UFS Monthly Film Screening

February 2018

Report

For this month we watched a documentary film ‘Soz: A ballad of maladies’ directed by Tushar Madhav and Sarvanik Kaur. The screening was hosted at Bougainvillea art gallery. Around 20 guests came for the screening.

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All those present were aware of the grim situation of Kashmir. The issues were well put by Jatin and other members. But we are often at a loss to sort the truth from lies, reality from propaganda, life and culture from politics. Lines become further blurred when looked through the lens of nationalism, patriotism, and loyalties. This is the theme that the film touches upon. It analyses recorded history against the lived history of Kashmiris, questions the conflict of the dominant culture of the ruler with the dominated culture of the masses. There are narratives of a poet-historian, a hip-hop artist, a rock band, a journalist, a cartoonist among others all of whose approach to activism and resistance is radically different from what is generally portrayed, but they are all united for social justice.

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The key here is to read between the lines. In hip-hop content, for instance, Beethoven’s uplifting sonata is the background for the deeply disturbing reality of Kashmiri youth left with few choices other than militancy. Another detail that tends to get missed out or subconsciously glossed over is how the director gives space to the introspective voice that says let us not romanticise Kashmiriyat to the extent of fundamentalism and status quoism.

The seemingly dead-end debate of violence against Kashmiri pandits used as a pretext for revenge anywhere and everywhere – for this too the record is set right. Here, cultural loyalty is above personages, irrespective of religion. Hindus could be comrades, while Muslims could be traitors to the cause of ethnicity, called Kashimiriyat. Narrative constantly, in all forms, holds up the nonviolent dialogue as the only way ahead, as well as problematising it.

In all, the venue- art gallery was an apt venue for the spectacular film, where subject melted into the landscape. All of us went back with lots to think about and revisit our ideas about what popular media serves us.

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Interestingly, Udaipur on the same evening hosted an international level music festival with artists from all over the world. The event was funded by mining conglomerates like Vedanta. UFS managing to pull even 20 odd people to watch a documentary film on the same date, that caters to masses and not to classes, raises consciousness rather than numbing them down is a positive sign for UFS to march on!

A word about the discussion on WhatsApp group of UFS deserves mention. I raised the concern that maybe we don’t need to do collective screenings because so much interesting stuff that challenges status quo is available to everybody at just a finger sweep. Evidently, watching something together, where responses snowball, consent or dissent gets manufactured much more strongly, all this and secondly, an expert view and suggestions (in this case, CoR) make a huge difference too.

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A date for a screening of next month is tentative – second Sunday of March. A suggestion was made by Shubham, a member of our Udaipur team, for the next screening – Ship of Theasus. The final decision will be made after discussion.

Thanks are due to Megha and Rinku, UFS convenors who coordinated the screening, may they continue to do so! To Saurabh for suggesting the film, Nitesh, and Dharmu and others for provoking us, and Shailendra for being there!  I can thank myself for thanking others!

Pankhuri

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क्या भूलूँ क्या याद करूँ – माणिक उर्फ़ बसेड़ा वाले माडसाब

चित्तोड़गढ़ के साथियों की उदयपुर फिल्म फेस्टिवल के साथ शुरू से दोस्ती-भागीदारी रही है. पहले फेस्टिवल से अब तक हर फेस्टिवल में दोस्तों-शुभचिंतकों-फिल्म के दीवानों का एक समूह शिरकत करता ही है. पहले फेस्टिवल से लौटते ही इन साथियों ने चित्तौडगढ़ फिल्म सोसाइटी का भी गठन कर लिया जो समय समय पर चित्तौड़ में फिल्म शो और परिचर्चा के सार्थक आयोजन करते रहते हैं. इस टोली का अभिन्न चेहरा हैं माणिक उर्फ़ बसेड़ा वाले माड़साब. जी हाँ, मानिक शिक्षक के रूप में इस समय बसेड़ा में अध्यापन कर रहे हैं और उनके अभिनव प्रयोगों के लिए बहुत सारे शिक्षाशास्त्री उनके ब्लॉग को देखते हैं, आप भी देख सकते हैं. इसके अतिरिक्त साहित्य केन्द्रित वेब मैगज़ीन  ‘अपनी माटी’ के लिए भी उन्हें जाना जाता है.

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माणिक भाई ने उदयपुर फिल्म फेस्टिवल की यादों को हमारे आग्रह पर समेटा है. और हाँ, आज उनका जन्मदिन भी है ! बहुत बहुत बधाई माणिक भाई !

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जब चारेक साल पीछे मुड़कर देखता और खासकर सोचता हुआ देखता हूँ तो पाता हूँ कि सिनेमा को लेकर ठीकठाक समझ बनाने में मेरी सबसे ज्यादा मदद अगर किसी ने की है तो ‘प्रतिरोध के सिनेमा’ ने की है। अब तक मुख्यधारा का एकरसता पैदा करता हुआ व्यावसायिक सिनेमा ही हमारे केंद्र में था। जब इस सिनेमा केन्द्रित अभियान और बल्कि कहना चाहिए आन्दोलन की चपेट में हम भी आए तो सबसे अव्वल इसके राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी से मेल-मिलाप हुआ। यह समय साल दो हज़ार तेरह का रहा होगा जब हमारे वरिष्ठ साथी लक्ष्मण जी व्यास ने संजय भाई का एक लंबा इंटरव्यू किया था। तब बातचीत के दौरान बीस मिनट तक रिकॉर्डर का माइक मैंने ही थामकर रखा था। वो पल इस प्रतिबद्धताभरे आन्दोलन में मेरे दाख़िले के पल थे। बाद के समय में हिमांशु भैया और प्रग्न्या भाभी से परिचय हुआ जो कमोबेश कुछ प्रगाढ़ ही हुआ। इन नए रिश्तों में मैंने जो सहजता और सादगी महसूसी वह अद्भुत और प्रेरक थी। बात आगे लिखूं तो कहना चाहता हूँ कि उदयपुर फ़िल्म सोसायटी के तमाम युवा और युवतर साथियों की सामूहिकता बढ़ी खुशी-प्रदायक अनुभव हुई। हालाँकि मैं स्पिक मैके जैसे सांस्कृतिक आन्दोलन में युवाओं के साथ संगत और सक्रियता का एक दशक गुज़ार चुका था मगर फिर भी इस टोली के साथ हिमांशु भैया और प्रज्ञा भाभी के निर्देशन और संयोजन का कायल हो गया था। यहाँ कि खुशबू कुछ भिन्न किस्म की थी। ‘प्रज्ञा’ शब्द यह जानते हुए भी लिखा कि यह एकदम ग़लत है क्योंकि यही शब्द हमारी ज़बान पर चढ़ा हुआ है जो अब आमफ़हम भी है। समानान्तर, प्रतिरोध, वैकल्पिक जैसी संज्ञाएँ और ऐसी परिभाषाओं से लबरेज सिनेमा की समझ क्या होती है और यों कहें इसका ककहरा इसी सोसायटी के शुरुआती फेस्टिवल में सीखा और आगे प्रचारित किया था। यही वो सोसायटी है जिसने हमें शैलेन्द्र सिंह भाटी और धर्मराज जोशी जैसे मित्र दिए। सुधा चौधरी जी जैसी सक्रिय  सामाजिक कार्यकर्ता और प्रोफ़ेसर से मिलाया।

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पाँचवें फिल्म फेस्टिवल में प्रेमचंद गाँधी, डॉ. राजेश चौधरी और माणिक

उदयपुर में अब तक हो चुके चार फ़िल्म फेस्टिवल में मैं लगभग हर बार हिस्सेदारी करने गया ही था। एक अजीब आकर्षण हमेशा मौजूद रहा कि मैं येनकेन प्रकारेण उदयपुर चला ही गया। बाद के वर्षों में इन्हीं लोगों से फीचर और डॉक्युमेंट्री फ़िल्मों का एक बड़ा आर्काइव भी एकत्रित किया। उदयपुर जाने में मैं कभी अकेला और कभी दुकेला था। और हाँ कभी-कभी अपनी हमविचार टोली के साथ भी। यही वो सिनेमा यात्रा थी जिसके प्रभाव में आने के बाद हमने एक साल चित्तौड़गढ़ में भी एक दिवसीय आयोजन भी रखा। एक ही दिन में तीन आयोजन। लगभग सार्थक दिन था वो। जैसे-तैसे चित्तौड़गढ़ फ़िल्म सोसायटी का गठन भी हुआ और मामला आगे बढ़ा। इन सभी हौसलों के पीछे कहीं न कहीं उदयपुर के साथियों के काम का ताप था। उदयपुर के साथी जिस तल्लीनता से काम करते देखे गए वे मुझे क्या किसी भी बहुधन्धी को प्रेरित कर उसमें जोश पैदा कर सकते हैं। बाद के सालों में हमने शहर में फेसबुक और ब्लॉग आदि आभासी माध्यमों का उपयोग करते हुए इस आन्दोलन को आगे ही बढ़ाया। काम करने की स्टाइल और विचार का स्रोत कम या ज्यादा कहें उदयपुर के इर्दगिर्द ही रहा। यह उदयपुर टीम ज़मीन के साथ ही अब फेसबुक और ब्लॉग के माध्यम से भी बहुत दूर तक अपने सन्देश पहुँचा पा रही है हमें इस बात की बड़ी खुशी है। बहुत बाद में लगा उदयपुर जैसे लोकप्रिय शहर को इस जन सरोकार टोली ने इस सिनेमा केन्द्रित ज़रूरी आयोजन के बहाने बहुत बड़ा उपहार दिया है। कभी भूल नहीं पाएंगे कि यहीं हमने देश के प्रतिबद्ध फ़िल्मकार आनंद पटवर्धन को सुना और अभिप्रेरित हुए हैं। सूर्य शंकर दाश, बेला नेगी हो या फिर कोई और। सभी के अभियानों से परिचय इसी आन्दोलन ने कराया है। इस सोसायटी की कई और खासियतें हैं जैसे पोस्टर प्रदर्शनी, मंथली फ़िल्म स्क्रीनिंग, फ़िल्म क्लब निर्माण। वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर इन युवाओं के बीच चिंतन और वाद-विवाद के कई सिलसिलों का साक्षी भी हूँ क्यों कि कुछ समय मुझे इनके वाट्स एप ग्रुप में भी रहने का मौक़ा मिला। असल में यह सिनेमा यात्रा एकदम जुदा किस्म के सफ़र पर ले जाती है।

‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ जैसे शीर्षक के लिए हरिवंश राय बच्चन से माफी मांगते हुए कहना चाहता हूँ कि इस सोसायटी के साथ हमारा एक अपनापा सा हो गया है। जहां भूलने लायक कुछ है नहीं सबकुछ यादों में सहेजने का मन करता है फिर भी कुछ तो याददाश्त की कमज़ोरी लील ही जाती है। हमें संजय काक और नकुल सिंह सहाने जैसे हस्तक्षेप करने वाले लोगों के काम से रू-ब-रू कराने का जिम्मा इसी सोसायटी ने निभाया था। यहीं कुछ अलग किस्म कि किताबों के मेले से एकमेक करवाया। यहीं से संवाद की संस्कृति की झलक भीतर तक अनुभव कर पाए। यहीं आकर जाना कि तमाम दौड़ाभागी के बीच भी अगर मन हो तो किन्हीं तीन दिन को सार्थक तीन दिन में तब्दील किया जा सकता है। इसी सोसायटी की मेहनत थी जिसने हमें भरोसा दिया और हम चित्तौड़गढ़ के साथ ही भीलवाड़ा और अजमेर तक के साथियों को फेस्टिवल में खींच लाए। बलराज साहनी की ‘गरम हवा’ और  हनीफ भाई की ‘कैद’ जैसी फ़िल्में हमारे दिल में समा पाई इसका क्रेडिट उदयपुर के इन्हीं साथियों को जाता है। हाँ एक बात तो लिखने से चूक ही जाता कि हमने जनगीतों की समझ यहीं से ली और उसे आगे बढ़ाते हुए अपने शहर में एक शाम जन गीतों के नाम भी रखी। उदयपुर के साथियों का चित्तौड़ आकर गाया गया शैलेन्द्र का वो गीत आज भी याद है जिसके बोल थे ‘तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत में यकीन कर’।

इन बीते चारेक सालों के सभी फेस्टिवल में इस सोसायटी ने लगातार खुद को साबित किया है और आई हुई मुश्किलों का हिम्मत से सामना किया है। इसकी एक और खूबसूरती यह भी रही कि इसमें संयोजक पद पर हर वर्ष बिना किसी हो-हल्ले के नए साथी को मनोनीत करके आन्दोलन को आगे बढ़ाया जाता है और लोकतांत्रिकता ज़िंदा रखा जाता है। जानता हूँ यह बहुत छोटी और तुरत-फुरत में लिखी एक टिप्पणी है मगर फिर भी आखिर में यही कहना नहीं भूलूंगा कि यह आन्दोलन हम सभी की जान है। हम चित्तौड़गढ़ जैसे छोटे शहर इअसे आयोजन नहीं कर पाते हैं मगर अपने कुछ साथी उदयपुर के आयोजन में शामिल होकर थोड़ी सी तसल्ली अपने खाते में मांड ही लेते हैं। पांचवें फेस्टिवल में आने के लिए मन बना लिए गए हैं। आयोजनों की थीम सदैव जनसरोकार से जुड़ी रहती है इस बार भी थीम केन्द्रित इस अवसर को बहुत सारी शुभकामनाएं। सफ़र जारी रहे और हाथ से हाथ जुड़ते रहें। हमसे जितना बन सकेगा सपोर्ट करेंगे ही। गैरबराबरी मुक्त समाज के सपने के लिए आप सभी आगे बढ़े और अपने मुद्दों पर कायम रहें। भारतीय संविधान से मिले अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना हम सभी कि जिम्मेदारी है। यह सामूहिकता जिंदाबाद है और आगे भी जिंदाबाद रहेगी। बेहतर कल के लिए हम साथ हैं।

‘धनञ्जय’ – वो फिल्म जिसने फिर बहस छेड़ी

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बांग्ला फ़िल्म ‘धनंजय’ ने एक न ख़त्म होने वाली बहस को फ़िर से छेड़ दिया है. वह बहस है मृत्युदंड को समाप्त किए जाने की बहस.

मार्च 1990 में कोलकाता की हेतल पारीख अपने घर में मृत पायी गयी. मई 1990 में अपार्टमेन्ट के चौकीदार धनंजय चटर्जी को पुलिस ने उसके गाँव से हेतल पारीख के बलात्कार और ह्त्या के ज़ुर्म में गिरफ़्तार किया. पूरे कोलकाता में इस निर्मम ह्त्या के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त आक्रोश उमड़ा और अपराधी को फांसी की सज़ा देने ले लिए अभूतपूर्व जनदबाव बना. चौदह बरस की कैद के बाद चौदह अगस्त, 2004 को धनंजय को फांसी दे दी गयी.

इस फांसी के ग्यारह साल बाद इन्डियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट, कोलकाता के अध्येता कानूनविदों देबाशीष सेनगुप्ता और प्रबाल चौधुरी ने इस फ़ैसले और पूरे मुक़दमे की प्रक्रिया, गवाहों के बयान और साक्ष्योंका परत-दर-परत विश्लेषण करते हुए अपने अकाट्य तर्कों से यह साबित किया है कि धनंजय अपराधी नहीं था और संभवतः असली अपराधियों को बचाने के लिए उसे फंसाया गया था.

2015 में आयी ‘अदालत-मीडिया-समाज एबोंग धनञ्जयेर फाशी’ इस किताब ने बहुत हलचल मचाई. याद रखना चाहिए कि धनञ्जय ने 14 बरस जेल में बिताए थे जो एक उम्रकैद के बराबर वक्फ़ा है. और इस में यह भी जोड़ लें कि उसने इस में से अधिकाँश समय फांसी के रस्से में झूलती अपनी गर्दन की कल्पना करते हुए बिताया. अब सेनगुप्ता और चौधुरी के ठोस तर्कों को मानकर पलभर को कल्पना करें कि धनंजय निर्दोष था और हिसाब लागाएं कि उसने एक न किए गए अपराध के लिए कितनी गुना त्रासद सज़ा पायी.

यहाँ पर अमरीका के कार्लोस डेलूना के उदाहरण को याद किया जा सकता है. 1983 में डेलुना को वांडा लोपेज़ नामक महिला की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया, दोषी पाया गया और मौत की सजा सुना दी गयी. डेलुना के बार बार निर्दोष होने की गुहार लगाने के बावजूद उसे वहां प्रचलित पद्धति के अनुरूप नींद का इंजेक्शन देकर मृत्युदंड दे दिया गया. बाद में कोलंबिया विश्वविद्यालय के कानूनविदों ने पूरे केस का गहन अध्ययन कर यह साबित किया कि हत्या कार्लोस ने नहीं, उससे मिलते जुलते नाम और कद काठी वाले एक और व्यक्ति ने की थी. पर अब कुछ नहीं  हो सकता था.

दुनिया के 140 देशों में मृत्युदंड नहीं है और वहां अपराधों की दर बढ़ी नहीं है.

दरअसल सच यही है कि हमारे देश में मृत्युदंड दी जाने की निर्भरता तीन ही बातों पर निर्भर करती हैं, पहली – अच्छी कानूनी मदद तक अभियुक्त की पहुँच, दूसरी- अभियुक्त की सामाजिक-आर्थिक हैसियत और तीसरी- फैसला सुनाने वाले न्यायाधीश की अभिरुचि. अपराध की जघन्यता से फांसी का कोई आनुपातिक सम्बन्ध हमारे यहाँ दी गयी सजाओं के आधार पर नहीं बनाया जा सकता. नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के अध्येताओं द्वारा ‘डेथ पेनल्टी रिसर्च प्रोजेक्ट’ के तहत किये गए अध्ययन में सामने आया कि फांसी की सजा पाए कैदियों में बहुतायत गरीब, सामाजिक रूप से पिछड़े और अल्पसंख्यकों की ही रही है. इनमें से अस्सी फीसदी स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं कर सके और आधे नाबालिग होते हुए ही मजदूरी में जुट चुके थे. इनमें से अधिकाँश को सरकार द्वारा वे वकील मुहैया करवाए गए जो आम तौर पर जूनियर, कम काबिल और न रूचि लेने वाले थे. अच्छी कानूनी मदद यानी दक्ष वकील ही यदि फांसी या मुक्ति तय करता है तो यह अपराध की नहीं बल्कि गरीबी की सज़ा ही हुई.

प्रसिद्द अधिवक्ता युग मोहित चौधरी ने दूसरे शाहिद आज़मी स्मृति व्याख्यान में ऐसे अनेक उदाहरण गिनाये थे जहाँ हमारी ‘चुस्त’ पुलिस ने अभियुक्तों से गुनाह क़ुबूल करवा लिया और फिर बाद में असली गुनाहगार पकडे गए. इसी तरह कुछ न्यायाधीश फांसी की सजा में तगड़ा स्ट्राइक रेट रखते हैं, इसलिए किसी के फांसी पाने की सम्भावना इस बात से भी तय होगी कि उसका मुकदमा जस्टिस पसायत के पास पहुंचा है या जस्टिस बालाकृष्णन के पास.

इस सन्दर्भ में पीयूडीआर द्वारा बिहार में 1980 और 1990 के दशक में हुए हत्याकांडों के इतिहास के सन्दर्भ में अलग-अलग फैक्ट फाइंडिंग जांचों के आधार पर बनी रिपोर्ट को भी देखा जा सकता है. बथानी टोला, लक्षमणपुर बाथे जैसे भीषण हत्याकांडों में किसी को मौत की सज़ा नहीं हुई. सबूतों के अभाव में सब बरी और हो गए.

पिछले दिनों आरुषि और हेमराज हत्याकांड बहुत चर्चा में रहा, पहले माता पिता को दोषी मानकर सजा सुनाई गयी. फिर अविरूक सेन की पुस्तक और उस पर आधारित फिल्म ने जांच और उस पर आधारित निर्णय को संदेह के घेरे में ला दिया. अंततः तलवार दम्पती रिहा हुए. हमें नहीं पता, सच क्या है लेकिन यह महत्त्वपूर्ण है कि गलती महसूस होने पर उसे बदल पाना संभव है और ऐसा किया गया. (तलवार दम्पती की सामाजिक हैसियत ने भी कहीं न कहीं उनके पक्ष में जुटने और नए सिरे से तथ्यान्वेषण के लिए लोगों को प्रेरित किया होगा. जो धंनजय के पास नहीं थी.)

पर फांसी के बाद पुनर्विचार संभव नहीं है. धनञ्जय यदि निर्दोष था तो उसकी हत्या का दाग किस पर लगेगा ?

अरिंदम सिल की बंगला फिल्म ‘धंनजय’  नए साक्ष्यों के आलोक में पूरे मामले को नए सिरे से देखती है और एक न हुई बहस की कल्पना प्रस्तुत करती है. इस न हो पायी बहस को देखना और पूरे मामले को गहराई से समझना हमें तत्कालीन आवेग की व्यर्थता तो बताता ही है साथ ही एक विषाद भी गहरा जाता है.

क्योंकि मृत्यु के बाद वापसी संभव नहीं है.

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 27 नवम्बर ( तीसरा दिन )/ 5.15 -7.30 / धनंजय/ अरिंदम सिल/ बांग्ला – अंग्रेजी सबटाइटल्स/ फीचर फ़िल्म/ 2017 / 150 मिनट

 

 

स्याह-सफ़ेद के धुंधलके में

हमारा यह फेस्टिवल ओम पुरी की स्मृति को समर्पित है. पेश है हिमांशु पंड्या का लिखा यह लेख. हिमांशु उदयपुर फिल्म सोसाइटी के सदस्य हैं.

