गौरी लंकेश का आख़िरी संपादकीय हिन्दी में

गौरी लंकेश नाम है पत्रिका का। 16 पन्नों की यह पत्रिका हर हफ्ते निकलती है। 15 रुपये कीमत होती है। 13 सितंबर का अंक गौरी लंकेश के लिए आख़िरी साबित हुआ। हमने अपने मित्र की मदद से उनके आख़िरी संपादकीय का हिन्दी में अनुवाद किया है ताकि आपको पता चल सके कि कन्नडा में लिखने वाली इस पत्रकार की लिखावट कैसी थी, उसकी धार कैसी थी। हर अंक में गौरी ‘कंडा हागे’ नाम से कालम लिखती थीं। कंडा हागे का मतलब होता है जैसा मैने देखा। उनका संपादकीय पत्रिका के तीसरे पन्ने पर छपता था। इस बार का संपादकीय फेक न्यूज़ पर था और उसका टाइटल था- फेक न्यूज़ के ज़माने में-
इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज़ बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है। झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज़्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं। झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी। अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी। उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया। फैलाने वाले संघ के लोग थे। ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाज़िट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं। पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं। संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया। ये झूठ इतना ज़ोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है। ये सब झूठ है।
इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा POSTCARD.IN नाम की वेबसाइट पर। यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है। इसका काम हर दिन फ़ेक न्यूज़ बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है। 11 अगस्त को POSTCARD.IN में एक हेडिंग लगाई गई। कर्नाटक में तालिबान सरकार। इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई। संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए। जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज़ रहते हैं उन लोगों ने इस फ़ेक न्यूज़ को अपना हथियार बना लिया। सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बग़ैर सोचे समझे इसे सही मान लिया। अपने कान, नाक और भेजे का इस्तमाल नहीं किया।
पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सज़ा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायर होने लगी। इस ढोंगी बाबा के साथ मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा। इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए। इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाज़ू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई। यह तस्वीर फोटोशाप थी। असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया। शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी।
एक्चुअली, पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था। अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है। पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं।
उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को ख़ूब वायरल हुआ। ध्रुव राठी ने उसका विश्लेषण किया था। ध्रुव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है। पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17 अगस्ता के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया। ( गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे)। ध्रुव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिया’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं। उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी। अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हज़ार नए करदाता जुड़े हैं। तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है।
आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है। मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है। उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं। उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रज़ी टीवी चैनलों ने ख़बर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है। वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30 लाख बढ़ गया। उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं। बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं। संघ का ही काम करते हैं। जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया। जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए। इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे।
आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं। ध्रुव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं। प्रतीक सिन्हा altnews.in नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं। होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है। साथ ही साथ THEWIERE.IN, SCROLL.IN, NEWSLAUNDRY.COM, THEQUINT.COM जैसी वेबसाइट भी सक्रिय हैं। मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई को उजागर किया है। इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं। इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना।
कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में ज़ोरदार बारिश हुई। उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया। कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है। बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है। संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मज़ाक उड़ाना। जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था। लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है।
हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए। एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी। दूसरे फोटो में एक महीला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है। बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया। पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे। दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी। सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं। उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे। फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है। अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है, उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है। प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के ज़रिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी। पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है। पाकिस्तान का है जहां एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है।
इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है। यह सवाप पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई। बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर क़ब्ज़ा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था। मगर फोटोशाप के ज़रिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे। लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया। ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मज़ाक उड़ाया।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक तस्वीर साझा की। लिखा कि भारत 50,000 किलोमीटर रास्तों पर सरकार ने तीस लाख एल ई डी बल्ब लगा दिए हैं। मगर जो तस्वीर उन्होंने लगाई वो फेक निकली। भारत की नहीं, 2009 में जापान की तस्वीर की थी। इसी गोयल ने पहले भी एक ट्वीट किया था कि कोयले की आपूर्ति में सरकार ने 25,900 करोड़ की बचत की है। उस ट्वीट की तस्वीर भी झूठी निकली।
छत्तीसगढ़ के पी डब्ल्यू डी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया। अपनी सरकार की कामयाबी बताई। उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले। बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है।
ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में हमारे कर्नाटक के आर एस एस और बीजेपी लीडर भी कुछ कम नहीं हैं। कर्नाटक के सांसद प्रताप सिम्हा ने एक रिपोर्ट शेयर किया, कहा कि ये टाइम्स आफ इंडिय मे आया है। उसकी हेडलाइन ये थी कि हिन्दू लड़की को मुसलमान ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दुनिया भर को नैतिकता का ज्ञान देने वाले प्रताप सिम्हा ने सच्चाई जानने की ज़रा भी कोशिश नहीं की। किसी भी अखबार ने इस न्यूज को नहीं छापा था बल्कि फोटोशाप के ज़रिए किसी दूसरे न्यूज़ में हेडलाइन लगा दिया गया था और हिन्दू मुस्लिम रंग दिया गया। इसके लिए टाइम्स आफ इंडिया का नाम इस्तमाल किया गया। जब हंगामा हुआ कि ये तो फ़ेक न्यूज़ है तो सांसद ने डिलिट कर दिया मगर माफी नहीं मांगी। सांप्रादायिक झूठ फैलाने पर कोई पछतावा ज़ाहिर नहीं किया।
जैसा कि मेरे दोस्त वासु ने इस बार के कॉलम में लिखा है, मैंने भी एक बिना समझे एक फ़ेक न्यूज़ शेयर कर दिया। पिछले रविवार पटना की अपनी रैली की तस्वीर लालू यादव ने फोटोशाप करके साझा कर दी। थोड़ी देर में दोस्त शशिधर ने बताया कि ये फोटो फर्ज़ी है। नकली है। मैंने तुरंत हटाया और ग़लती भी मानी। यही नहीं फेक और असली तस्वीर दोनों को एक साथ ट्वीट किया। इस गलती के पीछे सांप्रदियाक रूप से भड़काने या प्रोपेगैंडा करने की मंशा नहीं थी। फासिस्टों के ख़िलाफ़ लोग जमा हो रहे थे, इसका संदेश देना ही मेरा मकसद था। फाइनली, जो भी फ़ेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करते हैं, उनको सलाम । मेरी ख़्वाहिश है कि उनकी संख्या और भी ज़्यादा हो।

