हिमालयी कस्बे में प्रतिरोध का सिनेमा का एक नया अनुभव

पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) जिले का दशाईथल क़स्बा, जो तकरीबन 1900 मीटर की ऊंचाई पर बसा है, का मौसम और नजारा अति सुन्दर है। जहाँ एक बार जाने के बाद बार-बार जाने का हर किसी का मन करता है। पिथौरागढ़ ही नहीं हल्द्वानी शहर से ऊपर चढ़ाई चढ़ने पर रास्ते में आने वाले भीमताल, भुवाली, अल्मोड़ा और छोटे बड़े हर गांव-कस्बे की अपनी अलग सुंदरता है। रास्ते में मिलने वाले काफल, अल्मोड़ा में सीधे सपाट रेखा में बना लाला बाजार और खीम सिंह मोहन सिंह रौतेला, जोगा साह जैसी मिठाई की दुकानें जो की पिछली पाँच पीढ़ियों से चल रही है, उन पर मिलने वाली कुमाउँनी सिंगोंड़ी और बाल मिठाई भी प्रदेश भर में काफी प्रचलित है। इन सबके बावजूद दशाईथल कस्बे में बना ‘कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय’ आपको अपनी तरफ आकर्षित करता है। इसका कारण यहाँ के बच्चे और उनमें नित-रोज ऊर्जा का संचार करती वहां की हॉस्टल वार्डन रेनू शाह हैं।

दरअसल प्रतिरोध के सिनेमा की दो दिवसीय कार्यशाला के लिए इस विद्यालय को करीब से जानने और समझने का मौका मिला तो पता चला कि यहाँ अधिकतर वे ही बच्चे है जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है और रहने खाने का खर्च एवं अन्य सुविधाओं पर व्यय करने में असमर्थ है। बावजूद इसके यहाँ की हॉस्टल वार्डन (रेनू शाह) ने अन्य विद्यालयों की तुलना में यहाँ बेहतरीन सुविधाएँ उपलब्ध करवाई है। यहाँ के बच्चे पढने लिखने में तो अव्वल है ही बल्कि खेलकूद और गाने-बजाने में भी पीछे नहीं है। विद्यालय का ऑफिस रूम जिसमे विभिन्न प्रतियोगिताओं में जीती ट्राफियां सजी हैं इस बात का गवाह है। यही नहीं यहाँ के बच्चे बिना किसी ट्रेनिंग के अपना ऑर्केस्ट्रा चलाते है जिसमें बॉलीवुड से लेकर राजस्थानी, पंजाबी और पहाड़ी लोक गीत गाते है।

इसी कड़ी में प्रतिरोध के सिनेमा की ओर से यहाँ के बच्चों को ‘सिनेमा और कल्चर’ पर दिया गया एक्सपोज़र देश के अन्य एलिट स्कूल्स में बच्चों को दिए जाने वाले एक्सपोज़र से बेहतरीन था। जिसमें मुख्यधारा के सिनेमा से इतर ऐसा सिनेमा दिखाया जिसकी अपनी अलग ही पहचान है लेकिन तड़क-भड़क और पर्याप्त मार्केटिंग न होने के कारण बहुत कम लोगों तक पहुँचा है। यह पूरी कार्यशाला बच्चों में अच्छा सिनेमा देखने की आदत और सिनेमा की भाषा पर उनकी समझ बनाने पर केंद्रित थी। सीखने सिखाने के लिहाज़ से यह न सिर्फ खास था बल्कि मेरे लिए भी एक नया अनुभव था। इसके अलावा बच्चों को दुनिया की सैर भी करायी गयी।

प्रतिरोध के सिनेमा की एक खासियत यह भी है कि यह सिनेमा को न सिर्फ उसकी कला के पहलू से देखता है बल्कि उसे सामाजिक पहलू से भी जोड़कर देखता है और उस पर बात भी करता है। यही कारण है कि प्रतिरोध के सिनेमा ने उदयपुर के स्थानीय फ़िल्मकार की फ़िल्म ‘कंचे और पोस्टकार्ड’, नार्मन मेक्लेरन की ‘चेयरी टेल’ और ‘नेबर्स’  और गीतांजलि राव की  ‘प्रिंटेड रेनबो’ से लेकर नागराज मंजुले की ‘फैन्ड्री’ ‘सैराट’, ‘मसान’ सूर्यशंकर दास और आनंद पटवर्धन की फिल्मों तक की विशाल रेंज को अपने फेस्टिवल्स में दर्शकों को दिखाया है।

दूसरी खासियत यह है कि फ़िल्म दिखाने के बाद चर्चा करना. फ़िल्म दिखाना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण फ़िल्म पर चर्चा करना भी है। यहाँ बच्चियों को जब लखनऊ के एन जी ओ सनतकदा द्वारा निर्मित  ‘सबा की कहानी’ फ़िल्म दिखायी गयी तब फ़िल्म के बाद चर्चा में बच्चियां अपनी बात रखते हुए बताती है कि वे भी अपनी कहानी और अपने सपनों को फ़िल्म के माध्यम से बताना चाहती है। आगे जब उनसे उनके सपनों के बारे में पूछा गया तो यह सामने आया की कोई आई पी एस बनना चाहती है, कोई आरटीओ तो कोई सामाजिक कार्यकर्त्ता बनकर समाज में बदलाव लाना चाहती है। इसी तरह किसी की चाह है कि फ़िल्मकार बने तो कोई संगीत के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहती है। मदुरै नगर परिषद में काम करने वाली दलित महिला सफाई कर्मी पर बनी अमुधन आर पी निर्देशित दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘पी’ पर भी बच्चों की प्रतिक्रिया इतनी गंभीर रही कि वे उस महिला और वहां की स्थिति के बारे में और विस्तार से जानना चाह रहे थे।

तीसरा यह सिर्फ सिनेमा ही नहीं बल्कि कला के और रूपों का भी पक्षधर है जिसमें थिएटर, कविता पाठ, गायन, कहानी विधा आदि, इसीलिए बल्ली सिंह चीमा के गीत ‘ले मशालें चल पड़े है’ और अदम गोंडवी और दुष्यंत कुमार की कृतियों से मिश्रित गीत ‘सौ में सत्तर आदमी’ से कार्यशाला के दूसरे दिन की शुरुआत की गयी। जिसको बच्चों ने काफी मजे से सुना और गाया भी, अगली बार कोशिश रहेगी कि नाटक और कहानी विधा पर भी बच्चों को थोड़ा एक्सपोज़र दिया जाये। प्रतिरोध के सिनेमा की एक और खासियत है कि यह निम्नतम संसाधनों से भी अपना काम चला लेता है। जहाँ बच्चों को सिनेमा दिखाया गया वहां न तो स्क्रीन उपलब्ध थी और न ही उपयुक्त स्पीकर्स हॉल भी सिनेमा दिखाने के उद्देश्य से नहीं था, किन्तु काम चलता गया हॉल की दीवार स्क्रीन बनी और प्रोजेक्टर के इन-बिल्ट स्पीकर से काम चलाया गया। मुझे लगता है यही अनुशासन किसी कैंपेन को निरंतर रखने और आगे बढ़ाने में सहायक है।

वर्त्तमान समय में निम्न स्तर के टीवी सीरियल और फिल्मों से इतर प्रतिरोध का सिनेमा एक अनूठा विचार है जो यह कभी नहीं कहता कि यह मत देखिये बल्कि यही कहता है कि यह भी देखिये। आज राष्ट्रवाद के समय में जहाँ हर किसी को अपने देश भक्त होने का प्रमाण देना होता है प्रतिरोध का सिनेमा ‘दि नेबर्स’ और ‘टू सलूशन फॉर वन प्रॉब्लम’ दिखाकर कहेगा कि अपने पड़ौसी से प्यार करिये और कुछ तकरार है तो संवाद के विकल्प को अपनाइये। इसके लिए जरुरी है कि प्रतिरोध का सिनेमा हर जगह पहुंचे। हर जगह पहुँचाने के लिए जरुरी है कि जहाँ भी जाये वहां सिनेमा की एक लाइब्रेरी स्थापित हो जहाँ से आस-पास की जगहों को फ़िल्मों का वितरण किया जा सके। उसको चाहने, देखने और समझने वाले लोग बढ़े जो अपनी स्थानीय जगहों पर इस कारवां को आगे बढ़ाये।

आने वाले समय में दीवार की जगह स्क्रीन हो, अलग से स्पीकर हो इसके लिये प्रतिरोध का सिनेमा हमेशा अपने चाहने वालों से सहयोग की अपेक्षा करता रहेगा।
धर्मराज जोशी

प्रतिरोध का सिनेमा की उदयपुर फिल्म सोसाइटी से जुड़े धर्मराज फ़िलहाल बेंगलुरु में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में मास्टर्स की पढ़ाई कर रहे हैं . उन्होंने फ़िल्म सोसाइटी सक्रियता के अलावा लम्बा समय बच्चों के साथ अध्यापन में भी बिताया है. उनसे joshidharmraj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय दशाईथल, गंगोलीहाट

विद्यालय की बालिकाओं का ऑर्केस्ट्रा

स्क्रीनिंग टाइम…

फ़िल्म के बाद चर्चा की बारी…

ग्रुप फ़ोटो

अब सेल्फ़ी की बारी…

अलविदा साथियों अगली बार फिर मिलेंगे….

अब फ़िल्म महोत्सव विद्या भवन ऑडिटोरियम में होगा

The Fourth Udaipur Film Festival, organised by Udaipur Film Society and the Cinema of Resistance campaign has been threatened and its venue forcibly shifted (by getting the original venue cancelled) on behest of, who else but, the ABVP. The 4th UFF has been conceived on the theme of “Voices from the Dalit resistance”, and features films that highlight Dalit student suicides, the Una movement, the expose of the Kairana “Hindu exodus”, fictions like Sairat, Anhey Ghorhey da Daan, and new documentaries on Dalit resistance like “Flames of Freedom: The Ichchapur Declaration”. The Sangh is afraid of precisely these films as is evident from the content and language of their letter forcing the administration to cancel the pre-assigned venue on the eve of the festival.

Please read the full PRESS RELEASE and spread the word and stand in solidarity with the committed team of Udaipur Film Society and the Pratirodh ka Cinema campaign who are determined not to buckle under pressure and go ahead with the full festival at an alternative venue.