 

ओम पुरी चले गए. मेरे लिए ओम पुरी को याद करना अपने जयपुर के पुराने घर के ब्लैक एंड वाइट टीवी को याद करने सरीखा है. कई घरों में एक टीवी, कुछ समय का प्रसारण, एक चैनल और साप्ताहिक फिल्म. लेकिन कैसा जादुई आकर्षण था उसमें. अन्य सरकारी उपक्रमों की तरह टीवी की भी एक विश्वसनीयता और गरिमा थी. उसी दौर में समान्तर सिनेमा के सारे नाम हमारे लिए घरेलू नाम बने थे. सच तो यह है कि हम मुख्यधारा और समान्तर का कोई भेद भी नहीं जानते थे क्योंकि घर में सिनेमा देखने जाने का कोई रिवाज नहीं था और टीवी पर जो आये वह देखा जाता था. तो हमारे लिए जैसे अमिताभ बच्चन वैसे ओम पुरी.

ओमaakrosh8 - 1 पुरी की पूरी देह अभिनय करती थी. थियेटर ने उन्हें यह अनुशासन सिखाया था. आक्रोश का वह दृश्य याद कीजिये जिसमें वकील बने नसीरुद्दीन शाह लहान्या भीखू को समझा रहे हैं कि वह अपनी बात रखे तो सही. पूरे दृश्य में कैमरा नसीरुद्दीन शाह की तरफ ही है, हम ओम पुरी की पीठ और चेहरे का एक कोना ही देख पाते हैं. उनकी साँसें चल रही हैं लेकिन धौंकनी की तरह नहीं. एक सूत इधर या उधर इस पूरे दृश्य को तेजहीन या मेलोड्रामा का शिकार बना सकता था.दूसरा, यह एक कलाकार का आत्मविश्वास भी दिखाता है. एक कलाकार जो ‘कौन किसका रोल खा गया’ की चिंता  से कई फीट ऊपर था. कहना न होगा कि यह भी थियेटर की ही देन है.थियेटर सिंगल फ्रेम में नहीं चलता है इसलिए आपके सहकलाकार का अच्छा अभिनय आपके अभिनय को भी परवान चढ़ाता है. सामूहिकता बोध के बिना कोई व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं पायी जा सकती. यही कारण है कि यह दोनों अभिनेता एक दूसरे की फिल्मों में छोटी छोटी भूमिकाओं में नज़र आ जाते थे. यहाँ यह याद करना भी दिलचस्प होगा कि ओम पुरी ने गांधी में एक छोटी सी भूमिका की थी लेकिन जब ऑस्कर के नामांकन के समय परदे पर फिल्म की क्लिप चलाई गयी तब वह अविस्मरणीय दृश्य ही दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया था.

‘भारत एक खोज’ में ओम पुरी द्वारा निभाए गए चरित्रों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा – रावण, दुर्योधन, अंगुलिमाल, अलाउद्दीन खिलजी, कृष्णदेव राय, औरंगजेब और अशोक. पाँच तो स्पष्ट रूप से हमारे इतिहास के खल पात्र हैं. खलता का ऐतिहासिक बोझ ढोते हुए ये पात्र हमारी उस इतिहास दृष्टि को परिलक्षित करते हैं जिसमें हम अपने अतीत के अपराधों के लिए कुछ व्यक्तियों को चिह्नित कर शेष परिवेश को मुक्ति देते हैं. यही कारण है कि नेहरू की दृष्टि को फिल्मांकित करते समय श्याम बेनेगल ने सभी प्रमुख खल पात्रों के लिए ओम पुरी को चुना. इसी तरह ओम पुरी ने अशोक को महानता के बोझ से भी मुक्त किया.

Bharat-Ek-Khoj 3यदि आपने ‘भारत एक खोज’ देखा हो तभी आप इस वाक्य का अर्थ समझ सकते हैं. यदि न देखा हो तब भी यह दो किश्तें जरूर ढूंढकर देखें. यहाँ यह रेखांकित करना भी अच्छा रहेगा कि एक अमरीकी पत्रिका को दिए साक्षात्कार में उन्होंने ‘माई सन द फैनेटिक’ के परवेज़ और ‘ईस्ट इस ईस्ट’ के जॉर्ज खान को एक सरीखा बताया. om_puri 12साक्षात्कारकर्ता के लिए यह हैरान कर देने वाला था क्योंकि परवेज़ जहाँ एक आज़ादख्याल चरित्र था वहीं जॉर्ज खान पुरातनपंथ में डूबा,चिडचिडा, झगडालू चरित्र था. उसकी हैरानी को और बढाते हुए ओम पुरी ने जॉर्ज के चरित्र को पूरी सकारात्मकता से रेखांकित करते हुए पूछा कि क्या वह हमेशा ऐसा ही रहा होगा ? सत्तर का दशक इंग्लैंड में एशियाई लोगों के लिए नस्ली भेदभाव और हमलों का दशक था. इंसान अपनी सुरक्षा के लिए किसी न किसी गोलबंदी की ओर जाता है और जब उदारवादी तबके से उसे निराशा मिलती है तब स्वभावतः ‘उसकी’ बिरादरी उसका बाहें खोलकर स्वागत करती है.

 

यह बहुत गहरी बात है. हिंदी फ़िल्में जब किसी वर्ग या समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव या अन्याय के विरुद्ध खडी होना चाहती हैं तब वे उसका एक प्रातिनिधिक अच्छा चरित्र गढ़कर आपकी सहानुभूति को गाढ़ा करने का प्रयास करती हैं. ‘इसके साथ ऐसा क्यों ?’ हमारे मन में सवाल आता है पर सवाल ये है कि इसके ही क्यों किसी के साथ भी ऐसा क्यों ? यदि बात को फिल्म के उदाहरण से कहना हो तो ‘माय नेम इज खान’ के मुकाबले ‘रईस’ बड़ी फिल्म है क्योंकि वह अपने नायक के विचलन दिखाकर आपको असुविधा में डालती है और राजनीतिक रूप से कहना हो तो ‘अच्छा मुसलमान बनाम बुरा मुसलमान’ का द्वैत मूलतः कट्टरपंथी राजनीति के लिए खाद पानी का काम करता है.

बहरहाल, ऊपर के किस्से में आप देखें कि ओम पुरी स्क्रिप्ट से बाहर जाकर अपने चरित्र के ‘वैसा’ होने की जड़ें तलाश रहे थे. मुझे लगता है कि वे प्रत्येक चरित्र के बारे में पहले ये जानने की कोशिश करते थे कि इस स्क्रिप्ट में दिखाई गयी परिधि से बाहर वह पात्र और क्या क्या करता होगा ? वह खाली समय में क्या करता होगा ? उसे कैसी फ़िल्में देखना या गाने सुनना अच्छा लगता होगा. ‘मंडी’ का फोटोग्राफर और ‘आघात’ का ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट दो सर्वथा भिन्न सौन्दर्यबोध वाले चरित्र हैं तो यह उनकी सम्पूर्ण देहयष्टि में दिखता है. ओम पुरी ये तक जानते थे कि उनके किस चरित्र को कितना मुस्कुराना है. ‘आघात’ का नायक जहाँ अपनी सभी प्रतिक्रियाओं में बंधा हुआ है ( सिवा सैद्धांतिक बहसों के, और यह पादटिप्पणी भी आपके विशेष आकर्षण की मांग रखती है ! ) उसकी अभिव्यक्ति में बाधा उसका अनुशासन तो नहीं, वरना कलाकार ओम पुरी तो भावनाओं के प्रकटीकरण में कमतर नहीं थे, दूसरी ओर ‘मंडी’ का फोटोग्राफर भौंडा होने की हद तक वाचाल और टेड़ा मेढ़ा है. ओम पुरी जानते थे कि कहाँ अभिनय करना है और कहाँ ( क्या ) नहीं करना है, पहली विशेषता कईयों में होती है, दूसरी अच्छे अभिनेता की पहचान होती है.

‘अर्धसत्य’ उनके अभिनय का शिखर था. विजय तेंदुलकर, वसंत देव और दिपु चित्रे की कलम ने उस चरित्र को गढ़ा था. अनंत वेलणकर के रूप में हमें एक ऐसा चरित्र मिला जिसमें नायक कहाँ ख़त्म होता था और खलनायक कहाँ शुरू होता था या खलनायक कहाँ लुप्त होता था और नायक कहाँ लौट आता था, पहचानना मुश्किल था, कहीं कहीं तो वह दोनों एक साथ था. सस्पेंड हो जाने के बाद, जब हम उस चरित्र के अँधेरे-उजालों से परिचित हो चुके हैं, जब वह एक फ़ोन बूथ से अपने सहकर्मी को फोन करते हैं तब उनकी बेबसी, खीझ, निराशा, आत्महंता आक्रोश सब घुला मिला नज़र आता है. उनका सहकर्मी ( शफ़ी इनामदार ) मामला सुलझाने के लिए साफ़ इनकार कर देता है पर पैसे-वैसे की मदद का प्रस्ताव रखता है. फीके चेहरे के साथ इस ‘मदद’ के लिए वे ‘थैंक यू सर’ कहते हैं. एक हल्का सा कम्पन. आवाज़ में भी और देह में भी.

इसीलिये हम ओम पुरी से प्यार करते हैं.

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जो कलाकार किरदारों को स्याह सफ़ेद नहीं देखता, वही राष्ट्रीयता के खांचों में कलाकारों को फंसा कर देखने का विरोध करने का माद्दा रख सकता था. लकीरें खींच दी गयी हैं, इस पार-उस पार के लोगों को यकीन दिलाया जाता है कि वे एक दूसरे के दुश्मन हैं पर कमाल तो ये है कि वहां भी बच्चे वैसे ही रोते हैं और माएं वैसे ही डपटती हैं. महादेवी वर्मा ने ‘साहित्यकार की आस्था’ नामक निबंध में लिखा है कि किसी और पेशे में आस्था और कर्म का द्वैत चल सकता है ( मसलन एक लोहार अहिंसा में आस्था रखते हुए भी अच्छी तलवार ढाल सकता है ) पर रचनाकार वृहत्तर आस्था के बिना नहीं लिख सकता. यह बात कलाकार पर भी लागू होती है. ओम पुरी ने ‘गलत वक्त’ पर भी सही बात कहकर इसे साबित किया. वक्त भी गलत था और जगह तो उससे भी ज्यादा गलत थी. अपने को राष्ट्र का स्वयंभू ठेकेदार मानने वाला पत्रकार सैनिक नाम के डंडे से उन्हें हांकता रहा. यह वह दौर था जब फ़िल्मकार बन्दूक की नोक पर बयान दे रहे थे, राजनीति-व्यापार-अनुदान-दुशालों के आदान प्रदान सब चालू थे पर खेल और सिनेमा को राष्ट्रवादी प्रोजेक्ट में बाँध दिया गया था जबकि यही दोनों इन सीमाओं को लांघने की सबसे ज्यादा कुव्वत रखते हैं. यह सब हुआ. ओम पुरी के एक वाक्य को सन्दर्भ से काटकर यूट्यूब के व्यूज से कमाई करने वाली भड़काऊ वेबसाइट्स भड़काऊ शीर्षकों के साथ लाखों लोगों को अपना एजेंडा परोसती रहीं. ओम पुरी के चाहने वाले जैसे क्षमाभावी ( अपोलोजेटिक ) होकर उनके गौरवशाली अतीत की दुहाई देते रहे, उनके लाजवाब अभिनय से हमारे मन में बसी यादगार फिल्मों की याद दिलाते रहे. शायद ये दुहाइयाँ उनके लिए व्यक्तिगत रूप से गहरी निराशा ही लेकर आयी होंगी. ये बताने के लिए अब वे नहीं हैं. इस क्षमाभाव का क्रूरतम रूप यह था कि ऑस्कर अवार्ड्स की शाम उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी पर हमारे यहाँ होने वाले आधा दर्जन सालाना फिल्म पुरस्कार समारोहों में उनका ज़िक्र भी नहीं हुआ. सत्यजित राय की ‘गणशत्रु’ की तरह वे अपनी बिरादरी से धकिया दिए गए.

