हिमालयी कस्बे में प्रतिरोध का सिनेमा का एक नया अनुभव

पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) जिले का दशाईथल क़स्बा, जो तकरीबन 1900 मीटर की ऊंचाई पर बसा है, का मौसम और नजारा अति सुन्दर है। जहाँ एक बार जाने के बाद बार-बार जाने का हर किसी का मन करता है। पिथौरागढ़ ही नहीं हल्द्वानी शहर से ऊपर चढ़ाई चढ़ने पर रास्ते में आने वाले भीमताल, भुवाली, अल्मोड़ा और छोटे बड़े हर गांव-कस्बे की अपनी अलग सुंदरता है। रास्ते में मिलने वाले काफल, अल्मोड़ा में सीधे सपाट रेखा में बना लाला बाजार और खीम सिंह मोहन सिंह रौतेला, जोगा साह जैसी मिठाई की दुकानें जो की पिछली पाँच पीढ़ियों से चल रही है, उन पर मिलने वाली कुमाउँनी सिंगोंड़ी और बाल मिठाई भी प्रदेश भर में काफी प्रचलित है। इन सबके बावजूद दशाईथल कस्बे में बना ‘कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय’ आपको अपनी तरफ आकर्षित करता है। इसका कारण यहाँ के बच्चे और उनमें नित-रोज ऊर्जा का संचार करती वहां की हॉस्टल वार्डन रेनू शाह हैं।

दरअसल प्रतिरोध के सिनेमा की दो दिवसीय कार्यशाला के लिए इस विद्यालय को करीब से जानने और समझने का मौका मिला तो पता चला कि यहाँ अधिकतर वे ही बच्चे है जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है और रहने खाने का खर्च एवं अन्य सुविधाओं पर व्यय करने में असमर्थ है। बावजूद इसके यहाँ की हॉस्टल वार्डन (रेनू शाह) ने अन्य विद्यालयों की तुलना में यहाँ बेहतरीन सुविधाएँ उपलब्ध करवाई है। यहाँ के बच्चे पढने लिखने में तो अव्वल है ही बल्कि खेलकूद और गाने-बजाने में भी पीछे नहीं है। विद्यालय का ऑफिस रूम जिसमे विभिन्न प्रतियोगिताओं में जीती ट्राफियां सजी हैं इस बात का गवाह है। यही नहीं यहाँ के बच्चे बिना किसी ट्रेनिंग के अपना ऑर्केस्ट्रा चलाते है जिसमें बॉलीवुड से लेकर राजस्थानी, पंजाबी और पहाड़ी लोक गीत गाते है।

इसी कड़ी में प्रतिरोध के सिनेमा की ओर से यहाँ के बच्चों को ‘सिनेमा और कल्चर’ पर दिया गया एक्सपोज़र देश के अन्य एलिट स्कूल्स में बच्चों को दिए जाने वाले एक्सपोज़र से बेहतरीन था। जिसमें मुख्यधारा के सिनेमा से इतर ऐसा सिनेमा दिखाया जिसकी अपनी अलग ही पहचान है लेकिन तड़क-भड़क और पर्याप्त मार्केटिंग न होने के कारण बहुत कम लोगों तक पहुँचा है। यह पूरी कार्यशाला बच्चों में अच्छा सिनेमा देखने की आदत और सिनेमा की भाषा पर उनकी समझ बनाने पर केंद्रित थी। सीखने सिखाने के लिहाज़ से यह न सिर्फ खास था बल्कि मेरे लिए भी एक नया अनुभव था। इसके अलावा बच्चों को दुनिया की सैर भी करायी गयी।

प्रतिरोध के सिनेमा की एक खासियत यह भी है कि यह सिनेमा को न सिर्फ उसकी कला के पहलू से देखता है बल्कि उसे सामाजिक पहलू से भी जोड़कर देखता है और उस पर बात भी करता है। यही कारण है कि प्रतिरोध के सिनेमा ने उदयपुर के स्थानीय फ़िल्मकार की फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’, नार्मन मेक्लेरन की ‘चेयरी टेल’ और ‘नेबर्स’  और गीतांजलि राव की  ‘प्रिंटेड रेनबो’ से लेकर नागराज मंजुले की ‘फैन्ड्री’ ‘सैराट’, ‘मसान’ सूर्यशंकर दास और आनंद पटवर्धन की फिल्मों तक की विशाल रेंज को अपने फेस्टिवल्स में दर्शकों को दिखाया है।