साथियों, अधिकतम प्रसार की अपील के साथ यह प्रेस विज्ञप्ति प्रेषित है हमारा फेस्टिवल ‘दलित प्रतिरोध के उभरते स्वर’ पर केन्द्रित है. जाहिर है यह विषय सत्ता में बैठे लोगो को नहीं पचा साथ ही अटेचमेंट में संलग्न एबीवीपी की प्रेस विज्ञप्ति की भाषा भी देखिये :

प्रेस विज्ञप्ति

कल 14 अक्तूबर से शुरू होने वाले चौथे उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल को फेस्टिवल शुरू होने से ठीक एक दिन पहले की शाम को संघ और प्रसाशन ने दबाव बनाकर रुकवाने की भरपूर कोशिश की. फिल्मोत्सव के आयोजकों को पुलिस प्रसाशन द्वारा बुलाकर देर रात तक लम्बी बैठक की गयी. प्रशासन से बैठक का कारण यह था कि राजकीय कृषि महाविद्यालय का ऑडिटोरियम जो कि फ़िल्म महोत्सव करने का स्थल था यूनिवर्सिटी द्वारा रद्द कर दिया गया और इसका कारण यह बताया गया कि प्रशासन से कार्यक्रम की पूर्वानुमति नहीं ली गयी थी. ज्ञातव्य है कि उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी पिछले चार साल से यह फ़िल्म फेस्टिवल कर रही है, न तो पिछले तीन फिल्मोत्सवों में कोई पूर्वानुमति ली गयी और न ही किसी भी सांस्कृतिक आयोजन में कभी भी ऐसी किसी अनुमति की जरुरत होती है.

दरअसल अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के द्वारा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति को ज्ञापन सौंपा गया था. जिसमे फ़िल्म महोत्सव को आग भड़काने और बाबा साहेब आंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाला बताया गया. कुलपति ने दबाव में आकर विश्विद्यालय सभागार में कार्यक्रम को निरस्त कर दिया जबकि इसकी पूर्व लिखित अनुमति सोसाइटी ने पहले ही ले ली थी एवं निर्धारित शुल्क 24,450 रूपये भी जमा करा दिए थे.

विश्वविधालय द्वारा अनुमति निरस्त किए जाने के बाद सोसाइटी को आनन-फानन में नया कार्यक्रम स्थल चुनना पड़ा. अब यह फ़िल्म महोत्सव विद्या भवन ऑडिटोरियम में होगा. पूरा कार्यक्रम तीनो दिन यथावत वैसे ही रहेगा.

इस ख़बर के साथ एबीवीपी की प्रेस विज्ञप्ति और कृषि महाविद्यालय के डीन के द्वारा दिया गया निरस्तगी का पत्र संलग्न है. विद्यार्थी परिषद् की प्रेस विज्ञप्ति में रोहित वेमुला, गुजरात के ऊना मामले और कैराना जैसे विषयों पर फ़िल्म प्रदर्शन और बहस को धर्म एवं जाति पर लड़वाने वाला विषय बताया गया और यह सब मामले छात्रों को बरगलाने की साजिश बताये गये हैं. फेस्टिवल के आयोजकों द्वारा कहा गया कि जातिगत शोषण के सभी मुद्दों पर बात एवं बहस करके ही जतिमुक्त समाज की दिशा में बढ़ा जा सकता है. इन सभी मुद्दों पर बात करके एवं जातिगत भेदभाव एवं अन्याय का कड़ा विरोध करके ही हम एक समतामूलक समाज की दिशा में आगे बढ़ सकते है. अतः इन विषयों पर चुप्पी नहीं बल्कि बात करना ही जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है. पुलिस प्रशासन द्वारा जिन फिल्मों पर आपति एवं सवाल उठाये गये उनके बारें में सोसाइटी का कहना है कि वह सभी फ़िल्में देश के प्रतिष्ठित निर्माताओं और निर्देशकों द्वारा बनाई गयी है. जिन्हें देश विदेश में पर्याप्त प्रशंसा भी मिली है.

लोग जुड़ते गए कारवां बढ़ता गया…

कुमार सुधीन्द्र पहले फिल्मोत्सव से ही उदयपुर फिल्म सोसाइटी के सक्रिय सदस्य हैं. उन्हें उदयपुर फिल्म सोसाइटी के आधार स्तंभों में से एक कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी. इस बार के बैनर-पोस्टर-बैजेस सभी कुछ उन्हीं के डिजाइन किये हुए हैं. वे संक्षिप्त अवधि के लिए ‘उदयपुर फिल्म सोसाइटी’ के संयोजक भी रहे हैं.

सुधीन्द्र ने अपने और सोसाइटी के चार साला सफ़र पर यह लेख लिखा है. इसमें हम उनकी प्रतिबद्धता और सरोकारों की झलक भी पा सकते हैं और टीम की एकजूटता  का रोमांच भी महसूस कर सकते हैं.

प्रस्तुत है लेख :

 

साल 2013 मेंसितंबर14 और 15 को जब ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के पहले उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल का आगाज़ हुआ उससे पहले इस मुहीम के तहत देशभर में 40 से अधिक फ़िल्म फ़ेस्टिवल हो चुके थे। उदयपुर में इसकी शुरुआत के पीछे यहाँ के जनवादी प्रगतिशील बुद्धिजीवियों और युवाओं का लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति ज़िम्मेदारी का भाव रहा है कि जब देश और दुनिया में आमजन से जुड़े सरोकार के मुद्दों पर संवाद उभरकर सामने नहीं आ रहा है तब क्यों ना सिनेमा के जरिये यह पहल की जाये।जिसमें सरोकारी सिनेमा, नाटक, क़िस्सागोई, पोस्टर-पेंटिंग, गीत, कविता आदि सभी माध्यमों के जरिये आमजन जिसमें खासतौर से हाशिये के लोगों के सवालों को मुख्यधारा के समाज के सामने लाया जाये और इसके लिए वैकल्पिक रास्ते सुझाये जाएँ।

1291376_540402929372731_97138084_oइसी विचार केआधार पर हुए हुए पहले उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के सफल आयोजन में देश-दुनिया का सिनेमा देखा और दिखाया गया। यह फ़ेस्टिवल ख्यातनाम फ़िल्म अभिनेता बलराज साहनी को समर्पित था जिसमें उनकी फ़िल्म ‘गरमहवा’ दिखाई गई। जैसा कि इस पहल के पीछे का मकसद आमजन से जुड़े मुद्दों पर संवाद स्थापित करना था, तो इस पहले फ़िल्म फ़ेस्टिवल से ही संवाद की यह प्रक्रिया शुरू हो गई। हर फ़िल्म के प्रदर्शन के बाद उस पर दर्शकों के साथ फ़िल्मकार और निर्देशक के बीच संवाद रखा गया जिससे स्थानीय लोगों को दिखाई गई फ़िल्म की पॉलिटिक्स और उसके दर्शन के बारे में समझना आसान हुआ। पहले फ़ेस्टिवल में मशहूर दस्तावेज़ी फ़िल्मकार आनंदपटवर्धन उनकी दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘जयभीमकॉमरेड’ की स्क्रीनिंग में मौजूद रहे और उनके साथ हुआ दर्शकों का ज्वलंत संवाद आज भी हमारे मानसपटल पर दर्ज़ है। इस दो दिवसीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल से शुरुआत के बाद दूसरा उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल तीन दिन का रखा गया जो साल 2014 मेंसितंबर 5-7 को किया गया। इसकी खास बात यह थी कि इसमें हमने उदयपुर के स्थानीय फ़िल्मकारों को जगह देने के साथ-साथ राजस्थानी सिनेमा को भी देखा और दिखाया। इसमें पति-पत्नी के रिश्तों की विभिन्न परतों को सामने लाती राजस्थानी फ़िल्म ‘भोभर’ प्रमुख थी। इस दौरान इसके लेखक रामकुमार सिंह के साथ संवाद भी हुआ जो कि उल्लेखनीय है। इनके साथ चैतन्य तम्हाणे मराठी फ़िल्म ‘फँड्री’,नकुल सिंह साहनी अपनी दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘इज्जतनगर की असभ्य बेटियां’ और मोहम्मद गनी अपनी फ़िल्म ‘क़ैद’ के साथ हमारे कारवां में सहभागी बने। यह फ़ेस्टिवल चित्रकार ज़ैनुल आबेदिन,  फ़िल्मकार ख़्वाजा अब्बास अहमद, ज़ोहरा सहगल और नबारुण भट्टाचार्य को समर्पित था।

दूसरे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के बाद हम साल 2015 में तीसरे फ़िल्म फ़ेस्टिवल के आयोजन की ओर बढ़े। इससे पूर्व हमने मासिक फ़िल्म प्रदर्शन की प्रक्रिया को जारी रखा। इससे हमें छोटी-छोटी कोशिशों में नए साथियों तक पहुंचे। पूर्व के दोनों फ़ेस्टिवल के अनुभवों से सीखते हुए हम लोगों ने तीसरे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल से पहले कई मासिक फ़िल्म स्क्रीनिंग की। स्कूलों और कॉलेजों तक हमारी पहुँच रही। स्कूलों में की गई फ़िल्म स्क्रीनिंग को हमने ‘बालरंग’ नाम से एक खास पहचान दी और सलूम्बर ब्लॉक में अपनी पहुँच बनाते हुए ‘मोबाइल / टूर फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ किया। इसी तरह उदयपुर के बाहर राजसमंद जिले के नाथद्वारा ब्लॉक में भी फ़िल्म स्क्रीनिंग के जरिये ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ ने आम लोगों के बीच अपनी जगह बनाई। उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी के पूर्व संयोजक शैलेंद्र बताते है कि जावरमाइंस और कुंवारिया कस्बे के स्कूलों में भी स्क्रीनिंग की गई। शहर के मोहल्लों में बच्चों का फ़िल्म क्लब बनाया गया-  सतरंगी चिल्ड्रन फ़िल्म क्लब।

इन सारी प्रकियाओं से गुजरते हुए हम तीसरे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के करीब पहुंचे। दिन थे 25-26-27 सितंबर, साल 2015। यहाँ तक पहुँचते हुए हम अपनी सिनेमाई समझ और काम का दायरा बढ़ा चुके थे। इस कारवां में मिले कई साथी अब स्कूल-कॉलेज की स्क्रीनिंग नियमित सँभालने लगे हैं और कुछ साथी फ़िल्म सोसाइटी की मासिक स्क्रीनिंग। कुछ साथियों ने बालरंग की स्क्रीनिंग का ज़िम्मा उठाया हुआ है तो कुछ साथी इसमें नवाचार करने की कोशिशों में लगे हुए हैं। अपने जूनून और जज़्बे के चलते हमारे साथियों ने चित्तौड़गढ़, सलूम्बर, नाथद्वारा, जयपुर और जमशेदपुर में फ़िल्म सोसाइटी शुरू कर ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ का विस्तार किया। यहाँ खास बात यह है कि 26 सितंबर 2015 को लंदन (यू.के.) में भी इस सिनेमा का एक और चैप्टर शुरू हुआ।

तीसरे फ़िल्म फ़ेस्टिवल में तीन बातें सबसे प्रमुख रही, पहली इस फ़ेस्टिवल के जरिये उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी से जुड़े युवा साथी कुमार गौरव ने जमशेदपुर दंगे पर बनी अपनी पहली दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘कर्फ़्यू’ दिखाई।