इस लेख का अंत ऐसे नहीं होना चाहिए था पर खुद ओम पुरी का त्रासद अंत मेरे लिए कोई और गुंजाइश नहीं छोड़ता. जो समाज एक वाक्य के लिए अपने सदस्य के जीवन भर के दाय को भुला देता है, वह धीरे धीरे सच सुनने का गुण खो देता है क्योंकि सच हमेशा आदर्श की परिधि में नहीं कहा जाता, जो सबका ख्याल करके बोला जाए वो सच नहीं समीकरण होता है. गलत तरफ पाए जाने का खतरा उठाकर भी अपनी बात कही जाए, इसी साहस का नाम सच है. इसका दूसरा नाम ईमानदारी है.

पादटिप्पणी : हालांकि एक अभिनेता ने अपनी पूरी फ़िल्मी बिरादरी को इस कृतघ्नता के लिए खुलकर धिक्कारा. उसका नाम नवाज़ुद्दीन सिद्धीकी है.

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 ओम पुरी को याद करते हुए  हमारे साथ देखिये  :

26 नवम्बर (दूसरा दिन )/ 9.30-11.45 / जाने भी दो यारों/ कुंदन शाह/ हिंदी/ फ़ीचर फ़िल्म/ 1983/ 132 मिनट

 

वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गयी

भारत वाचिक परंपरा का देश रहा है. पुराण और पंचतंत्र से लेकर जातक कथाओं तक हमारे यहाँ कहानियां सुनने सुनाने का सिलसिला बहुत पुराना है. यही कारण है कि ईरान में आठवीं सदी में जन्मी दास्तानगोई जब भारत आयी तो उसे हाथों हाथ लिया गया. हमारा मध्यकाल उन कई कई रातों का गवाह है जब दास्तानगो लम्बे लम्बे चलने वाले किस्से को किश्त दर किश्त सुनाते थे और सुनने वाले उस दिलकश अंदाज़ से बंधे हर रात सुनने के लिए इकट्ठे होते थे. मध्यपूर्व में दास्तानगोई में अमूमन जंग और मोहब्बत यही मुख्य विषय होते थे लेकिन भारत में इसमें दो और आयाम जुड़े – तिलिस्म और अय्यारी.

18 वीं – 19 वीं सदी भारत में दास्तानगोई के उरूज़ का समय है. मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था कि हमज़ा दास्तान के आठ अध्याय और शराब के सोलह पीपे – इसके बाद ज़िंदगी से कुछ और नहीं चाहिए !

लेकिन समय बीता. ब्रिटिश शासन में जिन विधाओं को सस्ता और भदेस कहकर हिकारत से नकारा गया, उनमें दास्तानगोई भी थी. मीर बाकर अली इस दास्तानगोई की परंपरा के आख़िरी वारिस थे. 1928 में उनके देहांत के साथ इसका नामो निशान मिट गया.

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21 वीं सदी में इसके पुनः जीवित हो उठने की कहानी भी बड़ी रोचक है. ये न होता यदि शम्सुर्रहमान फ़ारूकी न होते और उससे भी पहले मुंशी नवल किशोर न होते. 19 वीं  सदी के अंतिम दशकों और 20 वीं सदी के शुरूआती दो दशकों में मुंशी नवल किशोर की प्रेस ने इन दास्तानों को छापा था. कुल 46 जिल्द, लगभग 44 हज़ार पृष्ठ और कोई 2 करोड़ लफ्ज़ किताबों में दर्ज होकर यह इन्तेज़ार कर रहे थे कि कोई आये और इन्हें देखे, अपनी रिवायत को पहचाने.

उर्दू के प्रसिद्द आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूकी ने अपने शोध के सिलसिले में कुछ जिल्दों को उल्टा पलटा. वे इनके हैरतअंगेज़ वर्णन से चकित रह गए, फिर उन्होंने इन 46 जिल्दों को ढूँढने का बीड़ा उठाया. हिन्दुस्तान के अलग अलग संग्रहालयों से जुटाकर इन्हें फिर से बटोरा गया और फिर इस कहानी में आये महमूद फ़ारूकी जिन्होंने इन दास्तानों को फिर से पेश करने का इरादा किया.

सन 2005 में दास्तानगोई की पहली प्रस्तुति हुई. प्रस्तुतकर्ता थे महमूद फ़ारूकी और हिमांशु त्यागी. इसे बहुत सराहना मिली और फिर तो सिलसिला चल निकला. महमूद फ़ारूकी और दानिश हुसैन की जोड़ी ने न सिर्फ पुरानी दास्तानों जैसे दास्तान-ए-अमीर हमज़ा को आज के हिसाब से थोडा ढालकर प्रस्तुत किया बल्कि उन्होंने आज के मसाइल को उठाते हुए नई दास्तानें भी लिखीं. बिक्रम बेताल से लेकर विजयदान देथा कृत राजस्थानी लोककथा चौबोली तक सभी कुछ इनका हिस्सा बनीं. विभाजन के दर्द को दास्तान-ए-तकसीम-ए-हिन्द में बयान किया गया तो दास्तान-ए-मोबाइल से लेकर दास्ताने कारपोरेट तक कोई विषय अछूता नहीं रहा. अंकित चड्ढा, हिमांशु बाजपेयी, राणा प्रताप सेंगर, राजेश कुमार नई पीढी के दास्तानगो सामने आये हैं जो अब इस सिलसिले को थमने नहीं देंगे.

‘दास्तान-ए-सेडीशन’, जो हमारे इस फेस्टिवल में प्रस्तुत की जायेगी, 2007 में लिखी गयी थी जब डॉ. बिनायक सेन को राजद्रोह के आरोप में सज़ा हुई थी. बहुत लोकप्रिय हुई इस दास्तान में दास्तानगो, अय्यार अमर ( यानी हीरो )  और जादूगरों के सरदार अफरासियाब ( यानी विलेन ) की कहानी सुनाते हैं. कहानी है कोहिस्तान की और धीरे धीरे इस कोहिस्तान में हमारा वर्तमान भारत घुल मिल जाता है.

अमर और अफरासियाब की इस लड़ाई में होता क्या है, जानने के लिए आपको राणा प्रताप सेंगर और राजेश कुमार की यह नायाब प्रस्तुति देखने आना होगा.

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राणा प्रताप सेंगर और राजेश कुमार

 

26 नवम्बर ( दूसरा दिन ) / 3.45 – 4.45 /  दास्तान-ए-सीडीशन/ लेखन-निर्देशन – महमूद फ़ारूकी / प्रस्तुति – राणाप्रताप सेंगर और राजेश कुमार/ हिंदुस्तानी / 60 मिनट

कहानी की काया और फिल्म की छाया : मनोज रूपड़ा

‘द अदर साइड’ – यह नाम है उस शॉर्ट फिल्म का जो हमारे उद्घाटन सत्र में दिखाई जायेगी. प्रख्यात कथाकार मनोज रूपड़ा  विभिन्न कला माध्यमों पर समय समय पर लिखते रहे हैं. उनका लेखन हमारे सौन्दर्यबोध और यथार्थबोध दोनों को समृद्ध करता रहा है. हम यहाँ उनके लेख ‘कहानी की काया और फिल्म की छाया’ का एक अंश प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें उन्होंने ‘द अदर साइड’ का शॉट दर शॉट सूक्ष्म विश्लेषण कर बताया है कि कैसे कैमरा , कहानी के कथानक को भाषा की गोद से निकालकर एक सजीव काया के रूप में हम तक पहुंचाता है. यह लेख उनकी आधार प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘कला का आस्वाद’ में संकलित है. हम इस अंश की अनुमति देने के लिए लेखक के आभारी हैं.

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फिल्म शाट का मुख्य गुण है हू-ब-बू पन और सीधी इंद्रियग्राह्यता। ‘चारुलता’ के शुरुआती सात मिनट का जिक्र मैंने उसी संदर्भ में किया है अगर चारुलता और उसके पति के बीच कोई संवाद होता और अगर वह अपने अकेलेपन की तकलीफ को शब्दों में व्यक्त करती तो उसका प्रभाव दर्शकों पर उतनी गहराई से न पड़ता। चारुलता की उस वक्त की भंगिमाओं और क्रिया-कलापों को कैमरा जब शाट के फ्रेम में दर्ज कर रहा होता है तब हमें इसे इस रूप में देखें कि साहित्यक कथानक और उसकी विषय-वस्तु के ताने-बाने को, जो भाषा की गोद में छुपा हुआ था, कैमरा उसका सीधा चित्रीकरण करते हुए उसे भाषा की गोद से निकालकर एक सजीव काया के रूप में सामने रख रहा है – एक ऐसी सजीव काया जो छाया से निर्मित हुई है।

फिल्म के इन मूलभूत गुणों हू-ब-हू पन और सीधी इंद्रियग्राहयता की क्षमता को अगर हम और अधिक सूक्ष्म रूप से देखना चाहें तो उसे लघु फिल्मों में और अधिक गहराई से देखा जा सकता है क्योंकि लघु फिल्में आमतौर पर मूक होती है उसमें कोई संवाद नहीं होता सिर्फ पटकथा होती है और उस पटकथा के अंदर जो छुपा हुआ कथ्य होता है वह अपने आप में किसी महागाथा से कम नहीं होता। ‘द अदर साइड’ और ‘आर्डर’ ऐसी ही फिल्में है।

सबसे पहले हम यहाँ ‘द अदर साइड’ की संक्षिप्त शॉट सूची प्रस्तुत करते हैं –

शॉट नं. 1-

फिल्म शुरू होते ही पार्श्व में एक अजीब-सी बेचैनी और डर पैदा करने वाली थीम ट्यून सुनाई देती है। फिर एक लंबी गली को ऊँचे कोण से दिखाया जाता है। गली में दोनों तरफ खड़ी इमारतों की पथरीली

the other side 3दीवारों पर दोनों हाथ टिकाए सैकड़ों लोग खड़े हैं। ये लगभग हैंड्स अप की मुद्रा है। सैकड़ों निहत्थे लोग दीवार पर अपने हाथ रखे धीरे-धीरे सरक रहे हैं।