दूसरी खासियत यह है कि फ़िल्म दिखाने के बाद चर्चा करना. फ़िल्म दिखाना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण फ़िल्म पर चर्चा करना भी है। यहाँ बच्चियों को जब लखनऊ के एन जी ओ सनतकदा द्वारा निर्मित  ‘सबा की कहानी’ फ़िल्म दिखायी गयी तब फ़िल्म के बाद चर्चा में बच्चियां अपनी बात रखते हुए बताती है कि वे भी अपनी कहानी और अपने सपनों को फ़िल्म के माध्यम से बताना चाहती है। आगे जब उनसे उनके सपनों के बारे में पूछा गया तो यह सामने आया की कोई आई पी एस बनना चाहती है, कोई आरटीओ तो कोई सामाजिक कार्यकर्त्ता बनकर समाज में बदलाव लाना चाहती है। इसी तरह किसी की चाह है कि फ़िल्मकार बने तो कोई संगीत के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहती है। मदुरै नगर परिषद में काम करने वाली दलित महिला सफाई कर्मी पर बनी अमुधन आर पी निर्देशित दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘पी’ पर भी बच्चों की प्रतिक्रिया इतनी गंभीर रही कि वे उस महिला और वहां की स्थिति के बारे में और विस्तार से जानना चाह रहे थे।

तीसरा यह सिर्फ सिनेमा ही नहीं बल्कि कला के और रूपों का भी पक्षधर है जिसमें थिएटर, कविता पाठ, गायन, कहानी विधा आदि, इसीलिए बल्ली सिंह चीमा के गीत ‘ले मशालें चल पड़े है’ और अदम गोंडवी और दुष्यंत कुमार की कृतियों से मिश्रित गीत ‘सौ में सत्तर आदमी’ से कार्यशाला के दूसरे दिन की शुरुआत की गयी। जिसको बच्चों ने काफी मजे से सुना और गाया भी, अगली बार कोशिश रहेगी कि नाटक और कहानी विधा पर भी बच्चों को थोड़ा एक्सपोज़र दिया जाये। प्रतिरोध के सिनेमा की एक और खासियत है कि यह निम्नतम संसाधनों से भी अपना काम चला लेता है। जहाँ बच्चों को सिनेमा दिखाया गया वहां न तो स्क्रीन उपलब्ध थी और न ही उपयुक्त स्पीकर्स हॉल भी सिनेमा दिखाने के उद्देश्य से नहीं था, किन्तु काम चलता गया हॉल की दीवार स्क्रीन बनी और प्रोजेक्टर के इन-बिल्ट स्पीकर से काम चलाया गया। मुझे लगता है यही अनुशासन किसी कैंपेन को निरंतर रखने और आगे बढ़ाने में सहायक है।

वर्त्तमान समय में निम्न स्तर के टीवी सीरियल और फिल्मों से इतर प्रतिरोध का सिनेमा एक अनूठा विचार है जो यह कभी नहीं कहता कि यह मत देखिये बल्कि यही कहता है कि यह भी देखिये। आज राष्ट्रवाद के समय में जहाँ हर किसी को अपने देश भक्त होने का प्रमाण देना होता है प्रतिरोध का सिनेमा ‘दि नेबर्स’ और ‘टू सलूशन फॉर वन प्रॉब्लम’ दिखाकर कहेगा कि अपने पड़ौसी से प्यार करिये और कुछ तकरार है तो संवाद के विकल्प को अपनाइये। इसके लिए जरुरी है कि प्रतिरोध का सिनेमा हर जगह पहुंचे। हर जगह पहुँचाने के लिए जरुरी है कि जहाँ भी जाये वहां सिनेमा की एक लाइब्रेरी स्थापित हो जहाँ से आस-पास की जगहों को फ़िल्मों का वितरण किया जा सके। उसको चाहने, देखने और समझने वाले लोग बढ़े जो अपनी स्थानीय जगहों पर इस कारवां को आगे बढ़ाये।

आने वाले समय में दीवार की जगह स्क्रीन हो, अलग से स्पीकर हो इसके लिये प्रतिरोध का सिनेमा हमेशा अपने चाहने वालों से सहयोग की अपेक्षा करता रहेगा।
धर्मराज जोशी

प्रतिरोध का सिनेमा की उदयपुर फिल्म सोसाइटी से जुड़े धर्मराज फ़िलहाल बेंगलुरु में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में मास्टर्स की पढ़ाई कर रहे हैं . उन्होंने फ़िल्म सोसाइटी सक्रियता के अलावा लम्बा समय बच्चों के साथ अध्यापन में भी बिताया है. उनसे joshidharmraj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय दशाईथल, गंगोलीहाट

विद्यालय की बालिकाओं का ऑर्केस्ट्रा

स्क्रीनिंग टाइम…

फ़िल्म के बाद चर्चा की बारी…

ग्रुप फ़ोटो

अब सेल्फ़ी की बारी…

अलविदा साथियों अगली बार फिर मिलेंगे….