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तीसरे फेस्टिवल में पोस्टर

दूसरी बात यह कि इस आयोजन में हमारे साथ थिएटर टीम ‘आगाज़’ भी जुड़ी। इसने इस्मत चुगताई की कहानियों पर आधारित नाटक का मंचन किया और संवादधर्मिता को बढ़ाया। और यहाँ तीसरी उल्लेखनीय बात यह थी कि तीसरे फ़िल्म फ़ेस्टिवल तक आते-आते हमारे साथियों ने पोस्टर विधा को भी ऊंचाई प्रदान की। सिनेमा, नाटक और पोस्टर विधा के इस खूबसूरत संयोजन का सबसे बेहतर उदाहरण है, उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी।

हमारा तीसरा फ़िल्म फ़ेस्टिवल इस मायने में भी उल्लेखनीय है कि इसमें हमने सिनेमा पर संवाद के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुभव को भी सुना और उनसे संवाद किया। हमने जाना कि कैसे जमीनी सच्चाइयों को छुपाकर देश का मीडिया और राज्य पूंजीपतियों और सामंती लोगों के साथ गठजोड़ स्थापित किये हुए है। यहाँ पर हमारा मज़बूत हस्तक्षेप यह रहा कि जमीनी संघर्षों को ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के जरिये उन लोगों तक ले गए जो बाजारवादी संस्कृति के दौर में देश की कई सच्चाइयों से रूबरू नहीं हो पाए थे। इस प्रक्रिया में हमारी नई पीढ़ी एक तरफ मुज़फ्फरनगर के दंगों की वास्तविकता जानकर भौंचक थी तो दूसरी ओर कश्मीर की ‘हाफविडो’ कही जाने वाली महिलाओं की दास्तान जानकर ग़मगीन थी। यहाँ फ़िल्मकार नकुल सिंह साहनी और इफ्फ़त फ़ातिमा से हुआ संवाद हमारे लिए ऐतिहासिक रहा। यह फ़ेस्टिवल FTII के विद्यार्थी संघर्ष के समर्थन मेंऔर एम.एम. कलबुर्गी, गोविन्द पानसरे, इस्मत चुग़ताई, भीष्म साहनी और चित्तप्रसाद की स्मृति को समर्पित था।

और अब हम पहुँच चुके हैं चौथे उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल के करीब।यह कई मामलों में महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय आयोजन होने वाला है।इसकी प्रासंगिकता गुजरात में हुए दलित आंदोलन और हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में सांस्थानिक हत्या के शिकार हुए अम्बेडकरवादी एक्टिविस्ट और रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला और महिला शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय नोखा, बीकानेर में वहां के शिक्षक और संस्थान की मिलीभगत से मारी गई शिक्षक प्रशिक्षु डेल्टा मेघवाल के न्याय के लिए समर्थन से देखी जा सकती है।यह चौथा उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल अब्बास कैरोस्तामी, महाश्वेता देवी, गुरदयाल सिंह और सुलभा देशपांडे की यादों को समर्पित होगा।इस फ़ेस्टिवल में खासतौर से देश में उभरते दलित प्रतिरोध और ऑनर किलिंग्स के दो प्रमुख मुद्दों पर परिचर्चा होगी जिसमें दलित आंदोलन का हिस्सा रहे कुछ एक्टिविस्ट सहभागी रहेंगे।

हमारी अब तक की सिनेमाई प्रतिरोध की यात्रा में युवा साथी प्रमुख भूमिकाओं में सामने आये हैं।चाहे आमजन के बीच फ़िल्म स्क्रीनिंग का मामला हो या पोस्टर बनाकर उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी के आयोजन और सामाजिक मुद्दों को लोगों के सामने रखने का  या वार्षिक फ़िल्म उत्सव का आयोजन, यहाँ युवा साथियों का जज़्बा और ‘साथी कल्चर’ देखने लायक है।टीम के सभी युवा साथियों के पास ज़िम्मेदारी है, कुछ साथी फ़ेस्टिवल के लिए चंदा जुटाने में लगे हुए हैं तो कुछ नित-नए पोस्टर बनाकर सोशल मीडिया और फोटो-ब्लॉग के जरिये फ़ेस्टिवल के प्रमोशन का काम कर रहे हैं तो कुछ साथी व्यवस्था संबंधी अन्य जिम्मेदारियों को पूरा कर रहे हैं।स्मारिका, ब्रोशर, पोस्टर, ऑडिटोरियम, जनसंपर्क आदि काम अपनी गति ले रहे हैं, यह सब संपादित करना युवा साथियों की एक टीम के बिना आसान नहीं होता।इस काम में फ़िल्म सोसाइटी से जुड़े उदयपुर के वरिष्ठ साथियों का सहयोग और मार्गदर्शन भी प्रमुख भूमिका निभाता है।

प्रतिरोध की संस्कृति की पैरवी करते हुए हम लोग इस बात में यकीन करते हैं कि उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी अपने यहाँ सभी को अपनी बात रखने, सहमति-असहमति जाहिर करने के अधिकार को साथ लेते हुए अपना काम करती है।यहाँ कोई असहमति रखता है तब वह अपने तर्कों, तथ्यों और सन्दर्भों के साथ उसका प्रतिपक्ष भी खड़ा करता है।यहाँ एक बार कहना बेहद जरुरी हो जाता है कि बात कहने के साथ-साथ हम सामने वाले व्यक्ति को पहले सुनना भी जरुरी समझते हैं।इसी वजह से फ़िल्म सोसाइटी इन दिनों अपने ‘साथी कल्चर’ की मिसाल देती है कि हम विभिन्न विधाओं से जुड़े लोग एक साथ रहते हुए एक-दूजे से सीखकर अपना कारवां आगे बढ़ा रहे हैं।यह ‘सेल्फ इंस्पिरेशन’ की भी बात है।

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‘प्रतिरोध के सिनेमा’ का राष्ट्रीय अधिवेशन

इस महत्वपूर्ण मूल्य का ज़िक्र किये बिना हमारी बात अधूरी ही कही जाएगी कि तमाम मुश्किल हालात के बावजूद’ प्रतिरोध का सिनेमा’ के तहत चलने वाले इस कारवां के लिए हम लोग किसी भी तरह से कॉर्पोरेट, NGO या किसी अन्य तरह की एजेंसी से कोई स्पांसरशिप नहीं लेते हैं।’नॉन-स्पांसरशिप’ के इस मॉडल का इस मुहीम से जुड़े सभी साथी अनुसरण करते हैं।

उदयपुर फ़िल्म सोसाइटी अब तक के अपने कार्य-अनुभव से अपना पक्ष स्पष्ट कर चुका है कि देश में वर्चस्ववादी ताकतें चाहे किसी भी रूप में विद्यमान हो, चाहे वह राजनीतिक सत्ता के रूप में हो या चाहे सामाजिक सत्ता के रूप में, यह उन तमाम ब्राह्मणवादी, सामंतवादी, पूंजीवादी, धार्मिक कट्टरपंथ और फ़ासीवाद के विरुद्ध अपना पक्ष मज़बूत रखता है और समाज के हाशिये पर धकेल दिए गए समुदायों के लोकतान्त्रिक और मानवीय हक़ों की पैरवी प्राथमिकता से करता है।हम समझते हैं कि समाज में बराबरी, न्याय और बंधुत्व की भावना के बिना असमानता और भेदभाव परक  व्यवस्था ख़त्म नहीं हो सकती है, इसलिए बेहद जरुरी है कि लोगों के बीच आपसी संवाद का रास्ता हमेशा खुला रहे।लोकतान्त्रिक तरीके से हुए संवाद से आपसी समझ बढ़ने के साथ-साथ प्रतिरोध की संस्कृति का यह कारवां भी समाज के अंतिम व्यक्ति तक अपनी पहुँच बढ़ा पायेगा और इससे वैकल्पिक रास्ते भी खुलेंगे।

Sudhindra, the Designer at work at the First Udaipur Film Festival

कुमार सुधीन्द्र

इस बात के आखिर में हम गुजरात के दलित आंदोलन से निकली इन बातों को दोहराकर अपना पक्ष स्पष्ट करते हैं कि, गाय की पूँछ तुम रखो,हमें हमारी जमीन दो!”और गाय अगर आपकी माता है तब उसका अंतिम सँस्कार भी खुद करो !

फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम: इच्छापुर का उद्घोष

इस बार हमारे फिल्मोत्सव को तीन फिल्मों का प्रीमियर करने का मौका हासिल हुआ है. ‘फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम’ उनमें से एक है. ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी का इस महत्त्वपूर्ण दस्तावेजी फिल्म पर लेख प्रस्तुत है. यह लेख  साप्ताहिक  ‘समय की चर्चा’ में सबसे पहले प्रकाशित हुआ था.

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भारतीय दस्तावेज़ी  सिनेमा की यह खासियत है कि यह नई से नई घटनाओं और प्रवृति  को कैद करने और प्रस्तुत करने के लिए तत्पर रहता है. ऐसा इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि एक तो दस्तावेज़ी सिनेमा बाजारू होने से अपने को बचा सका है दूसरे सामाजिक –राजनीतिक आन्दोलनों में शामिल कार्यकर्ताओं के पास तकनीक के सुलभ और सस्ते होने की वजह से किसी घटना या प्रवृत्ति को अब किसी फ़िल्म के माध्यम से पेश करना असंभव नहीं. ऐसी ही कुछ कहानी एकदम नई दस्तावेज़ी फ़िल्म फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम की है जिसे दिल्ली में रह रहे सामाजिक कार्यकर्ता और फ़िल्मकार सुब्रत कुमार साहू ने बनाया है. सुब्रत पिछले 2 दशकों से उड़ीसा के सामाजिक –राजनीतिक आन्दोलनों से गहरे जुड़े हैं और इससे पहले भी वे म्लेच्छ संहार : इण्डिया’स कल्कि प्रोजक्ट, डैमेजड और आई सिंग देअरफोर आई एम नाम सेमहत्वपूर्ण दस्तावेज़ी फ़िल्में बना चुके हैं. यह फ़िल्म दक्षिणी पश्चिमी उड़ीषा के कालाहांडी जिले के एक छोटे गावं इच्छापुर में आ रहे महत्वपूर्ण बदलावों की सूचना देती है जिसकी घटनाओं को हाल में घटे गुजरात के दलित आन्दोलन के साथ जोड़ने पर धुर पूरब से लेकर पश्चिम तक एक बड़ा सामाजिक –राजनीतिक वृत्त बनता दिखाई देता है.

बाहरी तौर पर हरा भरा और शांत दिखता इच्छापुर पिछले साल से अशांत है जबसे आदिवासियों की स्थानीय देवी डोकरी को इच्छापुर के ब्राहमणों द्वारा अपनी तरह से अपनाने और उन्हें फिर आदिवासियों के लिए ही वंचित कर देने का षड्यंत्र रचा जा रहा है. यह नई तकनीक के सर्वसुलभ और सस्ते होने की खासियत है कि फ़िल्मकार द्वारा इस षड्यंत्र पर चिंता करने से पहले ही स्थानीय लोगों ने सस्ते कैमरे से अपनी लड़ाई के शुरुआती दृश्यों को रिकार्ड कर लिया और सहेज कर रखा हुआ था जिस वजह से इस फ़िल्म में हम आन्दोलन और इस षड्यंत्र की निरंतरता को देख पाते हैं.