शॉट नं. 2-

फिर कैमरा लो एंगल के एक ट्रेक शॉट में गली की पथरीली जमीन पर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है और एक लाश की खुली आँखों से पैर तक के दृश्य को क्लोज में दिखाते हुए आगे बढ़ जाता है।

शॉट नं. 3-

कैमरा एक बार फिर कट कर के दीवार पर सरकते हाथों को दिखाता है। उन हाथों के बीच एक निश्चित दूरी थी। कोई भी हाथ किसी दूसरे हाथ के इतना करीब नहीं था कि किसी भी तरह का स्पर्श संभव हो सके।

शॉट नं. 4-

कैमरा एक टूटी हुई दीवार के पीछे से कुछ चेहरों का करीब से अवलोकन करता है। उनमें से एक आदमी अपने किसी परिचित को देखकर अपनी भौंहें उठाकर कुछ अभिव्यक्त करता है।

(आफ स्क्रीन से बंदूक की गोली की आवाज)

भौंहें उठाकर किसी दूसरे को देखने वाला पीठ पर गोली खाकर सड़क पर गिर पड़ता है। (फिल्म का पहला संकेत – किसी भी तरह की अभिव्यक्ति की यहाँ गुंजाइश नहीं है। अगर कोई चुपके से भी किसी को विश करेगा तो उसका अंजाम है मौत।

शॉट नं. 5-

कैमरा एक बार फिर हाथों पर। कुछ देर बाद एक काला पुरुष हाथ निर्धारित गति का उल्लंघन करते हुए चोरी छुपे एक गोरे स्त्री हाथ के करीब पहुँचता है आदमी के दूसरे हाथ में शादी की अँगूठी है ठीक वैसी ही अँगूठी स्त्री के हाथ में भी है।

शॉट नं. 6-

कैमरा अब और ज्यादा जूम करके उन हाथों को क्लोज में लेता है, जैसे कोई बहुत तेज निगाहों से उन हाथों को देख रहा हो। जैसे ही पुरुष हाथ की अँगुली स्त्री हाथ की अँगुली को छूती है, एक गोली की आवाज आती है और अगले ही पल काले आदमी की लाश गली में पड़ी दिखाई देती है (दूसरा संकेत – किसी भी तरह के मानवीय स्पर्श की भी यहाँ अनुमति नहीं है)

शॉट नं. 7-

गली में सरकते लोग एक पल के लिए रुक जाते हैं और सब अपनी गर्दन मोड़कर पहले उस काले आदमी की लाश को देखते हैं फिर सबकी निगाहें उठ जाती है, कुछ देर वे टकटकी लगाए उस ”आफ स्क्रीन” गोली चलाने वाले को देखते हैं फिर सब दीवार की तरफ मुँह फेर लेते हैं और चुपचाप सरकने लगते हैं।

शॉट नं. 8-

गली में पड़ी लाशों का एक सामान्य-सा दृश्य। जैसे किसी चीज की गिनती की जा रही हो। सड़क में पड़ी लाशों के पार्श्व में चुपचाप सरकते पैरों का धुँधला-सा दृश्य।

शॉट नं. 9-

तभी लाइन में से एक आदमी अचानक बाहर आता है। जैसे उसे कोई दौरा पड़ गया हो। वह बिना किसी अंजाम की परवाह किए सीधे गली के बीचों-बीच सीना तानकर खड़ा हो जाता है। उसे कुछ देर खड़ा रहने दिया जाता है। यह अंदाजा लगाने के लिए कि उस आदमी के दुस्साहस की भीड़ में क्या प्रतिक्रिया होती है।

शाटॅ नं. 10-

दीवार से चिपककर सरकते आदमी चलना बंद कर देते हैं और पीछे मुड़कर उस निडर आदमी को देखते हैं।

शॉट नं. 1the other side 21-

(कैमरा आँख के लेवल पर) निडर आदमी उसकी आँख में आँख डालकर आगे बढ़ता है।

(आफ स्क्रीन बंदूक की आवाज) वह गिर पड़ता है।

शॉट नं. 12-

भीड़ में से एक साथ चार-पाँच लोग आगे बढ़ते हैं जैसे उन्हें कोई सामूहिक दौरा पड़ गया हो। (गोली की आवाज) पहला आदमी गिरता है। लेकिन कोई रुकता नहीं (गोली की आवाज) दूसरा आदमी गिरता है। लोग और बड़ी संख्या में आगे बढ़ते हैं (गोली की आवाज) तीसरा आदमी गिरता है लेकिन लोगों का सड़क पर उतरना तब तक जारी रहता है जब तक सड़क खचाखच भर नहीं जाती। अब वे लोग लगातार आगे की ओर बढ़ रहे हैं। कैमरे की आँख में आँखें डाले।

शॉट नं. 13

आत्मविश्वास से भरे इन चेहरों का करीब से अवलोकन। उनकी आँखों में न तो कोई खौफ है न आक्रोश। वे उस अदृश्य संहारकर्ता की तरफ निगाहें उठाए कुछ इस तरह चल रहे हैं जैसे वे इस इरादे के साथ चल रहे हों कि या तो मर जाएँगे या इस गली से बाहर निकल जाएँगे। बंदूक कुछ देर खामोश रहती है। फिर ”ऑफ स्क्रीन” से मशीनगन की आवाज। सिर्फ चेतावनी। कि अब बंदूक की जगह मशीनगन का इस्तेमाल हो सकता है।

शॉट नं. 14-

समूह आगे कूच कर रहा है। मशीनगन अब भी खामोश है। कुछ देर के लिए यह भ्रम होता है कि पीड़ितों का यह सामूहिक प्रयास सफल हो जाएगा और वे उस गली से बाहर निकल जाएँगे। लेकिन मशीनगन की यह खामोशी उस अदृश्य संहारकर्ता की रणनीति का हिस्सा थी। उसने पूरे समूह पर तड़ातड़ गोलियाँ बरसाने के बजाए अब एक व्यक्ति को चुन लिया। धीरे-धीरे कैमरा ऊपर की ओर उठ रहा है। लोगों का लगातार आगे बढ़ने का क्रम जारी है। कैमरा भीड़ में किसी एक आदमी पर स्थिर दृष्टि डालता है। कैमरा समूह से उस चेहरे को काटता हुआ उसका टाइट क्लोज अप लेता है। भय से डरा-सहमा आदमी कैमरे के फ्रेम से अलग हो जाता है। इस अकेले आदमी के विचलन से कुछ और लोगों का चलना संदिग्ध हो गया। कैमरा अब उन्हीं लोगों को समूह से अलग करता है, जो अनिश्चितता की वजह से डगमगाते हुए आगे बढ़ रहे हैं।

(आफ स्क्रीन से मशीनगन से गोलियाँ चलने की आवाज)

अनिश्चित और विचलित लोग तुरंत दीवार की ओर चले जाते हैं। फिर लगातार मशीनगन चलने की आवाज। बीच सड़क से समूह तितर-बितर होकर किनारे खिसक रहा है। गोलियों की बौछार के बीच लोग दौड़कर किनारे होते जा रहे हैं। फिर वे एक लाइन बनाकर दीवार के साथ चलने लगे। पूर्ववत। कैमरा गली में पड़ी लाशों के ऊपर से बिना कहीं ठहरे गुजर गया, यह उस संहारकर्ता की नजर है जिसकी रुचि मरे हुए लोगों में नहीं डरे हुए लोगों में है।

शॉट नं. 15-

(कैमरा ठीक एक नंबर शॉट की तरह उसी एंगल और उसी ऊँचाई पर) दीवार से सटी डरे हुए लोगों की कतार ठीक वैसे ही सरक रही है, दीवार से अपने हाथ चिपकाए, जैसे हमने उसे पहले शाट में देखा था।

पार्श्व में फिर वही बेचैन कर देने वाली थीम ट्यून सुनाई देती है और स्क्रीन पर लिखा दिखाई देता है – सन् 1961

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सात मिनट की इस फिल्म की जो शॉट लिस्ट यहाँ प्रस्तुत की गई है, उसके आधार पर हम एक और लिस्ट तैयार कर सकते हैं – प्रेम, जान-पहचान, स्पर्श, स्पंदन, सहानुभूति, सहिष्णुता, मानवीय सरोकार, किसी भी तरह की निजी अनुभूति या निजी अभिव्यक्ति या किसी भी तरह की सामूहिकता या एकता या किसी भी तरह की सांस्कृतिक विविधता… ये सब उस अदृश्य संहारकर्ता की बंदूक के निशाने पर है, जो ‘अदर साइड’ में है।

फिल्म कहीं से भी यह संकेत नहीं देती कि वह कौन से देश की कौन-सी गली थी, जिसमें इतने सारे लोगों को बंधक बना लिया गया था। जो लोग बंधक बनाए गए थे उनकी कोई ऐसी पहचान भी कहीं उभरकर नहीं आती, कि वे किसी खास देश या नस्ल या संप्रदाय के नागरिक हैं।

यह जो मिली जुली पहचानों वाली नागरिकता है, जिसमें काले अफ्रीकी गोरे यूरोपीय, साँवले एशियाई सब शामिल हैं, जब हम इतनी विविध पहचानों को एक साथ एक ही गली में घिरा हुआ देखते हैं तब यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होता कि यह कोई ऐसी गली नहीं है, जिसे हम तथ्यात्मक रूप से किसी देशकाल के संदर्भ में पहचान सकें और अदर साइड से गोलियों की बौछार करने वाला भी किसी एक देश या नस्ल, या संप्रदाय का दुश्मन नहीं है, उसकी गोलियाँ सब को समान रूप से अपना शिकार बनाती है।

फिल्म हमारे सामने यह सवाल रखती है और हमारे विवेक को चुनौती देती है कि हम सन 1961 की उस ‘गली’ को किस रूप में देखें। अगर अस्तित्ववादी नजरिए से देखा जाए तो यह वही दशक था, जब मनुष्य ने पहली बार अपनी निजी स्वतंत्रता के महत्व को समझा था और पहली बार उसे महसूस हुआ था कि व्यवस्था चाहे प्रजातांत्रिक हो या समाजवादी हर तंत्र में कहीं न कहीं एक बंद गली है और हर व्यवस्था में एक अदृश्य नियामक ताकत होती है, जो मनुष्य से उसकी निजी अनुभूतियों और उसकी सहजवृत्तियों को छीनकर उसे तंत्र के अनुकूल बनाने की कोशिश करती है।

लघु फिल्मों के कथ्य की सबसे बड़ी विशेषता यही है। वह अपनी बात किसी खास संदर्भ में या किसी निश्चित अर्थ के जरिए नहीं कहती। वह सिर्फ एक तरह का वातावरण रचती है और दर्शकों के विवेक को चुनौती देती है कि वह खुद कल्पना करे कि ऐसी कौन-सी गली है, जिसमें सबको एक साथ घेर लिया गया है और वह कौन है, जो बिना किसी जातीय या सांप्रदायिक या नस्ली भेदभाव के सबको अपना शिकार बना रहा है। ज्यादा बारीकी से सोचने की जरूरत नहीं है अदर साइड में जो अदृश्य ताकत है उसके लिए इस गली के सभी लोग अपनी विविध पहचानों को खोकर एक ”वर्ग” में बदल गए हैं। एक ऐसा वर्ग जो निहत्था है, जिसने अपने हाथ दीवार के सामने आत्मसमर्पण के लिए उठा दिए हैं।

सवाल उठाया जा सकता है कि इस तरह के फिल्मांकन में तथ्य को छिपाने या उसे अदर साइड में गोपनीय रखने का क्या औचित्य है? अगर फिल्मकार का उद्देश्य किसी खास सत्य की खोज से है तो वह अपने खोजे हुए सत्य को प्रेक्षक के सामने क्यों नहीं रखता?