साभार: क़स्बा ब्लॉग से रविश कुमार

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हिमालयी कस्बे में प्रतिरोध का सिनेमा का एक नया अनुभव

पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) जिले का दशाईथल क़स्बा, जो तकरीबन 1900 मीटर की ऊंचाई पर बसा है, का मौसम और नजारा अति सुन्दर है। जहाँ एक बार जाने के बाद बार-बार जाने का हर किसी का मन करता है। पिथौरागढ़ ही नहीं हल्द्वानी शहर से ऊपर चढ़ाई चढ़ने पर रास्ते में आने वाले भीमताल, भुवाली, अल्मोड़ा और छोटे बड़े हर गांव-कस्बे की अपनी अलग सुंदरता है। रास्ते में मिलने वाले काफल, अल्मोड़ा में सीधे सपाट रेखा में बना लाला बाजार और खीम सिंह मोहन सिंह रौतेला, जोगा साह जैसी मिठाई की दुकानें जो की पिछली पाँच पीढ़ियों से चल रही है, उन पर मिलने वाली कुमाउँनी सिंगोंड़ी और बाल मिठाई भी प्रदेश भर में काफी प्रचलित है। इन सबके बावजूद दशाईथल कस्बे में बना ‘कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय’ आपको अपनी तरफ आकर्षित करता है। इसका कारण यहाँ के बच्चे और उनमें नित-रोज ऊर्जा का संचार करती वहां की हॉस्टल वार्डन रेनू शाह हैं।