यह आन्दोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण बनता दिखाई दे रहा है क्योंकि यह अस्मिता के सवाल से आगे बढ़कर जमीन के सवाल से अपने आपको जोड़ता हुआ दिखता है. यह इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इस आन्दोलन में दलितों के साथ आदिवासीऔर ओबीसी भी कंधे से कन्धा मिलाकर लड़ाई लड़ रहे हैं. फ़िल्म का बड़ा हिस्सा वंचितों के साथ इच्छापुर की अलग –अलग लोकेशनों में घूमता है जिनके नामों से पता चलता है कि ये सारी जगहें तो वहां के 90% प्रतिशत मूल आदिवासियों की थी न कि बहुत बाद में आये 5 से 10 फीसद ब्राहमणों की.

सुब्रत पूरे धैर्य और मेहनत के साथ पिछले एक साल से इस आन्दोलन को दर्ज करने की कोशिश करते रहे हैं और अब ये पूरा आन्दोलन हमारे सामने हैं. इसी फ़िल्म से पता चलता है कि इच्छापुर के लोगों ने अपने शोषकों के खिलाफ़ आखिरी लड़ाई का हल्ला बोल दिया है. गुजरात के दलितों की तरह उन्होंने भी सवर्णों का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया और वे अपनी खोयी हुई जमीन को वापिस हासिल करने की निर्णायक लड़ाई में जुटे हैं.

अभी इस दस्तावेज़ी फ़िल्मके सारे इंटरव्यू और कमेंटरी उड़िया में हैं जिनका अंग्रेजी में सब टाइटल साथ –साथ चलता है. जैसे ही इस फ़िल्म का हिंदी संस्करण तैयार होकर नए फ़िल्मफेस्टिवलों और अनौपचारिक स्क्रीनिंगों के जरिये समूचे भारत के दर्शकों तक पहुंचेगा तब इस आन्दोलन का नाता समूचे दलित आन्दोलन से जुड़कर दस्तावेज़ी सिनेमा और नए कैमरा की सार्थकता को सिद्ध करता दिखाई देगा .

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  • फ्लेम्स ऑफ़ फ्रीडम / दस्तावेजी फिल्म / निर्देशक सुब्रत कुमार साहू / 77 मिनिट / 3.55-5.10, 15 अक्टूबर
  •  निर्देशक सुब्रत कुमार साहू के साथ गुफ़्तगू / 5.10-5.30, 15 अक्टूबर

कचरा व्यूह

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प्रतिदिन मात्र मेट्रो शहरों में 1,88,500 (2012)टन घन कचरा तैयार करने वाले हमारे देश में पिछले गांधी जयंती  से स्वच्छ भारत का नारा मीडिया में गूंज रहा है.उस कचरे में से 83% इकठ्ठा किया जाता है और फिर उस में मात्र 29% कचरे का निस्तारण किसी प्रक्रिया से किया जाता है, बाकी बचे कचरे के अंबार हमारे शहरों के बाहर पहाड़ की तरह खड़े हो रहे हैं.इस कचरे को साफ़ करने वाले सफ़ाई कर्मचारियोंमें से प्रति वर्ष 22, 327 कर्मचारी अपनी जान गवाते हैं.ऐसे में प्रसिद्ध रंगकर्मी अतुल पेठे द्वारा 2007 में बनी फ़िल्म कचरा व्यूह को देखकरमन में सवाल पैदा होता है कि सफाई कर्मचारियों और कचरा बीनने वालों की नरकयातानाओं की बुनियाद पर भारत स्वच्छ कैसेहो सकता है ?

स्वच्छ भारत अभियान को एक वर्ष होने से ठीक पहले वाइब्रेंट गुजरात में सफाई कामदारों की हड़ताल हुई. सरकार की तरफ से सफ़ाई कर्मचारियों की मांगों की अनदेखी की गयी. हड़तालियों को जेल में डाला गया. जनवरी में यही हाल दिल्ली में भी देखा गया और हमारे अपने शहर उदयपुर में भी जहाँ भी अधिकतर सफ़ाई कर्मचारीअस्थाई मजदूर के रूप में कार्यरत हैं. वे अपने स्थायित्व, वेतनमान और अमानवीय कार्यस्थितियों में बदलाव की मांग कर रहे थे, परन्तु सरकार के कान पर जूं तक नहींरेंगी.और तो और सामान्य नागरिकों से भी अवहेलना झेलते आ रहे येसफ़ाई कर्मचारीजब अपने हक़ की बात करते हैं तो उनके समर्थन मेंखड़े होना तो दूर की बात  लोगउन पर ही गंदगी फैलाने का आरोप लगाते हैं.इन हालातों में कचरा व्यूह हमेंहमारे समाज का आइना दिखाती है औरनागरिकों से खुद को सफ़ाई शिक्षा से दीक्षित होने को कहती है.

अब ये सफ़ाई दीक्षा क्या है? क्या एक दिन के लिए कैमरे के सामने झाडू उठा लेने से भारत स्वच्छ हो जाएगा? हमारे घर और उसके परिसर मात्र की सफ़ाई से गंदगी साफ़ हो जायेगी? सफ़ाई का का काम बेहद गंदा माना जाता है ऐसा क्यों? ऐसा क्यों है की लगभग 99.99 प्रतिशतसफ़ाई कर्मचारी दलित समुदाय से आते हैं? जब तक सफ़ाई के काम को जाति विशेष से जोड़ा जाएगातब तक इस काम के प्रति सर्वसमावेशक नज़रिया नहीं बन सकता और न ही सफ़ाई का सवाल दलित उत्पीडन से अलग किया जा सकता है. घर में ही देखिए कौनपाखानों को साफ़ करता है ? जबअधिकतरघरों में यहकाम महिलाओं के ही जिम्मे माना जाता हो और समाज में यह दलितों पर मढ़ दिया गया हो तो सफ़ाई का क्षेत्र पावर डिस्कोर्स के भार से सामजिक सरोकारों में दब जाता है. हाशिए से इन सवालों को विमर्श के केंद्र में लाने का महत्वपूर्ण काम कचराव्यूह करती है.यह फ़िल्म पूना के महानगर पालिका के सफ़ाई कर्मचारियों की यूनियन के साथ मिलकर बनायी गयी है ये इसकी ख़ासियत है.

अतुल पेठे:

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लेखक, रंगकर्मी और फ़िल्मकार के रूप में अतुल पेठे मराठी नाटक का एक बड़ा हस्ताक्षर हैं.समान्तर थियेटर में बरसों बेहतरीन नाटकों को रंगमंच को उतारने के बाद 90 के दशक की बदलते सामाजिक- राजनैतिक परिदृश्यमेंअतुल ने अपनी कला के नए मायने और आयाम ढूंढें. अनेक सामाजिक आंदोलनों के साथ जुड़कर उन्होंने काम करना शुरू किया. सफ़ाई करमचारियों को बतौर कलाकार गो. पु. देशपांडे के नाटक सत्यशोधककेज़रिए रंगमंच पर लाया और उनसे जुड़े सामाजिक‘कलंक’ को चुनौती प्रस्तुत की. हाशिए के पहचानों को कला के माध्यम से नई पहचान गढ़ने की कोशिश सांस्कृतिक प्रतिरोध का हथियार बन जाती है. साथ ही शाहीर और संतों की सामजिकसांस्कृतिक विरासत को वर्तमान के आयामों से जोड़करजनमानस तक पहुचाते हुए वे प्रतिरोध की भाषा बुन रहे हैं.

कचरा व्यूह /  दस्तावेज़ी फ़िल्म / निर्देशक अतुल पेठे / 55 मिनट

  • प्रज्ञा जोशी

कितने बाजू, कितने सर

एमए के दिनों की बात है। हम देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में थे और यहाँ छात्रसंघ चुनावों में वाम राजनीति को फिर से खड़ा करने की एक और असफ़ल कोशिश कर रहे थे। उन्हीं दिनों पंजाब से आए उन साथियों से मुलाकात हुई थी। हिन्दी में कम, पंजाबी में ज़्यादा बातें करने वाले, हमारे तमाम जुलूसों में सबसे आगे रहने वाले उन युवाओं में गज़ब का एका था। उन दिनों पंजाब में उग्र वाम फिर से लौट रहा था और वहाँ एम-एल की छात्र इकाई सबसे मज़बूत हुआ करती थी। वे लड़के बाहर से शान्त दिखते थे, लेकिन उनका जीवट प्रदर्शनों में निकलकर आता था और उन्हें देखकर हम भी जोश से भर जाते थे। सलवार-कुरते वाली कई लड़कियाँ थीं जो हमसे कम और आपस में ज़्यादा बातें करती थीं लेकिन सार्वजनिक स्थान पर किसी भी तनावपूर्ण क्षण के आते ही सबसे आगे डटकर खड़ी हो जाती थीं और कभी नहीं हिलती थीं। उन्हीं के माध्यम से मैं जाना था कि हमारे पडौसी इस ’धान के कटोरे’ में कैसी गैर-बराबरियाँ व्यापी हैं और कैसे वहाँ के दलित अब अपने हक़ के लिए खड़े होने लगे हैं। इस राजनैतिक चेतना के प्रभाव व्यापक थे। जब शोषित अपने हिस्से का हक़ मांगता है तो पहले से चला आया गैरबराबरी वाला ढांचा चरमराता है और इससे तनाव की षृष्टि होती है। बन्त सिंह आपको याद होंगें। यह बन्त सिंह की राजनैतिक चेतना ही थी जिसने उन्हें अन्याय का प्रतिकार करना सिखाया और यही बात उनके गाँव के सवर्ण बरदाश्त न कर सके। उन्होंने बन्त के हाथ-पैर काट उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया। लेकिन न वो बन्त को खामोश कर पाए, न उनके क्रान्तिकारी लोकगीतों को।