मारियो वर्गास योसा ने गोपनीय तथ्यों की इस ‘खामोशी’ और अभिव्यक्ति के व्यक्त हिस्सों के द्वंद्व को बड़ी खूबसूरती से अपनी किताब ‘युवा उपन्यासकार के नाम खत’ में रखा है। उनका मानना है कि ‘जब किसी कथा में वाचक टुकड़े-टुकड़े में कुछ कहते हुए बार-बार गायब हो जाता है, तब वह पाठक को यह अवसर देता है कि वह अनुपस्थित सूचनाओं के लिए अपनी कल्पना का इस्तेमाल करे और उन रिक्त स्थानों की पूर्ति अपनी खुद की कल्पनाशक्ति और अपने यथार्थ बोध से करे।’उन्होंने इस तकनीक को ‘छुपे हुए तथ्य’ की तकनीक का नाम दिया था और हेमिंग्वे की मशहूर कहानी ‘किलर्स’ तथा बोर्खेस की ‘द सिक्रेट मिरेकल’ का जिक्र करते हुए यह समझाने की कोशिश की थी कि घटना के छुपे हुए तथ्य या कथ्य के लुप्त अंश कभी अर्थहीन या मनमाने नहीं होते बल्कि वेव्यक्त किए गए तथ्य से भी ज्यादा महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण होते हैं।मनोज रूपड़ा

लेखक के बारे में : प्रख्यात कथाकार मनोज रूपड़ा के दो कहानी संग्रह ‘दफन तथाअन्य कहानियाँ’,  ‘साज-नासाज’ और एक उपन्यास ‘प्रति संसार’ आ चुका है. वे प्रथम नागपुर फिल्म फेस्टिवल में मुख्य वक्ता थे.

25 नवम्बर ( पहला दिन )/ 12.30-1.00/ दी अदर साईड / जोसेफ़ डेलेऊ / संवाद रहित (बेल्जियम)/ ब्लैक एंड व्हाइट/ शॉर्ट फ़िल्म / 1966/ 10मिनट

अटकती साँसें, हाँफता देश

इस बालदिवस पर गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुई बच्चों की मृत्यु की दास्ताँ को फिर से याद करना बहुत ज़रूरी है. सच तो ये है कि ये मौतें हादसा नहीं हत्या थी और हत्याएं ज़ारी हैं. अगस्त के दूसरे सप्ताह में सारा देश क्षोभ और हैरत के साथ इन नौनिहालों की मौत के बारे में पढ़ और देख रहा था पर सब को ये नहीं पता था एक पत्रकार इस आपदा की चेतावनी पहले से दे रहा था .

वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह अपने पोर्टल ‘गोरखपुर न्यूज़ लाईन’ पर लगातार इस बारे में लिख रहे थे. मनोज पिछले एक दशक से इन्सिफेलाईटिस के प्रकोप और हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की नाकामी के बारे में काम करते और लिखते रहे हैं.

मनोज जन संस्कृति मंच के महासचिव हैं और ‘प्रतिरोध का सिनेमा‘ के हरावल दस्ते के सदस्य हैं. हमारे पांचवे फिल्म फेस्टिवल में मनोज सिंह व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे: ‘अटकती सासें हांफता देश’

प्रस्तुत है अगस्त के दूसरे खौफनाक हफ़्ते की आँखों देखी एक्स्क्लूजिव रिपोर्ट मनोज सिंह की कलम से

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दस अगस्त की सुबह 11.20 बजे बीआरडी मेडिकल कालेज के नेहरू अस्पताल में लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई का इंतजाम देखने वाले आपरेटर कृष्ण कुमार, कमलेश तिवारी, बलवंत गुप्ता लिक्विड मेडिकल आक्सीजन प्लांट पर रीडिंग लेने पहुंचे। प्लांट की रीडिंग 900 देखते ही चैंक गए। इसका मतलब था कि 20 हजार लीटर वाले आक्सीजन प्लांट में सिर्फ 900 केजी लिक्विड आक्सीजन उपलब्ध थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। पांच हजार तक रीडिंग पहुंचते ही लिक्विड आक्सीजन लिए टैंकर आ जाता था और प्लांट को रिफिल कर देता था। उन्होंने फौरन हाथ से बाल रोग विभाग की अध्यक्ष को पत्र लिखा और उस पर अपने हस्ताक्षर बनाए। पत्र की काॅपी प्राचार्य, बीआरडी मेडिकल कालेज से सम्बद्ध नेहरू अस्पताल के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक, एनेस्थीसिया विभाग के अध्यक्ष और नोडल अधिकारी एनआरएचएम मेडिकल कालेज को भी भेजी।
उन्होंने लिखा -‘ हमारे द्वारा पूर्व में तीन अगस्त को लिक्विड आक्सीजन के स्टाक की समाप्ति के बारे में जानकारी दी गई थी। आज 11.20 बजे की रीडिंग 900 है जो आज रात तक सप्लाई हो पाना संभव है। नेहरू चिकित्सालय में पुष्पा सेल्स कम्पनी द्वारा स्थापित लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई पूरे नेहरू चिकित्सालय में दी जाती है। जैसे कि-टामा सेंटर, वार्ड संख्या 100, वार्ड संख्या 12, वार्ड 6, वार्ड 10, वार्ड 12, वार्ड 14 व एनेस्थीसिया व लेबर रूम तक इससे सप्लाई दी जाती है। ‘ पुष्पा सेल्स कम्पनी के अधिकारी से बार-बार बात करने पर पिछला भुगतान न किए जाने का हवाला देते हुए लिक्विड आक्सीजन की सप्लाई देने से इंकार कर दिया है। तत्काल आक्सीजन की व्यवस्था न होने पर सभी वार्डों में भर्ती मरीजों की जान का खतरा ……। अत: श्रीमान जी से निवेदन है कि मरीजों के हित को देखते हुए तत्काल आक्सीजन लिक्विड आक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित कराने की कृपा करें।’
‘ खतरा ’ लिखने के बाद इन आपरेटरों के हाथ कांप गए थे। वे जानते थे आक्सीजन खत्म होने का क्या अंजाम हो सकता है। शायद इसीलिए उनसे आगे कुछ लिखा नहीं गया। उन्हें उम्मीद थी कि खत पहुंचते ही साहब लोग एक्टिव हो जाएंगे और लिक्विड आक्सीजन मंगा लेंगे या उसके विकल्प में आक्सीजन सिलेण्डर की व्यवस्था कर देंगे।
लेकिन आपरेटर नही जानते थे कि एक दूसरे ढंग की खतो खिताबत भी चल रही थी। यह उन लोगों के बीच थी जो  ‘आक्सीजन लेने-देने’ में विशेषज्ञ हैं। यह खतो खिताबत लिक्विड आक्सीजन सप्लाई करने वाली कम्पनी पुष्पा सेल्स प्राइवेट लिमिटेड के बीच छह माह से चल रही थी। मसला यह था कि कम्पनी का बकाया 70 लाख तक पहुंच गया था और उसे मेडिकल कालेज की ओर से भुगतान नहीं मिल रहा था। कम्पनी कह रही थी कि स्थितियां उसके नियंत्रण से बाहर चली गई है। लिहाजा वह लिक्विड आक्सीजन सप्लाई नहीं कर पाएगी। इस मसले का हल एक ताकतवर सरकार और उसके अफसर जो गोरखपुर से लखनउ तक बैठे थे, नहीं निकाल सके।
जो खतरा इन आपरेटरों ने देख लिया था, उसे ये सभी ताकतवर लोग बेखबर बने रहे। ये इतने बेखबर थे एक रोज पहले इसी मेडिकल कालेज में ढाई घंटे तक इंसेफेलाइटिस व अन्य रोगों से बच्चों की मौत पर मंथन करते रहे लेकिन उन्हें यह पता तक नहीं चल सका कि उनके बैठके से 100 मीटर दूरी पर आक्सीजन का मीटर शून्य की तरफ खिसकता जा रहा है। इस गहन मंथन में जादुई निष्कर्ष यह निकला था कि इंसेफेलाइटिस के लिए गंदगी जिम्मेदार है और वे गंदगी खत्म कर इसे भी खत्म कर देंगे। इसके बाद सबने स्वच्छ भारत अभियान का नारा लगाया।
दस तारीख की रात घड़ी की सुईयों ने जैसे ही साढ़े सात बजाए, लिक्विड आक्सीजन का प्रेशर कम होने का संकेत होने लगा। उस वक्त सिर्फ 52 आक्सीजन सिलेण्डर थे। उसे जोड़ा गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 100 बेड के इंसेफेलाइटिस वार्ड में इंसेफेलाइटिस से ग्रस्त बच्चों, जन्म के वक्त संक्रमण व अन्य बीमारियों के कारण भर्ती हुए नवजात तथा वार्ड संख्या 14 में भर्ती वयस्क मरीजों की जान जाने लगी। शाम साढ़े सात बजे से 11 बजे तक आठ बच्चों की जान चली गई। अगले दिन दोपहर तक कोहराम मच गया। 24 घंटे में 25 और जाने चली गईं।
यह खबरें मीडिया के जरिए सार्वजनिक हुईं तो लोग गम में डूब गए। सोशल मीडिया उनके दुख और क्षोभ की अभिव्यक्ति का मंच बनने लगा।

