्दा.

लडकी का नाम रमा था, लड़के का प्रकाश. गाँव था डूंगरपुर जिले की आसपुर तहसील का पचलासा छोटा. जलाने वाले थे रमा के अपने राजपूत समुदाय के लोग. तारीख थी 4 मार्च, 2016. रमा की छोटी बेटी नन्ही उसके साथ थी और एक नन्ही जान उसके भीतर भी पल रही थी.

अदालतों में मामला चल रहा है. कुछ लोग नामजद हुए. उनमें से आधे भी गिरफ्तार नहीं हुए. जो गिरफ्तार हुए, उनमें से ज्यादातर आज जमानत पर बाहर हैं. अपराध और सजा से आगे, हमारे लिए, हम सबके लिए ये जानना जरूरी है कि रमा और प्रकाश , क्या बार बार होते रहेंगे ? क्या बार बार ऐसे दीवाने नौजवान युवक युवतियां इस ताकतवर सामुदायिक घेरेबंदी को तोड़ने का दुस्साहस करते रहेंगे ? क्या बार बार इनका यही हश्र होता रहेगा ? क्या यह दुष्चक्र बंद होगा कभी ? क्या कभी यह मध्ययुगीन इन्साफ़ बंद हो पायेगा ? क्या अनेक प्रकाश और रमा इसे बंद करवाने के लिए आगे आकर दिखाएँगे ?

युवा दस्तावेजी फिल्मकार सौरभ कुमार ने इस पूरे परिदृश्य पर एक दस्तावेजी फिल्म बनाने का निश्चय किया और इसका परिणाम है ‘अग्निशिखा’. इस फिल्म के निर्माता हैं उदयपुर फिल्म सोसाइटी और ओपिया फिल्म्स. तो इस तरह इस फिल्म के साथ उदयपुर फिल्म सोसाइटी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी उतर रही है.

14 अक्टूबर को 3.45 – 4.15 बजे तक हम इस निर्माणाधीन फिल्म के चुनींदा अंशों के पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन के गवाह बनेंगे. हमारे साथ फिल्मकार सौरभ और प्रकाश दोनों होंगे.

फिल्म के तत्काल बाद ‘इज्जत’ के नाम पर होने वाले अपराधों पर एक पैनल डिस्कशन रखा गया है. इसमें राजस्थान में इज्जत के नाम पर मार दिए गए युवक युवतियों के परिजन/ जीवन साथी हमारे बीच होंगे.

यदि आप प्रेम और चयन के अधिकार के पक्ष में हैं तो इस  फिल्म और परिचर्चा में जरूर शामिल हों.

  • अग्निशिखा / दस्तावेजी फिल्म, फर्स्ट कट / सौरभ कुमार / हिन्दी / / 3.45-4.15, 14 अक्टूबर
  • ‘रहना नहीं देस बिराना है’ / परिचर्चा / प्रकाश सेवक, देवाशीष मीणा, नारायण कुन्दारा, प्रज्ञा जोशी / 4.15-5.15, 14 अक्टूबर

‘दीक्षा’ : अरुण कौल

भारत के अग्रणी साहित्यकार यू आर अनंतमूर्ति की कथा घटश्राद्ध पर आधारित फिल्म ‘दीक्षा’ इस बार की फिल्म शृंखला में प्रमुख आकर्षण है. ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता पद्मभूषण अनंतमूर्ति ने अपने समग्र लेखन में सामाजिक रुढियों, पाखण्ड, ब्राह्मणवाद और गैर बराबरी के विरुद्ध प्रगतिशील मानवतावादी मूल्यों की स्थापना के लिए रचनात्मक संघर्ष किया. उनके उपन्यास ‘संस्कार’ ‘अवस्था’ आदि भी जाति व्यवस्था की जकडन और बदलते सांस्कृतिक मूल्यों के घर्षण की लोमहर्षक कथा कहते हैं.

यह फिल्म आचार्य उडुपा और उनकी बेटी के बारे में है. कालखंड तीस का दशक है.आचार्य उडुपा%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be अपनी विधवा बेटी को आश्रम की जिम्मेदारी सौंपकर जाते हैं. बेटी एक स्कूल मास्टर के प्रेम में पड जाती है और उसे गर्भ रह जाता है. यह खबर आग की तरह गाँव में फ़ैल जाती है. मास्टर बेटी को छोड़कर भाग जाता है और वह अकेली इस समाज के ताने और बहिष्कार झेलने के लिए रह जाती है. गाँव में आचार्य के विरोधी इस प्रश्न को धरम, मर्यादा आदि के लिए बड़े संकट के रूप में प्रस्तुत करते हैं वहीं एक दलित और एक पूर्व छात्र दृढ़ता से स्त्री के पक्ष में भी सामने आते हैं. पर सब कुछ आचार्य के लौटने और उनके निर्णय पर टिका है. आचार्य क्या करते हैं यह हम आपको नहीं बताएँगे पर इतना जरूर कहेंगे कि यह फिल्म स्त्री के दुःख,पीड़ा और चौतरफा शोषण को दिखाकर यह स्थापित करती है कि धर्म-समाज और पुरुष सभी ने स्त्री की आकांक्षाओं और सवालों की पूर्ण उपेक्षा कर उसे मानव होने के अधिकार से भी वंचित किया है.आचार्य के एक बालक शिष्य की अबोध आँखों से देखी गयी यह फिल्म स्त्री के पक्ष में एक शोकांतिका है.

फिल्म के निर्देशक अरुण कौल भारत के अग्रणी पटकथा लेखक रहे हैं.इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. फिल्म में मनोहर सिंह, राजश्री सावंत, नाना पाटेकर, के के रैना और विजय कश्यप की मुख्य भूमिकाएं हैं.

दीक्षा / फीचर फिल्म/ कथा – यू आर अनंतमूर्ति / निर्देशन – अरुण कौल/ हिंदी/ 11.00 – 1.15 , 16 अक्टूबर