गुरुविन्दर सिंह की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त पहली पंजाबी फ़िल्म अन्हें घोड़े दा दान’ इसी तनाव को अद्भुत रचनात्मकता के साथ कैमरे पर उतारती है। सत्य नागपाल का विस्मयकारी कैमरा जैसे पंजाब के असल देहात को परदे पर रचता है, धान की बालियों से लदे खेतों में जैसे धुंध भरी सुबह उतरती है, अद्भुत है। लेकिन इससे भी अद्भुत है वो राजनैतिक चेतना जिसका किसी हिन्दुस्तानी फ़िल्म में मिलना दुर्लभ होता जा रहा है। यह फ़िल्म सिर्फ़ इसलिए महान नहीं है कि यह खेतिहर मज़दूर के निरन्तर होते शोषण को प्रामाणिक तौर पर दिखाती है। यह इसलिए एक महान फ़िल्म है क्योंकि यह अपनी अद्भुत प्रतीकात्मक दृश्य भाषा में दलित के उस प्रतिरोध को वाणी देती है जिसके गवाह हमारे गाँव–कस्बे लगातार बनते आए हैं। ’अन्हें घोड़े दा दान’ की दृश्य भाषा ज़रूर अहसास करवाती है कि वो मणि कौल के शिष्य की बनाई फ़िल्म है, लेकिन उसकी राजनैतिक चेतना उन्हें मणि की फ़िल्मों से भी कहीं आगे ले जाती है। गुरविन्दर के सिनेमा में श्याम बेनेगल और मणि कौल के बीच का क्रॉस नज़र आता है और वे इस फ़िल्म के साथ हमारे दौर के सबसे संभावनाशील निर्देशक बनकर उभरे हैं। आखिर उस अद्भुत दृश्य को हम कैसे भूल पायेंगे जहाँ बिना कुछ बोले एक तय दिशा में बढ़ते इंसानों का जत्था उस मुखर प्रतिरोध का पर्याय हो जाता है जिसने अब चुपचाप सहने को हमेशा के लिए नकार दिया है। बेशक उसे मालूम है कि वो इस जड़ आततायी व्यवस्था को नहीं बदल पाएगा, लेकिन बिना लड़े मरना अब उसे मंज़ूर नहीं।

बड़े दिनों बाद एक फ़िल्म जिसे देखकर बड़ी शिद्दत से उस मूल कथा को तलाशकर पढ़ने का मन करता है जिसे इस सिनेमाई चमत्कार का आधार बनाया गया है। बड़े दिनों बाद जिसे देखकर मेरे मन की यह सतत कराह कुछ कम होती है कि समकालीन हिन्दी सिनेमा के पास एक भी ढंग की राजनैतिक चेतना वाली फ़िल्म नहीं। फिर अचानक यह लिखते हुए मुझे याद आता है कि यह भी हिन्दी कहाँ, यह तो पँजाबी फ़िल्म है। लेकिन सच यही है कि गुरविन्दर सिंह कृत ’अन्हे घोड़े दा दान’ देखते हुए भिन्न भाषा के भेद पहले दृश्य में ध्वस्त होते उस बिना पलस्तर वाली ईंटों से बने घर के साथ ही ढह जाते हैं और पीछे रह जाती है निर्बल की वह मर्मांतक कराह जिसका अर्थ दुनिया की हर भाषा में एक है और जिसे दुनिया का हर निर्बल बिन बोली जाने भी समझता है। और साथ ही रह जाता है वह खामोश, लेकिन दृढ़निश्चयी प्रतिकार जिससे दुनिया की हर आततायी सत्ता आज भी सबसे ज़्यादा डरती है।

तमस’ का पंजाब। गोविन्द निहलाणी की फ़िल्म का वो अन्तिम दृश्य जिसमें महिलाएं किसी जुनूनी संकल्प से बंधी आती हैं और उस मौत के अन्धे कुएं में कूदती जाती है। इसी दृश्य को पिछले दिनों एक समारोह में फिर से देखते हुए मैंने नोटिस किया कि इस लम्बे प्रसंग में एक भी बार कुएं के भीतर का दृश्य पटल पर नहीं दिखाया जाता। न ही उनका कुएं में कूदना एक निश्चित क्षण से आगे दिखता है। सिर्फ़ नीचे से ऊपर की ओर देखता कैमरा और नवजात शिशुओं को अपनी गोदी में ले किसी अन्धे गर्त में छलांग लगाती अनगिनत महिलाओं की छवि, और इसका दिल दहला देने वाला अहसास। और सच कहूं, यह अहसास किसी भी वास्तविक दृश्य से ज़्यादा गहरे मन को छीलता है। इसी अहसास को मैंने फिर जिया ’अन्हें घोड़े दा दान’ देखते हुए। यह फ़िल्म अपने रिक्त स्थानों के माध्यम से कथा कहती है। फ़िल्म मे सीधे टकराव का एक भी दृश्य नहीं है। एक प्रसंग में हम शहर के मुख्य चौराहे पर अनगिन लाल झण्डों तले समूहबद्ध रिक्शा चलानेवालों को साथ मिलकर दमनशाही के खिलाफ़ नारे लगाते, चक्काजाम करते और अपना हक़ मांगते देखते हैं। दूसरे ही दृश्य में हमारा सामना मंगू सिंह से होता है, उसे उसके दोस्त ’लीडर’ कहकर बुलाते हैं और फिर पलटकर यह भी पूछते हैं कि आखिर शहर में रहकर इन सात सालों में आखिर उसने क्या कमाया। आगे मंगू फिर दिखता है, अस्पताल में अपने सर की चोट पर पट्टी करवाने आया है और दोस्त डॉक्टर द्वारा चोट की वजह पूछे जाने पर बताता है कि रास्ते पर किसी बच्ची को बचाते हुए ज़ख्म खा बैठा। उसके डॉक्टर दोस्त में यह समझदारी है कि वो मंगू के इस पवित्र झूठ के पीछे छिपा हमारे समाज का बदनुमा और हमेशा से गैरबराबर रहा चेहरा देख सकता है। इसलिए भी कि मंगू का यह डॉक्टर दोस्त भी शायद उन्हीं परिवारों से आता है जिनका अपने वाजिब हक़ के लिए इन्तज़ार पांच हज़ार साल लम्बा है। अन्त में भी जो गोली चलती है लेकिन उसे चलानेवाले और उसके शिकार आपके सामने होकर भी परदे से अदृश्य हैं। लेकिन इस माध्यम से यह उन मुख्य घटनाओं के पीछे छिपे उस तनाव को बखूबी रचती है जिनका उत्स सामाजिक गैरबराबरियों और उसे उलट देने के नए संकल्पों में है।

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पहले उल्लेखित फ़िल्म के विज़ुअली सबसे विस्मयकारी प्रसंग से ही एक और संदर्भ। ठीक वहाँ जहाँ सरपंच के घर गाँव का दलित समुदाय अपनी जोत पर अपना हक़ मांगने को इकठ्ठा हुआ है और जहाँ एक बहुत की कमाल का प्रतीक रचते हुए गुरविन्दर सिंह गाँव के जट्ट सरपंच की दुनाली बन्दूक के आगे दलित समुदाय के प्रतिरोध की निहत्थी सामुहिकता को खड़ा करते हैं, वहीं सवर्ण सरपंच का बन्दूकधारी साथी व्यंग्य में कहता है कि अब तो सब कुछ इन्हीं को मिलेगा। हमारे हिस्से की नौकरियाँ लेकर बाबूसाहब तो ये बन ही गए हैं। स्पष्ट है कि संदर्भ आरक्षण की व्यवस्था का है। इस तरह फ़िल्म में आरक्षण का सीधा संदर्भ आता है, लेकिन फ़िल्म यहाँ सीधा उसके पक्ष या विपक्ष में कुछ नहीं कहती। फ़िल्म को जो कहना है वो अपने अगले प्रसंग के माध्यम से कहती है। यह संदर्भ शहर का है जहाँ रिक्शा चलाता मंगू सिंह सिर पर दुशाला ओढ़े सरकारी अस्पताल पहुँचता है और किसी अछूत की तरह आईसीयू के कांचवाले दरवाज़े के पीछे से अपने किसी परिचित को आवाज़ लगाता है। ज़रा देर में वहाँ से डॉक्टर की पोशाक में एक व्यक्ति निकलता है और मंगू को देखकर वो उसे सीधा अन्दर अपनी डिस्पेंसरी में ले जाता है और उसकी पट्टी करता है। मंगू के सर में चोट है जिसका इलाज करवाने वह दूर से रिक्शा चलाता यहाँ आया है। लेकिन यहीं क्यों? और अस्पताल में भी ऐसे छुपकर एक ही डॉक्टर से इलाज क्यूं? सिर्फ़ दोस्त होना नहीं, एक गाँव का होना नहीं। वजह आप उनकी बातचीत से समझ सकते हैं। यह वह साझेदारी है जो एक शोषित को दूसरे शोषित के साथ खड़ा करती है। यह वो कॉमरेडशिप है जो एक दलित को दूसरे दलित के साथ खड़ा करती है।

मेरे लिए यहीं फ़िल्म में बहुत सारे सामाजिक संदर्भ आ जुड़ते हैं और मुझे बहुत सारे सवालों का जवाब भी मिल जाता है। मैं सोचता हूँ कि आरक्षण की व्यवस्था के बिना इस अस्पताल में एक दलित डॉक्टर का होना क्या संभव था? या यह कि अगर यहाँ एक दलित डॉक्टर न होता तो मंगू और उसके जैसे तमाम लोग, इस देश की वास्तविक ’आम जनता’, क्या उस व्यवस्था में ज़रा सी भी हिस्सेदारी पाते, जिसे दरअसल उन्हीं जैसों का नाम ले-लेकर रचा गया है। गुरविन्दर सिंह की फ़िल्म बोलकर सच्चाई नहीं बताती, वह उसे सीधा हमारी आँखों के सामने रखती है। मुझे डॉक्टरी की पढ़ाई पढ़ाई पढ़ते उस तरुण लड़के अनिल मीणा की याद आती है जो मेरे राज्य राजस्थान की पूर्वी सीमा पर बसे एक छोटे से गाँव पीपलियाचौकी से देश की राजधानी के एलीट मेडिकल संस्थान में सिर्फ़ अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के दम पर आया था। वो पीपलियाचौकी जिसके इतिहास में अनिल से पहले सिर्फ़ पांच लोगों ने कॉलेज की डिग्री तक का सफ़र तय किया था और जो गाँव अनिल के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में चयन पर पूरा हफ़्ता उत्सव मनाता रहा था। वही अनिल जिसकी लाश पिछले मार्च की पांच तारीख़ को उसी एलीट संस्थान के हॉस्टल के कमरा नम्बर तिरेसठ के पंखे से लटकती मिली थी। वही अनिल जिसके साथ उस दिन भविष्य में कुछ ज़्यादा समतावादी समाज बनाने की कितनी ही उम्मीदें भी फांसी से लटक गई थीं। ’अन्हें घोड़े दा दान’ का यह दृश्य बताता है कि वंचित समुदाय से आया एक डॉक्टर कैसे खुदको ही नहीं, पूरी व्यवस्था को बदलता है और क्यूं उसका होना ज़रूरी है। और मेरे लिए यही ’अन्हे घोड़े दा दान’ की असल खूबी है कि कई अन्य उच्च गुणवत्ता वाली ’कला फ़िल्म’ कही जाती समकालीन फ़िल्मों की तरह वो किनारे नहीं खड़ी रहती। वह हमारे समय की सबसे तीखी बहसों में अपना पक्ष बखूबी निर्धारित करती है।