gorakhpur tragedy 2

दम तोड़ती संवेदना

और इसी वक्त वे किरदार फिर नमूदार हुए जिन्होंने इंसेफेलाइटिस के खात्मे का दो दिन पहले समाधान ढूंढ लिया था। कैमरे के चमकते फलैश के बीच कागजों को उलटते-पुलटते सबसे पहले जिले के सबसे बड़े हाकिम ने घोषणा की कि आक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई। वैकल्पिक इंताजम पूरे थे। मौतों की यह संख्या ‘ सामान्य ’ है। यहां 18-20 मौतें तो हर रोज होती रही हैं। फिर भी हम जांच करेंगे। चार अफसरों की कमेटी बना दी है। कोई जिम्मेदार पाया जाएगा तो सख्त कार्रवाई होगी। जब हाकिम यह बात कह रहे थे तो उनके कमरे के बाहर कुशीनगर जिले के रामकोला की संगीता और उसकी बेटी दहाड़े मार रो रही थीं। संगीता के सात दिन के नाती की मौत हो गई थी। बच्चा नियोनेटल वार्ड में पड़ा था। एक दिन पहले ही वह आया था। मां-बेटी की चीख डीएम के प्रेस कांफ्रेस के कमरे तक पहुंच रही थी और मीडिया को ब्रीफिंग में दिक्कत आ रही थी। दरवाजा बंद करने का आदेश हुआ लेकिन चीखें दरवाजा और मेडिकल कालेज की दीवारें पार कर अंदर पहुंचती रहीं।
अगले दिन सरकार के दो-दो मंत्री आए। आते ही वे दो घंटे तक बैठक के लिए एक कमरे में बंद हो गए। बाहर टीवी चैनलों के कैमरे उनका इंतजार कर रहे थे। इधर वार्ड में मौत का तांडव जारी था। विजयी की बेटी शांति और विजय बहादुर का बेटा रोशन की जान जा चुकी थी। डाॅक्टर इसलिए शव नहीं दे रहे थे कि वार्ड माओं की चीखों से गूंजने लगेगा और इसी दौरान मंत्री आ जाएं तो उन्हंे अच्छा नहीं लगेगा। टीवी वाले भी इनकी मौत का ‘ तमाशा ’ बनाएंगे।
दोनों मंत्री घंटे बैठक के बाद निकल तो एक के हाथ बहुत से कागजात थे तो दूसरे के हाथ में एक आर्डर। कागजात वाले मंत्री ने मीडिया को बताया कि मैने दो वर्ष के अगस्त महीने के रिकार्ड देखे हैं। इन महीनांे में 500-600 मौतंे हो जाती हैं। यह ‘ सामान्य ’ है। इस वर्ष आंकड़े बढ़े नहीं हैं। दूसरे मंत्री ने कहा कि आक्सीजन संकट में प्रिसिपल की लापरवाही है। उन्हें सस्पेंड किया जाता है। उन्होंने नौ अगस्त की मीटिंग में मुख्यमंत्री के समक्ष आक्सीजन सप्लाई करने वाली कम्पनी को भुगतान न करने का मामला उठाया नहीं था। मुख्यमंत्री इससे अवगत नहीं थे। ’
इसके बाद ही प्रिसिंपल का त्यागपत्र मीडिया में आता है जिसमें उन्होंने लिखा है कि बच्चों की मौत में उनकी कोई गलती नहीं हैं। वह बच्चों की मौत से बहुत आहत हैं। इसलिए प्रिसिंपल का पद छोड़ रहे हैं। ’
दोनों मंत्री लौट गए। फिर शाम को लखनउ में एक बार फिर सरकार मीडिया के सामने आई। सीएम बोलते हैं कि आक्सीजन का पैसा तो पांच अगस्त को भी गोरखपुर भेज दिया गया था। प्रधानमंत्री जी बच्चों की मौत से दुखी हैं। ’
विपक्षी नेताओं की गाड़िया एक के बाद एक मेडिकल कालेज पहुंच रही हैं। अंदर काली वर्दीधारी कमांडो तैनात हैं। ऐसा लगता है कि कोई आतंकवादी हमला हुआ है। विपक्षी नेता संवेदना प्रकट करते हुए बाहर आते हैं। मीडिया वाले कैमरा लिए दौड़ पड़ते हैं। विपक्षी नेता की आवाज टीवी पर एयर होने लगती है-सीएम संवदेनहीन हैं। वह इस्तीफा दें।
बड़ी-बड़ी गाड़ियों, सफेद लकदक कुर्ते मंे लैस नेताओं के बीच में से कंधे पर अपने लाडलों का शव लादे रोती-विलखती माएं और पिता दीखते हैं। बाबा राघवदास की प्रतिमा पर मोमबत्ती जलाने वाले आ पहुंचे हैं। तभी हवा तेज हो जाती है और सभी मोमबत्तियां एक साथ बुझ जाती हैं। रात का रिपोर्टर रात डेढ़ बजे अपनी खबर अपडेट करता है-24 घंटे में फिर 11 बच्चों की मौत हो गई है।
13 अगस्त की सुबह बूंदाबांदी से होती है। भादो का महीना है लेकिन आसमान जमकर बरस नहीं रहा है। लगता है कि उसके पास पानी की कमी हो गई है। अचानक चैनलों के ओवी वैन तेजी से मेडिकल कालेज की तरफ भागने लगते हैं। खबर तैर जाती है कि सूबे के मुख्यमंत्री आ रहे हैं। उनके साथ नड्ढा साहब भी हैं। इंसेफेलाइटिस वार्ड में सफारी पहने सुरक्षा कर्मी कुत्तों को लेकर घूम रहे हैं जो सबको संूघते जाते है। वार्ड के फर्श चमकाए जा रहे हैं। मीडिया को छोड़ सभी को बाहर जाने का आदेश गूँज रहा है।
दो दिन से खाली आक्सीजन प्लांट के पास एक टैंकर आ गई है। वह रात दो बजे लिक्विड आक्सीजन लेकर आई। प्लांट में आक्सीजन रिफिल हो गई है। मीटर का रीडिंग छह हजार बता रहा है।
दोपहर 12 बजे हलचल तेज हो जाती है। गेट पर मास्क लगाए डाॅक्टर मुस्तैद हो जाते हैं। सीएम और हेल्थ मिनिस्टर तेजी से वार्ड में घुसते हैं। साथ में तमाम नेता भी अंदर आ जाते हैं। अंदर पत्रकार पहले से मौजूद हैं। एक टीवी रिपोर्टर बाहर चीख रही है कि अस्पताल में इतने लोगों को नहीं जाना चाहिए। कुछ देर बाद अंदर से खबर आती है कि भीड़ के दबाव में एक दरवाजे का शीशा टूट गया है। सूचना विभाग के एक अफसर बाहर आते हैं और मीडिया कर्मियों से कहते हैं सेमिनार हाल में चलिए। वही सीएम साहब बात करेंगे। पत्रकार सेमिनार हाल की तरफ चल पड़ते हैं। तभी कुछ पत्रकारों के मोबाइल पर खबर फलैश होने लगती है कि इंसेफेलाइटिस वार्ड में सीएम भावुक हो गए। आंख पोछते देखे गए।
प्रेस कांफ्रेस में सीएम गंभीर होने के साथ दुखी नजर आ रहे हैं। वह सूचना देते हैं कि प्रधानमंत्री बच्चों की मौत से बहुत दुखी है। यह वाक्य वह कई बार रिपीट करते हैं। फिर वह कहते हैं कि इंसेफेलाइटिस के लिए उनसे ज्यादा कौन लड़ा है ? उनसे ज्यादा इस मुद्दे पर कौन संवेदनशील हैं ? यह कहते हुए उनका गर्ला भर्रा जाता है। कुछ पत्रकार मोबाइल पर तत्काल खबर अपडेट करते हैं कि सीएम एक बार फिर भावुक हुए। वह मीडिया से अपील करते हंै-फेक खबर न चलाइए। तथ्यों पर रिपोर्ट करिए। मुख्य सचिव की रिपोर्ट आने दीजिए। जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई होगी कि नजीर बनेगी।
अब हेल्थ मिनिस्टर नड्ढा साहब बोल रहे है। वह तस्दीक करते हैं कि सीएम साहब ने इंसेफेलाइटिस के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष किया है। वह इस बार संसद में नहीं थे तो इंसेफेलाइटिस का मुद्दा नहीं उठा। वही हर बार यह मुद्दा उठाते थे। वह घोषण करते हैं कि वायरल रिसर्च सेंटर के लिए 85 करोड़ रूपया दिया जा रहा है।
अब पत्रकारों के सवाल पूछने की बारी है। चैनल वाले सबसे पहले सवाल पूछ रहे हैं। सवाल पूछने के पहले कई बार अपने चैनल का नाम और अपना नाम ले रहे हैं। एक-दो सवाल के बाद आक्सीजन का सवाल उठ जाता है। कई पत्रकार एक साथ सवाल पूछने लगते हैं। पीछे वाले पत्रकार सवाल पूछने के लिए आगे आते हैं तभी धन्यवाद की आवाज आती है और सीएम उठ जाते हैं। प्रेस कांफ्रेस खत्म हो जाती है।
शाम को खबर आती है कि डा. कफील इंसेफेलाइटिस वार्ड के नोडल अफसर पद से हटा दिए गए हैं। ये वही डाॅक्टर हैं जिन्हें आक्सीजन संकट के वक्त संवेदनशीलता दिखाने के लिए प्रशंसा पाई थी। अब उनके बारे में तमाम ज्ञात-अज्ञात बातें सोशल मीडिया पर आने लगती हैं। दो दिन का ‘ मीडिया का नायक ’ ‘ खलनायक ’ में बदलने लगता है। आक्सीजन, बच्चों की मौत चर्चा से गायब होने लगती है। सोशल मीडिया पर दो दिन से चुप साधे लगे गरजने लगे हैं।
सुबह की बूंदाबादी रात में तेज बारिश में बदल गई है। रात का रिपोर्टर खबर अपडेट कर रहा है-आधी रात को तमाम चिकित्सक, कर्मचारी, लिपिक मेडिकल कालेज में ही मौजूद हैं। कम्प्यूटर पर आंकड़े तैयार किए जा रहे हैं। 24 घंटे में 12 और बच्चों की मौत हो गई हैै। वार्ड संख्या 14 में दो और मरीज मर गए हैं।

manoj singh

5 वें उदयपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल में मिलिए ‘गोरखपुर न्यूज़ लाईन’ से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार एवं जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह से पड़ताल सत्र के दौरान | 27 नवंबर 2017 : सोमवार : सुबह 11.30 से 1.00

 