दरअसल प्रतिरोध के सिनेमा की दो दिवसीय कार्यशाला के लिए इस विद्यालय को करीब से जानने और समझने का मौका मिला तो पता चला कि यहाँ अधिकतर वे ही बच्चे है जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है और रहने खाने का खर्च एवं अन्य सुविधाओं पर व्यय करने में असमर्थ है। बावजूद इसके यहाँ की हॉस्टल वार्डन (रेनू शाह) ने अन्य विद्यालयों की तुलना में यहाँ बेहतरीन सुविधाएँ उपलब्ध करवाई है। यहाँ के बच्चे पढने लिखने में तो अव्वल है ही बल्कि खेलकूद और गाने-बजाने में भी पीछे नहीं है। विद्यालय का ऑफिस रूम जिसमे विभिन्न प्रतियोगिताओं में जीती ट्राफियां सजी हैं इस बात का गवाह है। यही नहीं यहाँ के बच्चे बिना किसी ट्रेनिंग के अपना ऑर्केस्ट्रा चलाते है जिसमें बॉलीवुड से लेकर राजस्थानी, पंजाबी और पहाड़ी लोक गीत गाते है।

इसी कड़ी में प्रतिरोध के सिनेमा की ओर से यहाँ के बच्चों को ‘सिनेमा और कल्चर’ पर दिया गया एक्सपोज़र देश के अन्य एलिट स्कूल्स में बच्चों को दिए जाने वाले एक्सपोज़र से बेहतरीन था। जिसमें मुख्यधारा के सिनेमा से इतर ऐसा सिनेमा दिखाया जिसकी अपनी अलग ही पहचान है लेकिन तड़क-भड़क और पर्याप्त मार्केटिंग न होने के कारण बहुत कम लोगों तक पहुँचा है। यह पूरी कार्यशाला बच्चों में अच्छा सिनेमा देखने की आदत और सिनेमा की भाषा पर उनकी समझ बनाने पर केंद्रित थी। सीखने सिखाने के लिहाज़ से यह न सिर्फ खास था बल्कि मेरे लिए भी एक नया अनुभव था। इसके अलावा बच्चों को दुनिया की सैर भी करायी गयी।

प्रतिरोध के सिनेमा की एक खासियत यह भी है कि यह सिनेमा को न सिर्फ उसकी कला के पहलू से देखता है बल्कि उसे सामाजिक पहलू से भी जोड़कर देखता है और उस पर बात भी करता है। यही कारण है कि प्रतिरोध के सिनेमा ने उदयपुर के स्थानीय फ़िल्मकार की फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’, नार्मन मेक्लेरन की ‘चेयरी टेल’ और ‘नेबर्स’  और गीतांजलि राव की  ‘प्रिंटेड रेनबो’ से लेकर नागराज मंजुले की ‘फैन्ड्री’ ‘सैराट’, ‘मसान’ सूर्यशंकर दास और आनंद पटवर्धन की फिल्मों तक की विशाल रेंज को अपने फेस्टिवल्स में दर्शकों को दिखाया है।

दूसरी खासियत यह है कि फ़िल्म दिखाने के बाद चर्चा करना. फ़िल्म दिखाना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण फ़िल्म पर चर्चा करना भी है। यहाँ बच्चियों को जब लखनऊ के एन जी ओ सनतकदा द्वारा निर्मित  ‘सबा की कहानी’ फ़िल्म दिखायी गयी तब फ़िल्म के बाद चर्चा में बच्चियां अपनी बात रखते हुए बताती है कि वे भी अपनी कहानी और अपने सपनों को फ़िल्म के माध्यम से बताना चाहती है। आगे जब उनसे उनके सपनों के बारे में पूछा गया तो यह सामने आया की कोई आई पी एस बनना चाहती है, कोई आरटीओ तो कोई सामाजिक कार्यकर्त्ता बनकर समाज में बदलाव लाना चाहती है। इसी तरह किसी की चाह है कि फ़िल्मकार बने तो कोई संगीत के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहती है। मदुरै नगर परिषद में काम करने वाली दलित महिला सफाई कर्मी पर बनी अमुधन आर पी निर्देशित दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘पी’ पर भी बच्चों की प्रतिक्रिया इतनी गंभीर रही कि वे उस महिला और वहां की स्थिति के बारे में और विस्तार से जानना चाह रहे थे।