यह उस स्त्री के बारे में है जो पड़ोस में चली गोली की आवाज़ सुनकर सबसे पहले घर से निकलकर तेज़, लेकिन मज़बूत कदमों से उस ओर जाती है। हम नहीं देखते कि गोली से कौन मारा गया, सिर्फ़ दिखाई देता है एक ख़ास दिशा में एकटक तकती शॉल से मुंह लपेटे खड़ी महिलाओं का समूह। उनके पारदर्शी चेहरों पर लिखी अनहोनी। और फिर उसके बाद की अंधेरी काली आधी रात एक माँ अपनी बेटी के बार-बार कहने पर भी भर सर्दी में घर के बाहर ही खाट पर सोने की ज़िद पर अड़ी रहती है और भीतर कमरे में नहीं आती। यह उस माँ के बारे में है जिसको अनिष्ट की आहट आते ही खुद से भी पहले यह ख्याल आता है कि कैसे वो उस अनदेखे अनिष्ट से अपने घर को बचा ले और सब अपने ऊपर ले ले।

लेकिन किसी सच्चे आधुनिक गोदान’ की तरह ’अन्हे घोड़े दा दान’ हिन्दुस्तानी गाँव की सनातन गैरबराबरियों की प्रामाणिक कथा कहकर वहाँ रुकती नहीं है। अपनी संततियों के साथ वह शहर आती है और उस नष्ट स्वप्न की शवपरीक्षा करती है जिसकी नागरिक आधुनिकता को कभी हिन्दुस्तानी दलित ने अपनी मुक्ति का अकेला और अंतिम ज़रिया माना था। यहाँ यह पड़ताल करती है ’आधुनिक विकास’ की गंगोत्री से निकलते बराबरी के उन वादों की जिनकी ओर सामन्ती व्यवस्था द्वारा सदा पैरों तले कुचले गए भारतीय दलित समाज ने कभी बड़ी उम्मीद भरी ऩज़रों से देखा था। शहर, याने वृहताकार कारखाने और सरपट दौड़ती रेलगाड़ियाँ। शहर, याने भीड़ भरी सड़कें और उनपर खड़े बराबरी के नागरिक समाज के वादे। शहर, याने नफ़ीस आवरण में लिपटा वही पांच हज़ार साल से चला आता सामन्ती समाज का गैरबराबर स्तरीकरण। यह हिन्दुस्तान का आधुनिक औद्योगिक शहर है जिसके क्षितिज पर किसी थर्मल पावर संयंत्र की विशालकाय चिमनियाँ मंडराती हैं लेकिन जिसकी भीतरी बुनावट में आज भी दलित को वही हाशिए का स्थान है जिस हाशिए से भागकर वह कभी शहर आया था। एक दृश्य में आप सड़क पर रिक्शा यूनियन की हड़ताल और चक्काजाम देखते हैं और दूसरे ही दृश्य में सड़क पर जैसे एक लाइन से रिक्शों की शवयात्रा निकलती दिखाई देती है। इन्हीं औद्योगिक हड़तालों और उनके अमानवीय दमन में कहीं हमारे आज के मानेसर, गुड़गावों के असल पाठ छिपे हैं। ’अन्हें घोड़े दा दान’ दिखाती है कि कैसे शहरी आधुनिकता की ऊपर से दिखती बराबरी में गहरे वही सामन्ती गैर-बराबरी नए भेस धरकर लौट आती है।

तो फिर आखिर समाधान कहाँ है? फ़िल्म के अन्तिम दृश्य में जहाँ मंगू रेल पकड़ वापस गाँव लौट आया है, उसके पिता शहर का रुख़ करते हैं। किसी अनदेखी उम्मीद की अन्तिम किरण के सहारे ज़िन्दगियाँ यूं ही चलती जाती हैं। जैसे अन्धेरी रात में किसी अनजान पगडण्डी पर कोई सिर्फ़ एक लालटेन के सहारे चलता चला जाए। किसी अन्तिम समाधान से परे यह फ़िल्म कैनवास को खुला छोड़ देती है। शायद इस उम्मीद में कि उसमें रंग भरना अब हमारा काम है।

  •   यह समीक्षा मिहिर पंड्या द्वारा उनके ब्लॉग ‘आवारा हूँ’ से ली गयी है, शुक्रिया साथी मिहिर|

मिहिर को अधिक पढने के लिए इस लिंक पर जाये :

http://mihirpandya.com/

एक थी डेल्टा : भँवर मेघवंशी

हमारा यह फिल्मोत्सव डेल्टा मेघवाल के लिए न्याय की लड़ाई के समर्थन में है.

क्या आप डेल्टा मेघवाल के बारे में जानते हैं ? हो सकता है, आपको जानकारी न हो या आधीअधूरी जानकारी हमारे मीडिया ने आप तक पहुंचाई हो. सुप्रसिद्ध पत्रकार एवं  एक्टिविस्ट भँवर मेघवंशी ने डेल्टा की सांस्थानिक हत्या की पड़ताल करता यह लेख लिखा है. वे फेसबुक पर क्रमिक रूप से इसे लिखते रहे हैं. प्रस्तुत लेख नवीनतम कड़ियों को समेटे हुए है.भँवर मेघवंशी हमारे तीसरे फिल्मोत्सव के अतिथि वक्ता भी थे.

प्रस्तुत है यह जरूरी लेख :

7 मई 1999 को शिक्षक महेन्द्रा राम के घर जन्मी पुत्री का नाम डेल्टा रखा गया .त्रिमोही जैसे छोटे से गाँव के लिए यह नाम ही किसी अजूबे से कम नहीं था .यहाँ के अधिकांश लोगों में किसी ने भी अपनी पूरी ज़िन्दगी में ऐसा नाम सुना तक नहीं था .जो पढ़े लिखे है उन्होंने भी भूगोल की किताबों में डेल्टा के बारे में पढ़ा था ,लेकिन किसी का नाम डेल्टा ,यह तो अद्भुत ही बात थी .ऐसा नाम रखने के पीछे के अपने मंतव्य को प्रकट करते हुए महेन्द्रा राम मेघवाल बताते है कि – ‘ जिस तरह नदी अपने बहाव के इलाके में तमाम विशेषताएं छोड़ कर समंदर तक पंहुच कर मिट्टी को अनूठा सौन्दर्य प्रदान करती है ,जिसे डेल्टा कहा जाता है ,ठीक वैसे ही हमारे परिवार में पहली बेटी का आगमन हमारी जिंदगी को अद्भुत ख़ुशी और सुन्दरता देनेवाला था ,इसलिए मैंने उसका नाम डेल्टा रखा .मैं चाहता था कि मेरी बेटी लाखों में से एक हो ,उसका ऐसा नाम हो जो यहाँ पर किसी का नहीं है .” वाकई अद्वितीय नामकरण किया महेन्द्राराम ने अपनी लाड़ली बेटी का !

कहते है कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात ,सो डेल्टा ने अपने होनहार होने को अपनी शैशवावस्था में ही साबित करना शुरू कर दिया .वह जब अपने पैरो पर खड़ी होने लगी तो उसके पांव संगीत की धुन पर थिरकने लगते थे .बचपन में जब अन्य बच्चे तुतला तुतला कर अपनी बात कहते है ,तब ही डेल्टा स्पष्ट और प्रभावी उच्चारण करने लगी .महेन्द्राराम को विश्वास हो गया कि उसकी बेटी अद्भुत प्रतिभा की धनी है .उन्होंने उसे अपने विद्यालय राजीव गाँधी पाठशाला जहाँ पर वे बतौर शिक्षक कार्यरत थे ,वहां साथ ले जाना शुरू कर दिया .प्राथमिक शाला में पढ़ते हुए डेल्टा ने मात्र पांच साल की उम्र में दूसरी कक्षा की छात्रा होते हुए राष्ट्रिय पर्व पर आत्मविश्वास से लबरेज़ अपना पहला भाषण दे कर सबको आश्चर्यचकित कर डाला .जब वह चौथी कक्षा में पढ़ रही थी तो उसने रेगिस्तान का जहाज़ नामक एक चित्र बनाया ,जो राज्य स्तर पर चर्चित हो कर आज भी जयपुर स्थित शासन सचिवालय की दीवार की शोभा बढ़ा रहा है .मात्र आठ वर्ष की उम्र में डेल्टा ने फर्राटेदार अंग्रेजी में एक स्पीच दे कर लोगों को दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर दिया .

डेल्टा ने अपनी पांचवी तक की पढाई अपने ही गाँव त्रिमोही की राजीव गाँधी स्वर्णजयंती पाठशाला में की ,यहाँ पर वो हर प्रतियोगिता में अव्वल रही .आठवी पढने के लिए वह त्रिमोही से दो किलोमीटर दूर गडरा रोड में स्थित आदर्श विद्या मंदिर गयी .यहाँ भी हर गतिविधि और पढाई में वह आगेवान बनी . मेट्रिक की पढाई राजकीय बालिका माध्यमिक विध्यालय गडरा रोड से पूरी करके उसने सीनियर की शिक्षा स्वर्गीय तेजुराम स्वतंत्रता सेनानी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से प्राप्त की .यह सब उसने मात्र पंद्रह साल की आयु में ही कर दिखाया .
बहुमुखी प्रतिभासंपन्न डेल्टा सदैव अव्वल रहने वाली विद्यार्थी तो थी ही ,वह बहुत अच्छी गायिका भी थी ,उसके गाये भजनों की स्वर लहरियां श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किये देती थी .बचपन में ही उसके हाथों ने कुंची थाम ली थी ,वह किसी सधे हुए चित्रकार की भांति चित्रकारी करती थी .साथ ही साथ वह बहुत बढ़िया नृत्य भी करती थी .वह स्काऊट की लीडर भी थी और स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस की परेड्स का भी नेतृत्व करती थी .

मात्र पांच साल की उम्र में मंच पर भाषण ,छह साल की उम्र में राज्य स्तरीय चित्रकारी ,आठ साल में इंग्लिश स्पीच ,दस साल की उम्र में परेड का नेतृत्व और पंद्रह साल की होते होते बारहवी कक्षा उत्तीर्ण करनेवाली डेल्टा हर दिल अज़ीज़ बन चुकी थी .वह इस इलाके की अध्ययनरत अन्य छात्राओं के लिए भी एक आदर्श बन गयी थी .त्रिमोही के हर अभिभावक की ख्वाहिश थी कि उनकी बेटी भी डेल्टा जैसी होनहार बन कर गाँव और परिवार का नाम रोशन करें .