गौरी लंकेश का आख़िरी संपादकीय हिन्दी में

गौरी लंकेश नाम है पत्रिका का। 16 पन्नों की यह पत्रिका हर हफ्ते निकलती है। 15 रुपये कीमत होती है। 13 सितंबर का अंक गौरी लंकेश के लिए आख़िरी साबित हुआ। हमने अपने मित्र की मदद से उनके आख़िरी संपादकीय का हिन्दी में अनुवाद किया है ताकि आपको पता चल सके कि कन्नडा में लिखने वाली इस पत्रकार की लिखावट कैसी थी, उसकी धार कैसी थी। हर अंक में गौरी ‘कंडा हागे’ नाम से कालम लिखती थीं। कंडा हागे का मतलब होता है जैसा मैने देखा। उनका संपादकीय पत्रिका के तीसरे पन्ने पर छपता था। इस बार का संपादकीय फेक न्यूज़ पर था और उसका टाइटल था- फेक न्यूज़ के ज़माने में-
इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज़ बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है। झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज़्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं। झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी। अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी। उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया। फैलाने वाले संघ के लोग थे। ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाज़िट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं। पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं। संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया। ये झूठ इतना ज़ोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है। ये सब झूठ है।
इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा POSTCARD.IN नाम की वेबसाइट पर। यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है। इसका काम हर दिन फ़ेक न्यूज़ बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है। 11 अगस्त को POSTCARD.IN में एक हेडिंग लगाई गई। कर्नाटक में तालिबान सरकार। इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई। संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए। जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज़ रहते हैं उन लोगों ने इस फ़ेक न्यूज़ को अपना हथियार बना लिया। सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बग़ैर सोचे समझे इसे सही मान लिया। अपने कान, नाक और भेजे का इस्तमाल नहीं किया।
पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सज़ा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायर होने लगी। इस ढोंगी बाबा के साथ मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा। इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए। इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाज़ू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई। यह तस्वीर फोटोशाप थी। असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया। शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी।
एक्चुअली, पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था। अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है। पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं।
उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को ख़ूब वायरल हुआ। ध्रुव राठी ने उसका विश्लेषण किया था। ध्रुव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है। पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17 अगस्ता के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया। ( गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे)। ध्रुव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिया’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं। उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी। अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हज़ार नए करदाता जुड़े हैं। तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है।
आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है। मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है। उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं। उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रज़ी टीवी चैनलों ने ख़बर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है। वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30 लाख बढ़ गया। उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं। बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं। संघ का ही काम करते हैं। जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया। जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए। इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे।
आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं। ध्रुव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं। प्रतीक सिन्हा altnews.in नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं। होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है। साथ ही साथ THEWIERE.IN, SCROLL.IN, NEWSLAUNDRY.COM, THEQUINT.COM जैसी वेबसाइट भी सक्रिय हैं। मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई को उजागर किया है। इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं। इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना।
कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में ज़ोरदार बारिश हुई। उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया। कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है। बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है। संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मज़ाक उड़ाना। जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था। लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है।
हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए। एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी। दूसरे फोटो में एक महीला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है। बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया। पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे। दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी। सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं। उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे। फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है। अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है, उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है। प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के ज़रिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी। पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है। पाकिस्तान का है जहां एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है।
इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है। यह सवाप पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई। बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर क़ब्ज़ा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था। मगर फोटोशाप के ज़रिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे। लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया। ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मज़ाक उड़ाया।
केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक तस्वीर साझा की। लिखा कि भारत 50,000 किलोमीटर रास्तों पर सरकार ने तीस लाख एल ई डी बल्ब लगा दिए हैं। मगर जो तस्वीर उन्होंने लगाई वो फेक निकली। भारत की नहीं, 2009 में जापान की तस्वीर की थी। इसी गोयल ने पहले भी एक ट्वीट किया था कि कोयले की आपूर्ति में सरकार ने 25,900 करोड़ की बचत की है। उस ट्वीट की तस्वीर भी झूठी निकली।
छत्तीसगढ़ के पी डब्ल्यू डी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया। अपनी सरकार की कामयाबी बताई। उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले। बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है।
ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में हमारे कर्नाटक के आर एस एस और बीजेपी लीडर भी कुछ कम नहीं हैं। कर्नाटक के सांसद प्रताप सिम्हा ने एक रिपोर्ट शेयर किया, कहा कि ये टाइम्स आफ इंडिय मे आया है। उसकी हेडलाइन ये थी कि हिन्दू लड़की को मुसलमान ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दुनिया भर को नैतिकता का ज्ञान देने वाले प्रताप सिम्हा ने सच्चाई जानने की ज़रा भी कोशिश नहीं की। किसी भी अखबार ने इस न्यूज को नहीं छापा था बल्कि फोटोशाप के ज़रिए किसी दूसरे न्यूज़ में हेडलाइन लगा दिया गया था और हिन्दू मुस्लिम रंग दिया गया। इसके लिए टाइम्स आफ इंडिया का नाम इस्तमाल किया गया। जब हंगामा हुआ कि ये तो फ़ेक न्यूज़ है तो सांसद ने डिलिट कर दिया मगर माफी नहीं मांगी। सांप्रादायिक झूठ फैलाने पर कोई पछतावा ज़ाहिर नहीं किया।
जैसा कि मेरे दोस्त वासु ने इस बार के कॉलम में लिखा है, मैंने भी एक बिना समझे एक फ़ेक न्यूज़ शेयर कर दिया। पिछले रविवार पटना की अपनी रैली की तस्वीर लालू यादव ने फोटोशाप करके साझा कर दी। थोड़ी देर में दोस्त शशिधर ने बताया कि ये फोटो फर्ज़ी है। नकली है। मैंने तुरंत हटाया और ग़लती भी मानी। यही नहीं फेक और असली तस्वीर दोनों को एक साथ ट्वीट किया। इस गलती के पीछे सांप्रदियाक रूप से भड़काने या प्रोपेगैंडा करने की मंशा नहीं थी। फासिस्टों के ख़िलाफ़ लोग जमा हो रहे थे, इसका संदेश देना ही मेरा मकसद था। फाइनली, जो भी फ़ेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करते हैं, उनको सलाम । मेरी ख़्वाहिश है कि उनकी संख्या और भी ज़्यादा हो।

साभार: क़स्बा ब्लॉग से रविश कुमार

तुरुप : नए सिनेमा की धमक

हमारे फेस्टिवल की एक महत्त्वपूर्ण प्रस्तुति है फ़ीचर फ़िल्म ‘तुरुप’. एकतारा कलेक्टिव द्वारा निर्मित इस फिल्म के बारे में लिख रहे हैं ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी :

 

आज से एक दशक पहले जब हम नयी तकनीक और उसके फलस्वरूप निर्मित होने वाली नयी सिनेमाई संभावनाओं की बात करते थे तोकुछ लोग इसे सिनेमाई फ़सक से ज्यादा न समझते थे. अब समय बीतने पर जैसे –जैसे कैमरा आम लोगों की पहुँच में आता गया और छोटे किफ़ायती प्रोजक्टरों की वजह से नए –नए सिनेमा हाल बनाना संभव होने लगा नया सिनेमा भी निर्मित होकर हम तक पहुँचने लगा है. इस सन्दर्भ में मथुरा का जन सिनेमा, समूचे भारत में सक्रिय होने को तत्पर सर्वहारा स्टूडियो और एक दशक से मध्य प्रदेश में काम कर रहे एकतारा कलेक्टिव पर बात करना नितांत जरुरी है.

Turup_poster

जन सिनेमा और सर्वहारा स्टूडियो ने अब तक आम लोगों के सहयोग अपनी एक –एक फ़ीचर फ़िल्म पूरी कर अब दूसरी की तैय्यारी में जुटे हैं जबकी एकतारा कलेक्टिव की यह पहली फ़ीचर फ़िल्म है. इससे पहले यह समूह 2011 में‘चंदाके जूते’ और 2013में‘जादुई मच्छी’ नाम से दो लघु कथा फिल्में निर्मित कर चुका है.

एकतारा कलेक्टिव की नयी फ़िल्म ‘तुरुप’ सिनेमा हाल में चलने वाली आम मुम्बईया फ़िल्मों से मामूली सी कम अवधि की यानि 71 मिनट की है. यहाँ अवधि पर विशेष जोर देना इसलिए है क्योंकि इस वजह से यह कथा फ़िल्मों के आम दर्शकों तक भी अपनी पहुँच बना सकेगी. तुरुप की कहानी और उसका सिनेमाई ट्रीटमेंट दोनों ही बहुत खास है शायद इसलिए यह नए सिनेमा की महत्वपूर्ण फ़िल्म भी साबित होगी. यह एक आम क़स्बे की कहानी है जिसमे किसी तरह गुजर –बसर करने वालेलोग हैं जिनके लिए शतरंज की एक बिसात खेल लेना ही बहुत बड़ी बात है. क़स्बे के चक्की चौराहे पर एक एक चबूतरे के नीचे फ़र्श पर बकायदा एक शतरंज बना हुआ. इसी के बहाने पूरे क़स्बे की जुटान होती है. तिवारी जी और माजिद इस क़स्बे के सबसे उम्दा खिलाड़ी हैं. तिवारी जी शतरंज के अलावा हिन्दू राष्ट्रवाद की बिसात बिछाने में भी जुटे हैं. माजिद ड्राइवर है और क़स्बे की ही दलित लड़की लता से प्रेम करता है. लता अपनी छोटी सी नौकरी के जरिये अपने बीमार बाप और छोटे भाई की भी गुजर बसर करती है. तिवारी के लोग हिन्दू राष्ट्रवाद के पतीले को सुलगाने में लगे हैं. इसलिए तिवारी का सहायक माजिद और लता के सम्बन्ध को पसंद नहीं करता और एक दिन चाय की दुकान पर माजिद के साथ जबरदस्ती करते हुए उसे इस क़स्बे को छोड़ने की चेतावनी देता है. माजिद कहीं और से इस क़स्बे में कमाने आया है. लेकिन सभी कहीं न कहीं से कमाने आये हैं यह ख़ास डायलाग एक आम आदमी शतरंज के खेल के दौरान कहता है जब तिवारी का सहायक माजिद और लता के सम्बन्ध के बहाने माजिद को क़स्बे से बाहर करने की बात करता है.

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तिवारी के राष्ट्रवाद को खाद उभरते हुए उद्योगपति वरुण से भी मिलती है जिसकी अकेली पत्नी नीलिमा गुजरे जमाने की पत्रकार है और अपने पति के पाखंड से ऊब चुकी है. एक नए घटनाक्रम में तिवारी का गैंग क़स्बे में हुई एक अंतरधार्मिक शादी को तूल देने की कोशिश करता है और नीलिमाअपनी घरेलु सहायिका मोनिकाके जरिये तिवारी के षड्यंत्र पर एक न्यूज़ स्टोरी कर पानी फेरती है. तिवारी के गैंग की चाल पर पानी फिरना और चक्की चौराहे के शतरंज के टूर्नामेंट में तिवारी का माजिद के हाथों टूर्नामेंट हारना साथ –साथ चलता है.

 

तुरुप की ख़ास बात यही है कि यह समाज में बुने जा रहे नए षड्यंत्रों को चुपचाप अपनी कहानी का हिस्सा बना पाती है. इस फ़िल्म का बनना इसलिए और भी ख़ास है क्योंकि नयी तकनीक पर सवार होकर यह अब नए कस्बों-मुहल्लों में पहुंच सकेगी.

 

संजय जोशी

 

26 नवम्बर ( दूसरा दिन ) / 12.00 -1.30/  तुरुप/ एकतारा कलेक्टिव/ हिंदी- अंग्रेजी सब-टाइटल्स/ फ़ीचर फ़िल्म/ 2017/ 72 मिनट