तीसरा यह सिर्फ सिनेमा ही नहीं बल्कि कला के और रूपों का भी पक्षधर है जिसमें थिएटर, कविता पाठ, गायन, कहानी विधा आदि, इसीलिए बल्ली सिंह चीमा के गीत ‘ले मशालें चल पड़े है’ और अदम गोंडवी और दुष्यंत कुमार की कृतियों से मिश्रित गीत ‘सौ में सत्तर आदमी’ से कार्यशाला के दूसरे दिन की शुरुआत की गयी। जिसको बच्चों ने काफी मजे से सुना और गाया भी, अगली बार कोशिश रहेगी कि नाटक और कहानी विधा पर भी बच्चों को थोड़ा एक्सपोज़र दिया जाये। प्रतिरोध के सिनेमा की एक और खासियत है कि यह निम्नतम संसाधनों से भी अपना काम चला लेता है। जहाँ बच्चों को सिनेमा दिखाया गया वहां न तो स्क्रीन उपलब्ध थी और न ही उपयुक्त स्पीकर्स हॉल भी सिनेमा दिखाने के उद्देश्य से नहीं था, किन्तु काम चलता गया हॉल की दीवार स्क्रीन बनी और प्रोजेक्टर के इन-बिल्ट स्पीकर से काम चलाया गया। मुझे लगता है यही अनुशासन किसी कैंपेन को निरंतर रखने और आगे बढ़ाने में सहायक है।

वर्त्तमान समय में निम्न स्तर के टीवी सीरियल और फिल्मों से इतर प्रतिरोध का सिनेमा एक अनूठा विचार है जो यह कभी नहीं कहता कि यह मत देखिये बल्कि यही कहता है कि यह भी देखिये। आज राष्ट्रवाद के समय में जहाँ हर किसी को अपने देश भक्त होने का प्रमाण देना होता है प्रतिरोध का सिनेमा ‘दि नेबर्स’ और ‘टू सलूशन फॉर वन प्रॉब्लम’ दिखाकर कहेगा कि अपने पड़ौसी से प्यार करिये और कुछ तकरार है तो संवाद के विकल्प को अपनाइये। इसके लिए जरुरी है कि प्रतिरोध का सिनेमा हर जगह पहुंचे। हर जगह पहुँचाने के लिए जरुरी है कि जहाँ भी जाये वहां सिनेमा की एक लाइब्रेरी स्थापित हो जहाँ से आस-पास की जगहों को फ़िल्मों का वितरण किया जा सके। उसको चाहने, देखने और समझने वाले लोग बढ़े जो अपनी स्थानीय जगहों पर इस कारवां को आगे बढ़ाये।

आने वाले समय में दीवार की जगह स्क्रीन हो, अलग से स्पीकर हो इसके लिये प्रतिरोध का सिनेमा हमेशा अपने चाहने वालों से सहयोग की अपेक्षा करता रहेगा।
धर्मराज जोशी

प्रतिरोध का सिनेमा की उदयपुर फिल्म सोसाइटी से जुड़े धर्मराज फ़िलहाल बेंगलुरु में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में मास्टर्स की पढ़ाई कर रहे हैं . उन्होंने फ़िल्म सोसाइटी सक्रियता के अलावा लम्बा समय बच्चों के साथ अध्यापन में भी बिताया है. उनसे joshidharmraj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय दशाईथल, गंगोलीहाट

विद्यालय की बालिकाओं का ऑर्केस्ट्रा

स्क्रीनिंग टाइम…

फ़िल्म के बाद चर्चा की बारी…

ग्रुप फ़ोटो

अब सेल्फ़ी की बारी…

अलविदा साथियों अगली बार फिर मिलेंगे….