आत्मविश्वास से भरी डेल्टा अपने प्रिय पिता और परिजनों के स्वप्नों को साकार करना चाहती थी ,वह आईपीएस बनने के अपने पिता के सपने को पूरा करना चाहती थी ,लेकिन वो जानती थी कि उसके पिता महेन्द्राराम कितनी मुश्किलों से उसे और अन्य भाई बहनों को पढ़ा रहे थे ,इसलिए वह जल्दी से जल्दी अपने पैरों पर खड़े होना चाहती थी ,ताकि पिता पर भार कम हो .उसने शिक्षिका बनने का संकल्प लिया और जयनारायण व्यास विश्वविध्यालय द्वारा आयोजित बेसिक स्कूल टीचर कोर्स की प्रवेश परीक्षा में शामिल हो गयी ,यहाँ भी उसने अपनी कामयाबी के झंडे गाड़े ,उसने छह सौ अंको वाली यह परीक्षा चार सौ उनसत्तर अंको से पास कर ली .शुरुआत में उसे जैसलमेर सेंटर मिला ,जहाँ वह चार दिन रही भी ,लेकिन वहां का माहौल ठीक नहीं होने से वह घर लौट आई . बाद में नोखा स्थित श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय को सही जानकर उसे मात्र पंद्रह साल की आयु में सन 2014 में बीकानेर जिले के नोखा पढ़ने के लिये भेज दिया गया. नोखा के इसी जैन आदर्श संस्थान में डेल्टा दो वर्ष से अध्ययनरत थी .

सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि अचानक  डेल्टा मेघवाल का शव 29 मार्च 2016 को श्री आदर्श जैन कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के हॉस्टल परिसर की पानी की टंकी में मिला .डेल्टा के पिता महेंद्रा राम को इस बात की सूचना दोपहर एक बजे दी गई ,वो देर रात 12 बजे नोखा पहुंचे .30 मार्च 2016 को सुबह 8 .30 पर उनकी ओर से नोखा थाने में संस्थान के संचालक ईश्वर चंद वैद ,पीटीआई विजेन्द्रसिंह ,वार्डन प्रिया शुक्ला तथा वार्डन के पति प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करवाई गई ,जो भारतीय दंड संहिता की धारा 302 ,376 (ग ) 201 ,34 एवं पोक्सो कानून की धारा 5 तथा 6 और अनुसूचित जाति ,जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 की धारा 3 (1 ) (12 ) के तहत दर्ज की गई .

डेल्टा के साथ बलात्कार तथा उसकी जघन्य हत्या के बाद पुलिस की भूमिका ,स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा डेल्टा को चरित्रहीन बताना .पुलिस द्वारा पहले ही दिन से पानी में डूबकर सुसाईड करने की कहानी दोहराना तथा शव के अंतिम संस्कार कर दिए जाने के बाद मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को बदलवा देना और बाद में पुलिस द्वारा प्रेस कांफ्रेंस करके डेल्टा के चरित्र पर आक्षेप लगाना .यह सब डेल्टा के सुनियोजित सांस्थानिक मर्डर को साबित करने के लिये काफी है .हम कह सकते है कि डेल्टा के साथ जैन संस्थान में बलात्कार किया गया ,उसके बाद साक्ष्य मिटाने के लिए उसे मार डाला गया .चूँकि जैन संस्थान का मालिक ईश्वरचंद आर एस एस  तथा बीजेपी से जुड़ा हुआ व्यक्ति है ,इसलिए उसे बचाने के लिए राजस्थान की सरकार ने डेल्टा की चरित्र हत्या की और अंततः पुलिस ने अपने आकाओं के इशारे पर इस जघन्य हत्या को आत्महत्या साबित करते हुए चार्जशीट पेश करने का दुष्कर्म कर दिखाया .कुमारी डेल्टा मेघवाल नोखा के आदर्श संस्थान के श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय की द्वितीय वर्ष छात्रा थी, इसी कॉलेज द्वारा संचालित हॉस्टल में वह रहती थी. उसकी शिक्षा,स्वास्थ्य तथा सुरक्षा की सम्पूर्ण जिम्मेदारी इसी आदर्श कहे जाने वाले जैन कॉलेज की ही थी. सवाल उठता है कि क्या इस जिम्मेदारी को कॉलेज निभाया ?

डेल्टा के साथ हुए यौनाचार एवं उसके पश्चात हुई निर्मम हत्या की हर कड़ी में साज़िश बहुत साफ नज़र आती है .जैन कॉलेज के प्रबंधन से लेकर पुलिस के अधिकारी कर्मचारी तक ,डेल्टा के लिए न्याय मांगने के लिए जुटे कुछ संदिग्ध लोगों से लेकर राजनीतिक आरक्षण की वजह से जनप्रतिनिधि बन पाये अनुसूचित जाति के नेताओं तक किसी ने भी अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाई हो ,ऐसा पूरे प्रकरण में दिखाई नहीं पड़ता है .ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि सब तरफ अन्याय करने की हौड सी मची हुई थी .डेल्टा का मामला जिन धाराओं में दर्ज हुआ ,अभी तो उन्हीं पर सवालिया निशान है . जबकि यह सर्वविदित है कि नब्बे के दशक में बना अजा जजा अत्याचार निवारण अधिनियम इसी साल 26 जनवरी 2016 को समाप्त हो कर अजा जजा अत्याचार निवारण संशोधित अधिनियम के रूप में लागू हो चुका है ,बावजूद इसके न केवल पुराने कानून की धाराओं में मामला दर्ज किया गया ,बल्कि उसी पुराने कानून के तहत ही चालान पेश करके पुलिस ने अपने बौद्धिक दिवालियेपन को जगजाहिर करने का ही काम किया है .इतना ही नहीं  पोक्सो एक्ट की भी धाराओं का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है ,जो धाराएं 5 एवं 6 लगाई गई है ,उनकी उपधाराओं का उल्लेख नहीं करना मामले को कमजोर करने का ही प्रयास लगता है .पोक्सो कानून की धारा 21 लगाई जानी चाहिए थी ,मगर नहीं लगाई गई है .हत्या के लिए लगाई गई भारतीय दंड संहिता की धारा 302 को तफ्तीश में बदल दिया गया है ,चार्जशीट भादस की धारा 305 के तहत पेश की गई है जो मर्डर को सुसाईड में तब्दील कर देती है .

क्या जाँच अधिकारी को दलित उत्पीडन ,यौन शोषण एवं पोक्सो जैसे कानूनों की सामान्य जानकारी भी नहीं थी या जानबूझकर यह गंभीर लापरवाही की गई ताकि दोषियों को बचाया जा सके .डेल्टा के शव का अपमान करनेवाले पुलिस अफसरान और संस्था अध्यक्ष के खिलाफ कोई भी कार्यवाही नहीं किया जाना क्या साबित करता है ,जिन सरकारी अधिकारीयों ने अपने कर्तव्य के निर्वहन में अपराधिक लापरवाही बरती है ,उन पर अजा जजा अत्याचार निवारण संशोधित अधिनियम की धारा 4 के तहत कार्यवाही क्यों नहीं की गई ? कार्यस्थल पर यौन हिंसा सम्बन्धी दिशानिर्देशों का सपष्ट उल्लंघन पाये जाने के बावजूद जैन संस्थान की मान्यता रद्द करने सम्बन्धी किसी भी तरह की कार्यवाही या अनुशंसा नहीं किया जाना क्या किसी मिलीभगत की तरफ ईशारा नहीं करते है .डेल्टा हत्याकांड के नामजद आरोपी आदर्श जैन संस्थान के अध्यक्ष ईश्वरचंद वैद जिन्होंने अपनी जवाबदेही को नहीं समझा तथा डेल्टा के मर्डर को आत्महत्या बनाने और साक्ष्य मिटाने का आपराधिक कृत्य किया है ,उन्हें बाइज्जत दोषमुक्त करना किस तरह से न्यायसंगत ठहराया जा सकता है ?

इतना ही नहीं बल्कि डेल्टा के पीड़ित परिजनों को दलित अत्याचार निवारण कानून और पोक्सो एक्ट एवं राजस्थान पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत मिलने वाला मुआवजा जो की 5 लाख 25 हजार रूपये होना चाहिए था ,वह देने के बजाय सिर्फ 90 हजार रुपये ही दिया जाना और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा मुआवजा देने का प्रार्थना पत्र अस्वीकार कर दिया जाना भी जुल्म की ही इस श्रृंखला की ही तो कोई कड़ी नहीं है ?

अब तक के पूरे घटनाक्रम से साफ हो गया है कि नोखा में डेल्टा के साथ जो जुल्म हुआ ,उस पर पर्दा डालने के काम में श्री आदर्श जैन संस्थान ,बीकानेर पुलिस और अनुसूचित जाति के जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत साफ साफ परिलक्षित होती है .हर कदम पर सब कुछ पहले से मैनेज्ड था ,पुलिस और अपराधी मिले हुए थे .सब मिलकर सच्चाई पर मिट्टी डालने का दुष्कृत्य कर रहे थे .किसी भी स्तर पर ऐसा नहीं लगता है कि डेल्टा मर्डर केस की सच्चाई को उजागर करने और अपराधियों को सजा दिलाने की कहीं भी ईमानदार कोशिस की गई हो !

जब यह स्पष्ट हो गया कि डेल्टा को राजस्थान के शासन और प्रशासन की ओर से न्याय नहीं मिल सकता है ,तो जस्टिस फॉर डेल्टा केम्पेन और दलित अत्याचार निवारण समिति सहित कई दलित एवं मानव अधिकार संगठनों की ओर से डेल्टा के गाँव त्रिमोही (गडरारोड )से लेकर देश और विदेशों तक सीबीआई जाँच की मांग को लेकर धरने ,प्रदर्शन ,रैलियां ,मोमबत्ती जुलुस आयोजित किये गये .

डेल्टा के साथ हुए अन्याय से जैसे जैसे लोग वाकिफ हुए जबरदस्त जन आक्रोश पैदा हो गया .सत्तारूढ़ दल के लिए जवाब देना भारी पड़ने लगा .इसी बीचकांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गाँधी डेल्टा के घर त्रिमोही पंहुच गये ,उन्होंने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर डेल्टा को देश की बेटी करार देते हुए उसे न्याय दिलाने का ऐलान किया .मामला बढ़ता देखकर राज्य सरकार की नींद खुली और उसने पहली बार महसूस किया कि देशव्यापी दलित आक्रोश उसके लिए भारी पड़ सकता है ,इसलिए आनन फानन में डेल्टा के पिता महेंद्रा राम को जयपुर बुलाया .

चौहटन सुरक्षित क्षेत्र के विधायक तरुण राय कागा जो कि प्रारंभ में इस मसले में काफी संवेदनशील रहे है तथा डेल्टा को न्याय मिले इसके लिए भी अपनी पार्टी में कोशिस करते रहे है ,उनके साथ महेन्द्रराम मुख्यमंत्री वसुंधराराजे से मिले .अंततः राज्य सरकार ने 20 अप्रैल 2016 को केंद्र सरकार को डेल्टा मामले की सीबीआई जाँच हेतु अनुशंसा कर दी .लोगों को उम्मीद जगी कि अब राज्य की निकम्मी पुलिस के हाथ से यह मामला केन्द्रीय जाँच ब्यूरो के पास चला जायेगा और मामले की निष्पक्ष जाँच होगी .

लेकिन सीबीआई जाँच के नाम पर राज्य और केंद्र की सरकार ने डेल्टा के परिजनों और उसके लिए संघर्षरत लोगों के साथ धोखा किया .राज्य सरकार द्वारा अनुशंसा किये जाने को तीन माह बीत गये है और डेल्टा की हत्या हुए चार माह गुजर गये है मगर आज तक सीबीआई जाँच के लिए नोखा नहीं पंहुची है .सीबीआई जाँच का पूरा पाखंड अब उजागर हो चुका है .राज्य की भाजपा सरकार ने सिर्फ अनुशंसा करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है और केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने राजस्थान पुलिस द्वारा आरोप पत्र दाखिल करने तक एक प्रतिभावान दलित छात्रा के बलात्कार के बाद मर्डर जैसे जघन्य कांड की सीबीआई जाँच के सम्बन्ध में नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है . कुल मिलाकर सीबीआई हेतु जाँच की बात को पहले तो ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया और इसी बीच बीकानेर पुलिस ने अत्यंत ही लचर किस्म का चालान बीकानेर न्यायालय में पेश कर दिया ,जिसकी आड़ में केंद्र सरकार ने सीबीआई जाँच की मांग को ठुकरा दिया .बीकानेर पुलिस ने अपनी चार्जशीट में जैन आदर्श  संस्थान के अध्यक्ष ईश्वरचंद को पूरी तरह से बचा लिया गया है .वार्डन प्रिया शुक्ला और उसका पति प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला पैरवी के अभाव में जमानत पर बाहर आ गये है . अब केवल बलात्कारी शिक्षक विजेन्द्रसिंह जेल में बचा है .

नारों का शोर थम चुका है .पीड़ित के घर तक आने जाने वाले राजनीतिक पर्यटक भी अब नहीं दिखलाई पड़ रहे है .धरनों के टेंट समेटे जा चुके है .सोशल मीडिया के शेर भी अन्यत्र व्यस्त हो गये है ,अब डेल्टा का मुद्दा उस तरह से हमारी संवेदनाओं को उद्देव्लित नहीं कर रहा है ,जिस तरह हमने रोहित वेमुला को भुलाया ,उसी तरह डेल्टा भी भुलायी जाने लगी है .चंद सरोकारी लोगों और डेल्टा के परिजनों को छोड़कर शायद ही कोई इस बात को याद करना चाहे कि देश की एक होनहार छात्रा की मौत की सच्चाई को सामने नहीं लाया जा सका . सरकारों का क्या ,उन्हें तो जब तक वोटों की चोट नहीं पड़े तब तक कोई जिए या मरे ,कोई फर्क ही नहीं पड़ता है .

संविधान व तमाम कानूनों के होने और आंदोलनों एवं संघर्षों के बावजूद हमने अपनी आँखों से डेल्टा के मामले में न्याय ,व्यवस्था और कानून को दम तोड़ते देखा है .अगर भारतीय लोकतंत्र को बचाना है तो यह जरुरी है कि डेल्टा सहित हर अन्यायपूर्ण मसले की निष्पक्ष जाँच हो तथा अपराधी चाहे वे कितने ही प्रभावशाली क्यों ना हो ,सलाखों के पीछे जाये ,अन्यथा हम एक विफल लोकतंत्र और अन्यायकारी राष्ट्र है .

जब तक डेल्टा जैसी देश की होनहार बेटियां इस देश में असुरक्षित है ,तब तक भारत माता की जय के नारे बेमानी है ,बेहूदे है और बकवास है !

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विशेष :

  • डेल्टा के पिता महेन्द्राराम मेघवाल इस फिल्मोत्सव में हमारे बीच होंगे.
  • पिछले दिनों डेल्टा के घर गडरा रोड से जयपुर तक दस दिन की ‘दलित महिला स्वाभिमान यात्रा’ निकाली गयी. इस यात्रा की संयोजक सुमन देवाथिया भी हमारे बीच होंगी.

जंगल के दावेदारों की गायिका : महाश्वेता

हमारा फिल्मोत्सव महाश्वेता देवी की स्मृति को समर्पित है.

महाश्वेता जी बांग्ला की लेखिका थीं, पर हिंदी के पाठकों और साहित्यकारों के बीच भी वे बेहद लोकप्रिय थीं। उन्होंने आदिवासियों, दलितों, स्त्रियों और हाशिये के अन्य समुदायों तथा गरीब-मेहनतकश वर्ग के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया। महाश्वेता जी उन लेखकों में थीं जो शासकीय दमन का विरोध करते हुए जनता के प्रतिरोधों और आंदोलनों के पक्ष में पूरी हिम्मत के साथ खड़े होते रहे हैं। उन्होंने लेखन के क्षेत्र में स्त्री की ताकतवर दावेदारी स्थापित की और जनपक्षधर साहित्य लेखन के क्षेत्र में एक जबर्दस्त मिसाल कायम की। ‘जंगल के दावेदार’, ‘अग्निगर्भ’, ‘चोट्टि मुंडा और उनका तीर’, ‘टेरोडेक्टिल’, ‘शालगिरह की पुकार’, ‘हजार चैरासी की मां’, ‘मास्टर साब’ आदि उनके ज़्यादातर बहचर्चित उपन्यासों में आदिवासियों और भूमिहीन किसानों की जिंदगी, उनका जुझारू संघर्ष और बेमिसाल प्रतिरोध ही केंद्र में रहे। उन्होंने 1857 के महासंग्राम से संबन्धित ‘झांसी की रानी’, ‘नटी’ और ‘अग्निशिखा’ नामक तीन उपन्यास भी लिखे। उनके कई कहानी संग्रह भी प्रकाशित हैं। ‘द्रौपदी’, ‘बांयेन’, ‘बीज’ ‘शिकार’, ‘रूदाली’ ‘अक्लांत कौरव’, ‘घहराती घटाएं’ आदि उनकी चर्चित कहानियां हैं।

वामपंथी सरकार के जरिए नंदीग्राम और सिंगुर में राज्य दमन किए जाने के खिलाफ उन्होंने उत्पीड़ित किसानों का पक्ष लिया था, जो प्रगतिशील-जनपक्षधर लेखकों की सामाजिक-राजनीतिक भूमिका के लिहाज से हमेशा पथ-प्रदर्शक रहेगा. उन्होंने कहा था, ”हमें उनसे (किसानों से) सीखने की जरूरत है। उनसे सीखने का भाव लेकर उनके पास जाओ उनको सिखाने का नहीं। इस देश का आम आदमी ज्यादा जानता है।” बुद्धिजीवियों और नौजवानों की भूमिका के बारे में उन्होंने उसी साक्षात्कार में कहा था- ”हमें घर में बैठने का कोई अधिकार नहीं है। जो जहां है वहाँ से निकलो। घर में बैठकर बड़ी-बड़ी बात करने का समय नहीं, बाहर निकलने का समय है। मैं तो हमेशा सबसे कहती हूँ, नौजवानों से भी कहती हूँ- जाओ गांवों में, किसानों में, उनसे जाकर मिलो।”art2

इस समय महाश्वेता देवी को याद करना और प्रासंगिक है. 21 सितम्बर को हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय में महाश्वेता देवी की कहानी ‘द्रौपदी’ के मंचन के बाद दक्षिणपंथी गिरोह ने इसे सेना का अपमान करनेवाला और देशद्रोही नाटक बताकर शहर भर में प्रदर्शन किये और दबाव में आकर विश्वविद्यालय ने विभाग के शिक्षकों के खिलाफ जांच बिठा दी. ‘द्रौपदी’ महाश्वेता देवी की प्रसिद्द कहानी है जिस पर पहले भी कई बार नाटक खेले जाते रहे हैं. याद आता है, मणिपुरी के मशहूर निर्देशक हेस्नाम कन्हाईलाल ने सन 2000 में यह नाटक खेला था. भारतीय रंगमंच के एक विलक्षण प्रयोग के अंतर्गत मुख्य अभिनेत्री साबित्री हेस्नाम, जो उनकी पत्नी थीं, मंच पर  अनावृत्त हो गयी थीं. सन 2004 में मणिपुर की बारह महिलाओं ने असाम राइफल्स के खिलाफ नग्न होकर जो ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था, उसकी प्रेरणा यही नाटक माना जाता है. %e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2

पद्मभूषण हेस्नाम कन्हाईलाल का 6 अक्टूबर, 2016 को निधन हो गया.

महाश्वेता और कन्हाईलाल, दोनों  कलाओं में विद्रोह के चितेरे हैं. हम उनकी विरासत को आगे बढाने के लिए प्रयासरत हैं.

I hope…

What makes a movie successful?
Is it when a viewer is able to connect itself with the story? or
Is it when a viewer knows that such things can happen or in worst case, have happened? or
Is it when a viewer is able to relate to almost every feeling portrayed in the movie? or
Is it when a viewer leaves the cinema hall with some realization rather than ‘a learning’? or
Is it when a viewer just simply knows that it is real and possible?
As far as I can remember, what I have usually seen is a fictional story between a guy, girl and love. A story with differences like economic status, social status, caste, religion and what not. And to make sure that these stories doesn’t look same, some non-fictional human throw various drama in it. I am not saying that all these stories doesn’t teach us some morals but c’mon, I haven’t heard of such cool schools and colleges like they portray in reel life.
I am a movie person and love rom-coms. But at the same time, I have a thing for movies which are far away from romance. May be that is why Smita Patil’s starring Mirch-Masala is one movie I love. The movie have almost everything from real story, location, lights and an outstanding cast. The movies tells us about one of the major consequences of migration and women empowerment during pre-independence period of India.
‘Cinema is the reflection of society’ they say and this is the cinema which makes it worth a watch. Cinema, which introduces our heterogenic India to us, fills us with the curiosity to know more and more, resulting in to make us love our nation. And I believe this is what ‘Cinema of Resistance’ wants from its viewers. After doing my research about the previous Film Festivals, I am now a part of the upcoming Udaipur Film Festival for the first time as a volunteer, and I have huge expectations from it. I hope to fall in love with my ancestors who have fought and died for their rights. Through a unique way of movie screenings, I hope to know more about Dalit’s Movement, and murders in the name of society and learn what made India what it is today.
Hence, Udaipur Film Festival started with ‘no-sponsorship’ model, making it mass collaboration and that is why it is called Janta ka Cinema or ‘People’s Cinema’. Unlike to what other film or theatre festivals offer, here you will get various occasions to communicate with one another through direct dialogue with the filmmakers, freedom of putting your views forward, Saathi (fellow) culture and most importantly equal opportunity environment. Be it a filmmaker, volunteer or a viewer, here no one is above or beneath anyone.
According to the recent studies, today’s youth is not into buying properties and cars, but to invest their savings in experiences. And ‘Cinema of Resistance’ is one such experience which won’t ask for any of your savings but will give you a reason to opt for another. So, join me in this journey and sing a song of resistance.

(Udaipur Film Society and Cinema of Resistance are organizing the 4th Udaipur Film festival on 14-16 October 2016 at RCA Auditorium, Udaipur. Come join us in the celebration of new wave cinema, arts and create your own resistance.)

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